अल-अनफाल · 74/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوا وَّنَصَرُوا أُولَٰئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّا ۚ لَّهُم مَّغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ ۝٧٤
Wallazeena aamanoo wa haajaroo wa jaahadoo fee sabeelil laahi wallazeena aawaw wa nasarooo ulaaa`ika humul mu`minoona haqqaa; lahum maghfiratunw wa rizqun kareem
📖 हिंदी अर्थ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और ख़ुदा की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने (ऐसे नाज़ुक वक्त में मुहाजिरीन को जगह ही और उनकी हर तरह ख़बरगीरी (मदद) की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آووا: शरण दी, आश्रय दिया (अन-सार ने मुहाजिरों को)।
  • نَصَرُوا: सहायता की, मदद की (धन, जान और समर्थन से)।
  • حَقًّا: सच्चा, पूर्ण, वास्तविक (ईमान जो खालिस और सच्चा हो)।
  • رِزْقٌ كَرِيمٌ: सम्मानित और उदार आजीविका, जो जन्नत का भोजन है, जिसमें कोई तकलीफ़ या एहसान नहीं होता।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों का वर्णन करती है जो अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) पर ईमान लाए, और ईमान के तकाज़े को पूरा करते हुए अपने घर-बार और वतन को छोड़कर हिजरत की — ताकि वे अपने दीन की इबादत आज़ादी से कर सकें और अल्लाह के दीन को बुलंद कर सकें। उन्होंने अल्लाह की राह में जिहाद किया, यानी अपनी जान, माल और वक़्त को अल्लाह के रास्ते में खर्च किया। साथ ही, उन लोगों (अन-सार) का ज़िक्र है जिन्होंने इन मुहाजिरों को अपने घरों में पनाह दी, उन्हें अपने माल में से हिस्सा दिया, और हर मोर्चे पर उनकी मदद की — चाहे वह माली हो या जानी।

अल्लाह फ़रमाता है कि यही लोग सच्चे और पूर्ण ईमान वाले हैं। उनका ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी दावा नहीं, बल्कि उन्होंने अपने अमल से उसे साबित किया — हिजरत, जिहाद, ईसार (दूसरों को अपने ऊपर तरजीह देना) और नुसरत (मदद) के ज़रिए। उनके लिए अल्लाह की तरफ़ से दो चीज़ें हैं: मग़फिरत — यानी उनके सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे, और करीम रिज़्क़ — यानी जन्नत की वह नेमतें जो बेहद सम्मानित, पाक और लाज़वार हैं, जिनमें कोई कमी, कोई तकलीफ़ या कोई एहसान नहीं होगा। यह रिज़्क़ उन्हें हमेशा के लिए मिलेगा और कभी ख़त्म नहीं होगा।

फ़ायदे (सबक़):

  1. ईमान का सच्चा दावा अमल से साबित होता है — सिर्फ़ ज़ुबान से "मैं मुसलमान हूँ" कहना काफ़ी नहीं, बल्कि अल्लाह की राह में कुर्बानी (हिजरत, जिहाद, मदद) ही ईमान को हक़ीक़ी बनाती है।
  2. भाईचारे और ईसार की तालीम — अन-सार ने मुहाजिरों को अपने घरों में जगह दी और अपने माल में से हिस्सा दिया। यह इस्लाम का वह सुनहरी नमूना है जो हमें सिखाता है कि दूसरों की मदद करना, उन्हें पनाह देना और उनके लिए कुर्बानी देना ईमान का हिस्सा है।
  3. अल्लाह का वादा — जो लोग अल्लाह की राह में अपना घर-बार छोड़ते हैं और दूसरों की मदद करते हैं, अल्लाह उन्हें दो चीज़ें देता है: गुनाहों से पाकी (मग़फिरत) और बेहतरीन इनाम (जन्नत) — यह वादा क़ुरआन में साफ़ है, इसलिए हमें अपने अमल में इन सिफ़ात को अपनाना चाहिए।
  4. जन्नत की रिज़्क़ की अज़मत — दुनिया की रिज़्क़ में मेहनत, तकलीफ़ और एहसान होता है, लेकिन जन्नत की रिज़्क़ "करीम" है — यानी बेहद सम्मानित, ख़ालिस और हमेशा रहने वाली। यह हमें दुनिया की चीज़ों से बेरग़बती और आख़िरत की तरफ़ रग़बत पैदा करती है।
  5. मुहाजिर और अन-सार की फ़ज़ीलत — यह आयत हमें सिखाती है कि इस उम्मत के पहले लोगों ने अपने ईमान को अमल से साबित किया, और हमें उनके नक़्शे-क़दम पर चलना चाहिए — अपने वतन, माल और आराम को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का जज़्बा रखना चाहिए।


📜 आयत 72-75 — अल-अनफाल

72إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوا وَّنَصَرُوا أُولَٰئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُم مِّن وَلَايَتِهِم مِّن شَيْءٍ حَتَّىٰ يُهَاجِرُوا ۚ وَإِنِ اسْتَنصَرُوكُمْ فِي الدِّينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ إِلَّا عَلَىٰ قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَاقٌ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से ख़ुदा की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को जगह दी और हर (तरह) उनकी ख़बर गीरी (मदद) की यही लोग एक दूसरे के (बाहम) सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख्तियार करें और (हॉ) मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख्वाहॉ हो तो तुम पर (उनकी मदद करना लाज़िम व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में (नहीं) जिनमें और तुममें बाहम (सुलह का) एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा (सबको) देख रहा है
73وَالَّذِينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ إِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُن فِتْنَةٌ فِي الْأَرْضِ وَفَسَادٌ كَبِيرٌ
और जो लोग काफ़िर हैं वह भी (बाहम) एक दूसरे के सरपरस्त हैं अगर तुम (इस तरह) वायदा न करोगे तो रूए ज़मीन पर फ़ितना (फ़साद) बरपा हो जाएगा और बड़ा फ़साद होगा
74وَالَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوا وَّنَصَرُوا أُولَٰئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّا ۚ لَّهُم مَّغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और ख़ुदा की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने (ऐसे नाज़ुक वक्त में मुहाजिरीन को जगह ही और उनकी हर तरह ख़बरगीरी (मदद) की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है
75وَالَّذِينَ آمَنُوا مِن بَعْدُ وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا مَعَكُمْ فَأُولَٰئِكَ مِنكُمْ ۚ وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَىٰ بِبَعْضٍ فِي كِتَابِ اللَّهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
और जिन लोगों ने (सुलह हुदैबिया के) बाद ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया वह लोग भी तुम्हीं में से हैं और साहबाने क़राबत ख़ुदा की किताब में बाहम एक दूसरे के (बनिस्बत औरों के) ज्यादा हक़दार हैं बेशक ख़ुदा हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ हैं
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अनुवाद — अल-अनफाल 74

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Tuesday, August 18, 2026

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