Wa laqad na`lamu annahum yaqooloona innamaa yu`allimuhoo bashar; lisaanul lazee yulhidoona ilaihi a`ja miyyunw wa haaza lisaanun `Arabiyyum mubeen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) हम तहक़ीक़तन जानते हैं कि ये कुफ्फार तुम्हारी निस्बत कहा करते है कि उनको (तुम को) कोई आदमी क़ुरान सिखा दिया करता है हालॉकि बिल्कुल ग़लत है क्योंकि जिस शख्स की तरफ से ये लोग निस्बत देते हैं उसकी ज़बान तो अजमी है और ये तो साफ साफ अरबी ज़बान है
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اور ہمیں معلوم ہے کہ یہ کہتے ہیں کہ اس (پیغمبر) کو ایک شخص سکھا جاتا ہے۔ مگر جس کی طرف (تعلیم کی) نسبت کرتے ہیں اس کی زبان تو عجمی ہے اور یہ صاف عربی زبان ہے
और (ऐ रसूल) हम तहक़ीक़तन जानते हैं कि ये कुफ्फार तुम्हारी निस्बत कहा करते है कि उनको (तुम को) कोई आदमी क़ुरान सिखा दिया करता है हालॉकि बिल्कुल ग़लत है क्योंकि जिस शख्स की तरफ से ये लोग निस्बत देते हैं उसकी ज़बान तो अजमी है और ये तो साफ साफ अरबी ज़बान है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
يُلْحِدُونَ: झुकाते हैं, इशारा करते हैं (यहाँ अर्थ है: जिस व्यक्ति की ओर वे आरोप लगाकर इशारा करते हैं)।
أَعْجَمِيٌّ: वह व्यक्ति जो अरबी भाषा को स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाता, चाहे वह अरब मूल का ही क्यों न हो।
مُبِينٌ: स्पष्ट, खुला हुआ और बहुत फ़सीह (सुंदर एवं प्रभावशाली)।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को दिलासा देते हुए और काफिरों के झूठे आरोपों का खंडन करते हुए फ़रमाता है कि हमें अच्छी तरह मालूम है कि मक्का के मुशरिकीन आपस में कहते हैं कि मुहम्मद (ﷺ) को यह क़ुरआन कोई इंसान सिखाता है। वे इस आरोप में किसी ऐसे व्यक्ति की ओर इशारा करते थे जो अरबी भाषा में अच्छी तरह बोल नहीं पाता था, बल्कि उसकी भाषा में अजमीपन (गैर-अरबीपन) था। अल्लाह तआला उनके इस झूठे आरोप को इस प्रकार बाज़ार देता है कि जिस व्यक्ति की ओर वे इशारा करते हैं, उसकी भाषा तो अजमी (गैर-अरबी) है, जिसमें फ़साहत और वज़ाहत नहीं है, जबकि यह क़ुरआन स्पष्ट अरबी भाषा में है, जो अपनी बलाग़त (वाक्पटुता), फ़साहत और स्पष्टता में अद्वितीय है। फिर यह कैसे संभव है कि एक ऐसा व्यक्ति जो अरबी भाषा में भी सही ढंग से बोल नहीं पाता, वह ऐसा अद्भुत क़ुरआन सिखाए जो अरब के सबसे फ़सीह लोगों को भी चुनौती देता है? यह उनके आरोप की बेतुकीपन को साबित करता है। यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से उतरा है, किसी इंसान की सिखाई हुई चीज़ नहीं।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को दुश्मनों के तानों और आरोपों से हिम्मत देता है, जिससे मालूम होता है कि सच्चाई पर क़ायम रहने वालों को अल्लाह की तरफ से सहारा और तसल्ली मिलती है।
क़ुरआन की फ़साहत और बलाग़त उसके अल्लाही होने की सबसे बड़ी दलील है, क्योंकि कोई इंसान, चाहे वह कितना ही बड़ा विद्वान क्यों न हो, ऐसी किताब पेश नहीं कर सकता।
झूठे आरोप लगाने वालों की बातें अक्सर आपस में टकराती हैं और उनकी बेबुनियादी खुद ही उजागर हो जाती है, जैसा कि इस आयत में उनके आरोप का खंडन उन्हीं की दलील से किया गया।
इस आयत से यह भी सीख मिलती है कि सच्चाई की पहचान के लिए तर्क और सबूत का सहारा लेना चाहिए, न कि महज़ अफवाहों और गुमान का।
क़ुरआन की भाषा अरबी में होना उसकी स्पष्टता और सार्वभौमिक चुनौती का प्रमाण है, जो हर ज़माने के लोगों के लिए हिदायत का ज़रिया है।
और (ऐ रसूल) हम जब एक आयत के बदले दूसरी आयत नाज़िल करते हैं तो हालॉकि ख़ुदा जो चीज़ नाज़िल करता है उस (की मसलहतों) से खूब वाक़िफ है मगर ये लोग (तुम को) कहने लगते हैं कि तुम बस बिल्कुल मुज़तरी (ग़लत बयान करने वाले) हो बल्कि खुद उनमें के बहुतेरे (मसालेह को) नहीं जानते
(ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि इस (क़ुरान) को तो रुहलकुदूस (जिबरील) ने तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ नाज़िल किया है ताकि जो लोग ईमान ला चुके हैं उनको साबित क़दम रखे और मुसलमानों के लिए (अज़सरतापा) खुशखबरी है
और (ऐ रसूल) हम तहक़ीक़तन जानते हैं कि ये कुफ्फार तुम्हारी निस्बत कहा करते है कि उनको (तुम को) कोई आदमी क़ुरान सिखा दिया करता है हालॉकि बिल्कुल ग़लत है क्योंकि जिस शख्स की तरफ से ये लोग निस्बत देते हैं उसकी ज़बान तो अजमी है और ये तो साफ साफ अरबी ज़बान है
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