यूसुफ · 30/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
۞ وَقَالَ نِسْوَةٌ فِي الْمَدِينَةِ امْرَأَتُ الْعَزِيزِ تُرَاوِدُ فَتَاهَا عَن نَّفْسِهِ ۖ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّا ۖ إِنَّا لَنَرَاهَا فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ۝٣٠
Wa qaala niswatun filma deenatim ra atul`Azeezi turaawidu fataahaa `an nafsihee qad shaghafahaa bubbaa; innaa lana raahaa fee dalaalim mubeen
📖 हिंदी अर्थ
और शहर (मिस्र) में औरतें चर्चा करने लगी कि अज़ीज़ (मिस्र) की बीबी अपने ग़ुलाम से (नाजायज़) मतलब हासिल करने की आरज़ू मन्द है बेशक गुलाम ने उसे उलफत में लुभाया है हम लोग तो यक़ीनन उसे सरीही ग़लती में मुब्तिला देखते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • निस्वतुन (نسوة): औरतें, महिलाएँ।
  • अल-अज़ीज़ (العزيز): मिस्र के शासक का प्रधानमंत्री या कोषाध्यक्ष, जिसके घर में यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) रहते थे।
  • तुराविदु (تراود): अपनी ओर बुलाना, बुरे इरादे से फुसलाना।
  • फ़ताहा (فتاها): उसका युवा ग़ुलाम (यूसुफ़ अलैहिस्सलाम)।
  • शग़फ़हा (شغفها): उसके दिल के ग़िलाफ़ (आवरण) तक पहुँच गया, यानी उसके दिल की गहराई में समा गया।
  • ज़लालिन मुबीन (ضلال مبين): स्पष्ट गुमराही और खुली भटकन।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की पाकदामनी और अज़ीज़ की पत्नी (ज़ुलैख़ा) के बुरे इरादे की बात शहर में फैली, तो शहर की कुछ औरतों ने आपस में इस पर चर्चा की और हैरानी व निंदा के साथ कहने लगीं: "अज़ीज़ की पत्नी अपने युवा ग़ुलाम को अपनी तरफ़ बुला रही है और उसे बुरे काम के लिए उकसा रही है। उसका दिल उस युवक की मुहब्बत में इस कदर डूब गया है कि उसका प्यार उसके दिल के सबसे अंदरूनी हिस्से तक पहुँच गया है।" यानी उसका हुस्न और अदा उसके दिल पर इस तरह छा गया कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहा। फिर वे औरतें यह कहकर उसकी मज़म्मत करने लगीं: "हम तो उसे इस काम में खुली गुमराही पर देख रही हैं, क्योंकि वह अपने ग़ुलाम की तरफ़ इस तरह खिंची चली जा रही है जो उसके रुतबे और इज़्ज़त के लिए बिल्कुल मुनासिब नहीं।"

यह बात उन्होंने इसलिए कही क्योंकि उन्हें यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के हुस्न का अंदाज़ा नहीं था और वे ज़ुलैख़ा के इस काम को महज़ उसकी कमज़ोरी और बेवक़ूफ़ी समझ रही थीं, जबकि आगे चलकर जब उन्होंने यूसुफ़ को देखा तो उनकी समझ में आ गया कि यह कोई आम इंसान नहीं बल्कि एक बेहद खूबसूरत और पाक फ़रिश्ता जैसा इंसान है।


फ़ायदे (सबक):

  1. बुराई की शुरुआत शर्म और निंदा से होती है: जब कोई बुरा काम लोगों में फैलता है तो पहले लोग उस पर निंदा करते हैं, लेकिन अगर उसे रोका न जाए तो धीरे-धीरे वह आम बन जाता है। इसलिए बुराई को शुरू में ही रोकना चाहिए।
  2. पाकदामनी की अज़मत: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की पाकदामनी और अल्लाह के डर ने उन्हें उस मुश्किल घड़ी में महफ़ूज़ रखा। यह हमें सिखाता है कि गुनाह के माहौल में भी अल्लाह की पनाह लेने वाला कभी रुसवा नहीं होता।
  3. मुहब्बत में इंसान अंधा हो जाता है: जब इंसान किसी चीज़ या इंसान से बेइंतहा मुहब्बत करता है तो वह सही-ग़लत की पहचान खो देता है। इसलिए मुहब्बत में भी हद और अक़्ल का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।
  4. अल्लाह की क़ुदरत: इस घटना से पता चलता है कि अल्लाह किस तरह अपने नेक बंदों को मुसीबत में भी महफ़ूज़ रखता है और उनकी इज़्ज़त बढ़ाता है। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) की सब्र और तक़्वा ही उनकी कामयाबी का ज़रिया बना।
🎧 सुनें

