فِتْنَةٌ: यहाँ अर्थ है—मुसलमानों को धर्म से भटकाने वाली आज़माइश और उन पर अत्याचार।
فَسَادٌ كَبِيرٌ: बड़ा विनाश और हानि, जो धर्म और दुनिया दोनों में फैलती है।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला बताते हैं कि जिन लोगों ने कुफ़्र (इनकार) का रास्ता अपनाया है, उनका आपस में एक-दूसरे से गहरा संबंध और सहायता का बंधन है। वे कुफ़्र और बुराई में एक-दूसरे के साथी और मददगार हैं। उनके बीच आपसी मोहब्बत, सहायता और एकजुटता इस कदर मज़बूत है कि वे मुसलमानों के खिलाफ एक हो जाते हैं। इसलिए ईमानवालों को चाहिए कि वे आपस में भाईचारा, प्रेम और सहायता का ऐसा मज़बूत रिश्ता क़ायम करें जो कुफ़्र के खिलाफ एक ठोस दीवार बने।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: "यदि तुम (मुसलमानों) ने ऐसा नहीं किया—यानी एक-दूसरे की सहायता नहीं की, आपसी भाईचारे को मज़बूत नहीं किया, और काफ़िरों से दोस्ती और निकटता बनाए रखी—तो धरती पर फ़ितना (उपद्रव) और बड़ा फ़साद (विनाश) फैल जाएगा।" इसका मतलब यह है कि जब मुसलमान आपस में बिखर जाएँगे और एक-दूसरे की मदद नहीं करेंगे, तो कुफ़्र की ताक़त बढ़ जाएगी। काफ़िर मुसलमानों पर हावी हो जाएँगे, उन्हें धर्म से भटकाने की कोशिश करेंगे, उन पर ज़ुल्म करेंगे, और इस्लाम की रोशनी कमज़ोर पड़ जाएगी। यही वह बड़ा फ़साद है जिससे अल्लाह ने डराया है।
फ़ायदे (सीख):
मुसलमानों की एकता और आपसी सहायता इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं में से है। जब तक मुसलमान एकजुट रहेंगे, कुफ़्र की ताक़त उन पर हावी नहीं हो सकती।
काफ़िरों से मोहब्बत और निकटता रखना मुसलमानों के लिए ख़तरनाक है, क्योंकि इससे उनकी पहचान कमज़ोर पड़ती है और उनका धर्म ख़तरे में आता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची भलाई और सुधार तभी होगा जब नेक लोग एक-दूसरे का साथ दें और बुराई के खिलाफ मिलकर खड़े हों।
अल्लाह तआला ने अपने बंदों को साफ़ चेतावनी दी है कि बिखराव और आपसी लड़ाई से बड़ा नुक़सान होता है—धर्म को कमज़ोर करने वाला और समाज को तबाह करने वाला।
यह आयत मुसलमानों को प्रोत्साहित करती है कि वे भाईचारे, प्रेम और एकता के साथ रहें, ताकि धरती पर शांति और अच्छाई का बोलबाला रहे।
और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफकार हिकमत वाला है
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से ख़ुदा की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को जगह दी और हर (तरह) उनकी ख़बर गीरी (मदद) की यही लोग एक दूसरे के (बाहम) सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख्तियार करें और (हॉ) मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख्वाहॉ हो तो तुम पर (उनकी मदद करना लाज़िम व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में (नहीं) जिनमें और तुममें बाहम (सुलह का) एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा (सबको) देख रहा है
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और ख़ुदा की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने (ऐसे नाज़ुक वक्त में मुहाजिरीन को जगह ही और उनकी हर तरह ख़बरगीरी (मदद) की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है
और जिन लोगों ने (सुलह हुदैबिया के) बाद ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया वह लोग भी तुम्हीं में से हैं और साहबाने क़राबत ख़ुदा की किताब में बाहम एक दूसरे के (बनिस्बत औरों के) ज्यादा हक़दार हैं बेशक ख़ुदा हर चीज़ से ख़ूब वाक़िफ हैं
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