Awalam yaraw annaa naatil arda nanqusuhaa min atraafihaa; wallaahu yahkumu laa mu`aqqiba lihukmih; wa Huwa saree`ul hisaab
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और उनसे हिसाब लेना हमारा काम है क्या उन लोगों ने ये बात न देखी कि हम ज़मीन को (फ़ुतुहाते इस्लाम से) उसके तमाम एतराफ (चारो ओर) से (सवाह कुफ्र में) घटाते चले आते हैं और ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है उसके हुक्म का कोई टालने वाला नहीं और बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
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کیا انہوں نے نہیں دیکھا کہ ہم زمین کو اس کے کناروں سے گھٹاتے چلے آتے ہیں۔ اور خدا (جیسا چاہتا ہے) حکم کرتا ہے کوئی اس کے حکم کا رد کرنے والا نہیں۔ اور وہ جلد حساب لینے والا ہے
और उनसे हिसाब लेना हमारा काम है क्या उन लोगों ने ये बात न देखी कि हम ज़मीन को (फ़ुतुहाते इस्लाम से) उसके तमाम एतराफ (चारो ओर) से (सवाह कुफ्र में) घटाते चले आते हैं और ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है उसके हुक्म का कोई टालने वाला नहीं और बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
نَنقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا: हम उस (ज़मीन) को उसके किनारों से घटाते जाते हैं, यानी कुफ़्र के इलाक़ों को फ़तह करके इस्लामी इलाक़ों में मिलाते जाते हैं।
لَا مُعَقِّبَ لِحُكْمِهِ: उसके फ़ैसले को टालने या बदलने वाला कोई नहीं।
سَرِيعُ الْحِسَابِ: हिसाब लेने में बहुत तेज़।
तफ़सीर:
क्या इन काफ़िरों ने यह नहीं देखा कि हम ज़मीन (कुफ़्र की धरती) को उसके किनारों से घटाते चले आ रहे हैं? यानी मुसलमानों की फ़तह के ज़रिए शिर्क और कुफ़्र के इलाक़े कम होते जा रहे हैं और इस्लाम का दायरा बढ़ता जा रहा है। यह अल्लाह की तरफ़ से एक निशानी है कि उसका दीन ग़ालिब रहेगा और बातिल का ज़ोर ख़त्म होगा। मक्का के मुशरिकीन, जो नबी ﷺ के दीन को दबाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें इस हक़ीक़त से सबक़ लेना चाहिए था कि अल्लाह का फ़ैसला बदलने वाला कोई नहीं। अल्लाह जो चाहता है वही होता है, और उसके हुक्म के आगे किसी की चाल नहीं चलती। वह हिसाब लेने में भी बहुत तेज़ है, इसलिए इन काफ़िरों को जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए; अज़ाब ज़रूर आएगा, और हर आने वाली चीज़ क़रीब है। यह भी एक इशारा है कि दुनिया में भी अल्लाह काफ़िरों को सज़ा देता है और आख़िरत में उनका पूरा हिसाब होगा।
फ़ायदे:
इस आयत से मुसलमानों को यक़ीन होता है कि अल्लाह का दीन हमेशा बुलंद रहेगा, चाहे कुफ़्र वाले कितनी भी कोशिश कर लें। यह ईमान वालों के दिलों को मज़बूती देता है।
अल्लाह के फ़ैसले के आगे किसी की राय या दख़ल काम नहीं आता, इसलिए इंसान को सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए और उसी के हुक्म के आगे सर झुकाना चाहिए।
अल्लाह की सज़ा और हिसाब से डरना चाहिए, क्योंकि वह बहुत तेज़ी से हिसाब लेने वाला है। यह डर इंसान को गुनाहों से बचाता है और नेकी की तरफ़ रग़बत पैदा करता है।
ज़मीन पर इस्लाम का फैलना अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी निशानी है, जो दिखाती है कि सच्चाई और इंसाफ़ का रास्ता ही कामयाब है, और यही वह रास्ता है जिसे अपनाना चाहिए।
और (ए रसूल) जो जो वायदे (अज़ाब वगैरह के) हम उन कुफ्फारों से करते हैं चाहे, उनमें से बाज़ तुम्हारे सामने पूरे कर दिखाएँ या तुम्हें उससे पहले उठा लें बहर हाल तुम पर तो सिर्फ एहकाम का पहुचा देना फर्ज है
और उनसे हिसाब लेना हमारा काम है क्या उन लोगों ने ये बात न देखी कि हम ज़मीन को (फ़ुतुहाते इस्लाम से) उसके तमाम एतराफ (चारो ओर) से (सवाह कुफ्र में) घटाते चले आते हैं और ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है उसके हुक्म का कोई टालने वाला नहीं और बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
और जो लोग उन (कुफ्फार मक्के) से पहले हो गुज़रे हैं उन लोगों ने भी पैग़म्बरों की मुख़ालफत में बड़ी बड़ी तदबीरे की तो (ख़ाक न हो सका क्योंकि) सब तदबीरे तो ख़ुदा ही के हाथ में हैं जो शख़्श जो कुछ करता है वह उसे खूब जानता है और अनक़रीब कुफ्फार को भी मालूम हो जाएगा कि आख़िरत की खूबी किस के लिए है
और (ऐ रसूल) काफिर लोग कहते हैं कि तुम पैग़म्बर नही हो तो तुम (उनसे) कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरमियान मेरी रिसालत की गवाही के वास्ते ख़ुदा और वह शख़्श जिसके पास (आसमानी) किताब का इल्म है काफी है
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