Law kaana `aradan qareebanw wa safaran qaasidal lattaba`ooka wa laakim ba`udat `alaihimush shuqqah; wa sayahlifoona billaahi lawis tata`naa lakharajnaa ma`akum; yuhlikoona anfusahum wal laahu ya`lamu innahum lakaa ziboon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اگر مالِ غنیمت سہل الحصول اور سفر بھی ہلکا سا ہوتا تو تمہارے ساتھ (شوق سے) چل دیتے۔ لیکن مسافت ان کو دور (دراز) نظر آئی (تو عذر کریں گے) ۔ اور خدا کی قسمیں کھائیں گے کہ اگر ہم طاقت رکھتے تو آپ کے ساتھ ضرور نکل کھڑے ہوتے یہ (ایسے عذروں سے) اپنے تئیں ہلاک کر رہے ہیں۔ اور خدا جانتا ہے کہ جھوٹے ہیں
(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
عَرَضًا قَرِيبًا: आसानी से मिलने वाला सांसारिक लाभ या निकट की ग़नीमत (माल-ए-ग़नीमत)।
سَفَرًا قَاصِدًا: आसान और सीधा सफ़र जिसमें कोई कठिनाई न हो।
الشُّقَّةُ: दूरी, लंबा रास्ता या कठिनाई।
يُهْلِكُونَ أَنفُسَهُمْ: अपनी जानों को हलाकत में डालते हैं (झूठी क़समें खाकर)।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला ने इस आयत में मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) के उस गिरोह की मज़म्मत (निंदा) की है, जिन्होंने ग़ज़वा-ए-तबूक (इस्लाम के नबी ﷺ का रोम के मुक़ाबले के लिए निकलना) में शरीक होने से इस्तिज़ा (अनुमति) माँगी थी। अल्लाह फ़रमाता है: ऐ नबी! अगर वह चीज़ जिसकी तरफ़ तुम उन्हें बुला रहे थे, कोई आसान ग़नीमत होती या सफ़र आसान और क़रीब होता, तो ये लोग ज़रूर तुम्हारे पीछे चल पड़ते। लेकिन जब उन्हें दूर के सफ़र (शाम की तरफ़) और गर्मी के मौसम में जिहाद की दावत दी गई, तो उन्होंने पीठ दिखा दी और पीछे रह गए।
जब आप ﷺ तबूक से वापस लौटे, तो ये मुनाफ़िक़ आपके पास आकर बहाने बनाने लगे और क़समें खाकर कहने लगे: "अगर हममें ताक़त और सामान होता, तो हम ज़रूर आपके साथ निकलते।" अल्लाह फ़रमाता है कि ये लोग अपनी इन झूठी क़समों से अपनी जानों को हलाकत में डाल रहे हैं, क्योंकि ये झूठ बोल रहे हैं और निफ़ाक़ (दोहरेपन) पर क़ायम हैं। अल्लाह उनके दिलों का हाल खूब जानता है—वह जानता है कि ये अपने बहानों में बिल्कुल झूठे हैं, क्योंकि उनके पास ताक़त और सामान मौजूद था, लेकिन उनके दिलों में जिहाद की मुहब्बत नहीं थी।
फ़ायदे (सबक़ और नसीहतें):
ईमान की कसौटी: यह आयत सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी दावा नहीं, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की राह में क़ुर्बानी देने का नाम है। जब दीन की मदद के लिए मेहनत और मुश्किलें उठानी पड़ें, तभी ईमान की हक़ीक़त ज़ाहिर होती है।
बहानों से बचना: मुनाफ़िक़ों की आदत है कि वे हर अच्छे काम से बचने के लिए झूठे बहाने बनाते हैं। मोमिन को चाहिए कि वह दीन के कामों में पूरे जोश और सच्चाई से हिस्सा ले, न कि बहानों की तलाश में रहे।
अल्लाह की निगरानी: अल्लाह हर दिल का हाल जानता है। चाहे इंसान कितने भी अच्छे बहाने बनाए, अल्लाह के इल्म से कुछ छिपा नहीं है। इसलिए हमें अपने अंदर और बाहर को सच्चा रखना चाहिए।
झूठी क़समों का अंजाम: झूठी क़समें खाकर दीन के कामों से भागना इंसान को अल्लाह के अज़ाब का मुस्तहिक़ बनाता है। यह आदत इंसान को हलाकत की तरफ़ ले जाती है।
जिहाद की अहमियत: यह आयत जिहाद (अल्लाह की राह में कोशिश) की अहमियत बयान करती है कि मुश्किलों के बावजूद दीन की ख़िदमत करना मोमिन की पहचान है। जो लोग आराम-परस्ती की वजह से पीछे रह जाते हैं, वे अल्लाह की नज़र में मज़मूम हैं।
अगर तुम उस रसूल की मदद न करोगे तो (कुछ परवाह् नहीं ख़ुदा मददगार है) उसने तो अपने रसूल की उस वक्त मदद की जब उसकी कुफ्फ़ार (मक्का) ने (घर से) निकल बाहर किया उस वक्त सिर्फ (दो आदमी थे) दूसरे रसूल थे जब वह दोनो ग़ार (सौर) में थे जब अपने साथी को (उसकी गिरिया व ज़ारी (रोने) पर) समझा रहे थे कि घबराओ नहीं ख़ुदा यक़ीनन हमारे साथ है तो ख़ुदा ने उन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (फ़रिश्तों के) ऐसे लश्कर से उनकी मदद की जिनको तुम लोगों ने देखा तक नहीं और ख़ुदा ने काफिरों की बात नीची कर दिखाई और ख़ुदा ही का बोल बाला है और ख़ुदा तो ग़ालिब हिकमत वाला है
(मुसलमानों) तुम हलके फुलके (हॅसते) हो या भारी भरकम (मसलह) बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से ख़ुदा की राह में जिहाद करो अगर तुम (कुछ जानते हो तो) समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
(ऐ रसूल) ख़ुदा तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें (पीछे रह जाने की) इजाज़त ही क्यों दी ताकि (तुम) अगर ऐसा न करते तो) तुम पर सच बोलने वाले (अलग) ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को (अलग) मालूम कर लेते
(ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद (न) करने की इजाज़त मॉगने के नहीं (बल्कि वह ख़ुद जाऎंगे) और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ है
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