इसमें तो शक ही नहीं कि जो लोग ख़ुदा की आयतों पर ईमान नहीं लाते ख़ुदा भी उनको मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाएगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
آيَاتِ اللَّهِ: अल्लाह की निशानियाँ और उसकी ओर से उतारी गई आयतें (कुरआन)।
لَا يَهْدِيهِمُ اللَّهُ: अल्लाह उन्हें सत्य का मार्ग नहीं दिखाता (अर्थात् उन्हें हिदायत की तौफ़ीक़ नहीं देता)।
عَذَابٌ أَلِيمٌ: दर्दनाक और बहुत सख्त अज़ाब।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के बारे में है जो अल्लाह की आयतों (कुरआन और उसकी निशानियों) पर ईमान नहीं लाते और उन्हें जानबूझकर झुठलाते हैं। ऐसे लोगों को अल्लाह तआला हिदायत की तौफ़ीक़ नहीं देता, क्योंकि उन्होंने खुद सत्य को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और अपनी ज़िद व हठ पर अड़े रहे। जब इंसान सत्य को पहचानने के बाद भी उसे नहीं मानता, तो अल्लाह उसके दिल को बंद कर देता है और वह हिदायत से महरूम रहता है। यह उनकी अपनी हठधर्मिता का स्वाभाविक परिणाम है, क्योंकि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि लोग स्वयं अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं। आख़िरत में उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार है, जो उनके कुफ़्र और झुठलाने की सज़ा होगी। यह अज़ाब उनके लिए इसलिए है क्योंकि उन्होंने अल्लाह की रहमत और हिदायत के दरवाज़े खुद बंद कर लिए।
फ़ायदे (सीख):
हिदायत अल्लाह के हाथ में है, लेकिन वह उन्हीं को देता है जो सत्य के लिए अपना दिल खोलते हैं और उसे क़बूल करने की नीयत रखते हैं।
अल्लाह की आयतों को झुठलाना और उनसे मुँह मोड़ना इंसान को हिदायत से दूर कर देता है, और यही कुफ़्र का रास्ता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि हमें कुरआन और अल्लाह की निशानियों पर गहराई से विचार करना चाहिए और उन्हें अपने जीवन में अपनाना चाहिए, ताकि हम अल्लाह की रहमत और हिदायत के हक़दार बनें।
अल्लाह का अज़ाब उन्हीं के लिए है जो हक़ को जानते हुए भी उसका इनकार करते हैं, इसलिए हमें सच्चाई के आगे झुकना चाहिए और अपनी ज़िद नहीं करनी चाहिए।
यह आयत मोमिनों के लिए एक चेतावनी है कि वे अपने ईमान को सच्चे दिल से पकड़ें और अल्लाह की आयतों से दूर न हों, क्योंकि यही उनकी कामयाबी और नजात का ज़रिया है।
(ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि इस (क़ुरान) को तो रुहलकुदूस (जिबरील) ने तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ नाज़िल किया है ताकि जो लोग ईमान ला चुके हैं उनको साबित क़दम रखे और मुसलमानों के लिए (अज़सरतापा) खुशखबरी है
और (ऐ रसूल) हम तहक़ीक़तन जानते हैं कि ये कुफ्फार तुम्हारी निस्बत कहा करते है कि उनको (तुम को) कोई आदमी क़ुरान सिखा दिया करता है हालॉकि बिल्कुल ग़लत है क्योंकि जिस शख्स की तरफ से ये लोग निस्बत देते हैं उसकी ज़बान तो अजमी है और ये तो साफ साफ अरबी ज़बान है
और हक़ीक़त अम्र ये है कि यही लोग झूठे हैं उस शख्स के सिवा जो (कलमाए कुफ्र) पर मजबूर किया जाए और उसका दिल ईमान की तरफ से मुतमइन हो जो शख्स भी ईमान लाने के बाद कुफ्र एख्तियार करे बल्कि खूब सीना कुशादा (जी खोलकर) कुफ्र करे तो उन पर ख़ुदा का ग़ज़ब है और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है
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