📜 आयत 28-32 — यूसुफ

28فَلَمَّا رَأَىٰ قَمِيصَهُ قُدَّ مِن دُبُرٍ قَالَ إِنَّهُ مِن كَيْدِكُنَّ ۖ إِنَّ كَيْدَكُنَّ عَظِيمٌ
फिर जब अज़ीजे मिस्र ने उनका कुर्ता पीछे से फटा हुआ देखा तो (अपनी औरत से) कहने लगा ये तुम ही लोगों के चलत्तर है उसमें शक़ नहीं कि तुम लोगों के चलत्तर बड़े (ग़ज़ब के) होते हैं
29يُوسُفُ أَعْرِضْ عَنْ هَٰذَا ۚ وَاسْتَغْفِرِي لِذَنبِكِ ۖ إِنَّكِ كُنتِ مِنَ الْخَاطِئِينَ
(और यूसुफ से कहा) ऐ यूसुफ इसको जाने दो और (औरत से कहा) कि तू अपने गुनाह की माफी माँग क्योंकि बेशक तू ही सरतापा ख़तावार है
30۞ وَقَالَ نِسْوَةٌ فِي الْمَدِينَةِ امْرَأَتُ الْعَزِيزِ تُرَاوِدُ فَتَاهَا عَن نَّفْسِهِ ۖ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّا ۖ إِنَّا لَنَرَاهَا فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
और शहर (मिस्र) में औरतें चर्चा करने लगी कि अज़ीज़ (मिस्र) की बीबी अपने ग़ुलाम से (नाजायज़) मतलब हासिल करने की आरज़ू मन्द है बेशक गुलाम ने उसे उलफत में लुभाया है हम लोग तो यक़ीनन उसे सरीही ग़लती में मुब्तिला देखते हैं
31فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ أَرْسَلَتْ إِلَيْهِنَّ وَأَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَأً وَآتَتْ كُلَّ وَاحِدَةٍ مِّنْهُنَّ سِكِّينًا وَقَالَتِ اخْرُجْ عَلَيْهِنَّ ۖ فَلَمَّا رَأَيْنَهُ أَكْبَرْنَهُ وَقَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَاشَ لِلَّهِ مَا هَٰذَا بَشَرًا إِنْ هَٰذَا إِلَّا مَلَكٌ كَرِيمٌ
तो जब ज़ुलेख़ा ने उनके ताने सुने तो उस ने उन औरतों को बुला भेजा और उनके लिए एक मजलिस आरास्ता की और उसमें से हर एक के हाथ में एक छुरी और एक (नारंगी) दी (और कह दिया कि जब तुम्हारे सामने आए तो काट के एक फ़ाक उसको दे देना) और यूसुफ़ से कहा कि अब इनके सामने से निकल तो जाओ तो जब उन औरतों ने उसे देखा तो उसके बड़ा हसीन पाया तो सब के सब ने (बे खुदी में) अपने अपने हाथ काट डाले और कहने लगी हाय अल्लाह ये आदमी नहीं है ये तो हो न हो बस एक मुअज़िज़ (इज्ज़त वाला) फ़रिश्ता है
32قَالَتْ فَذَٰلِكُنَّ الَّذِي لُمْتُنَّنِي فِيهِ ۖ وَلَقَدْ رَاوَدتُّهُ عَن نَّفْسِهِ فَاسْتَعْصَمَ ۖ وَلَئِن لَّمْ يَفْعَلْ مَا آمُرُهُ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونًا مِّنَ الصَّاغِرِينَ
(तब ज़ुलेख़ा उन औरतों से) बोली कि बस ये वही तो है जिसकी बदौलत तुम सब मुझे मलामत (बुरा भला) करती थीं और हाँ बेशक मैं उससे अपना मतलब हासिल करने की खुद उससे आरज़ू मन्द थी मगर ये बचा रहा और जिस काम का मैं हुक्म देती हूँ अगर ये न करेगा तो ज़रुर क़ैद भी किया जाएगा और ज़लील भी होगा (ये सब बातें यूसुफ ने मेरी बारगाह में) अर्ज़ की
यूसुफकुरान सूची
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अनुवाद — यूसुफ 30

सूरा यूसुफ आयत 30 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और शहर (मिस्र) में औरतें चर्चा करने लगी कि अज़ीज़…

सूरा आयत 30/111 — यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यूसुफ सुनें, यूसुफ अनुवाद, यूसुफ mp3, यूसुफ pdf. आयत 28–32. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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