अन-नहल · 31/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَاءُونَ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْزِي اللَّهُ الْمُتَّقِينَ ۝٣١
Jannaatu `Adniny yadkhuloonahaa tajree min tahtihal anhaaru lahum feehaa maa yashaaa`oon; kazaalika yajzil laahul muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
सदा बहार (हरे भरे) बाग़ हैं जिनमें (वे तकल्लुफ) जा पहुँचेगें उनके नीचे नहरें जारी होंगी और ये लोग जो चाहेगें उनके लिए मुयय्या (मौजूद) है यूँ ख़ुदा परहेज़गारों (को उनके किए) की जज़ा अता फरमाता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • جَنَّاتُ عَدْنٍ: स्थायी निवास के बगीचे, जहाँ से कभी निकलना नहीं होगा।
  • يَدْخُلُونَهَا: वे उनमें प्रवेश करेंगे।
  • تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ: उनके नीचे से नहरें बह रही होंगी।
  • مَا يَشَاءُونَ: जो कुछ वे चाहेंगे (हर प्रकार की इच्छाएँ पूरी होंगी)।
  • كَذَلِكَ يَجْزِي: इसी प्रकार बदला देता है।
  • الْمُتَّقِينَ: परहेज़गार, जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने पिछली आयत में मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) के लिए जो अच्छी ख़बर दी थी, इस आयत में उसकी तफ़सील बयान की है। वे जन्नत के ऐसे बाग़ हैं जो स्थायी हैं—उनमें हमेशा रहना है, कभी निकलना नहीं। उन बाग़ों में दाख़िल होते ही वहाँ के महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हुई दिखाई देंगी, जो उस जन्नत की ताज़गी और ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा देंगी। वहाँ उनके लिए वह सब कुछ मौजूद होगा जो वे चाहेंगे—हर प्रकार का खाना, पीना, आराम, सुख-सुविधाएँ, और वह सब कुछ जो दिल चाहे और आँखों को अच्छा लगे। कोई चीज़ उनसे रोकी नहीं जाएगी, न कोई कमी होगी।

यह अल्लाह का वही इनाम है जो वह अपने डरने वाले बंदों को देता है—जिन्होंने दुनिया में उसकी नाफ़रमानी से परहेज़ किया, उसके हुक्मों को माना, और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ ढाला। यह बदला सिर्फ़ हज़रत मुहम्मद ﷺ की उम्मत के मुत्तक़ियों के लिए नहीं, बल्कि पिछली उम्मतों के मुत्तक़ी लोगों को भी इसी तरह का इनाम दिया जाएगा, क्योंकि अल्लाह का क़ानून हमेशा एक जैसा रहा है—नेकी का बदला नेकी है।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह का इनाम हमेशा बेहतर होता है: जो लोग दुनिया में अल्लाह से डरकर गुनाहों से बचते हैं, अल्लाह उन्हें ऐसी जगह देगा जहाँ हर ख़्वाहिश पूरी होगी—यह उनके सब्र और परहेज़गारी का सबसे बड़ा फल है।
  2. जन्नत की असली ख़ूबसूरती: जन्नत सिर्फ़ एक बाग़ नहीं, बल्कि वहाँ हर वह चीज़ मौजूद है जो इंसान का दिल चाहे। यह हमें बताती है कि अल्लाह की रहमत और इनाम की कोई हद नहीं।
  3. परहेज़गारी की अहमियत: यह आयत हमें तक़वा (अल्लाह का डर) अपनाने की तरग़ीब देती है। दुनिया में थोड़ी सी मुश्किलें सहकर अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ चलना, उस अनगिनत इनामों का ज़रिया बनता है जो कभी ख़त्म नहीं होंगे।
  4. उम्मीद और ख़ुशख़बरी: यह आयत हर उस इंसान के लिए उम्मीद का पैग़ाम है जो गुनाहों से बचना चाहता है और अल्लाह की तरफ़ रुजू करता है—उसके लिए जन्नत के दरवाज़े खुले हैं।
  5. अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) में एकरूपता: अल्लाह का इनाम और अज़ाब दोनों उसके क़ानून के मुताबिक़ हैं—हर ज़माने में नेक लोगों के साथ यही सलूक हुआ है। इससे हमें यक़ीन होता है कि अल्लाह का वादा सच्चा है और उसका इनाम कभी ज़ाए नहीं होता।
🎧 सुनें

📜 आयत 29-33 — अन-नहल

29فَادْخُلُوا أَبْوَابَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا ۖ فَلَبِئْسَ مَثْوَى الْمُتَكَبِّرِينَ
(अच्छा तो लो) जहन्नुम के दरवाज़ों में दाख़िल हो और इसमें हमेशा रहोगे ग़रज़ तकब्बुर करने वालो का भी क्या बुरा ठिकाना है
30۞ وَقِيلَ لِلَّذِينَ اتَّقَوْا مَاذَا أَنزَلَ رَبُّكُمْ ۚ قَالُوا خَيْرًا ۗ لِّلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۚ وَلَدَارُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ ۚ وَلَنِعْمَ دَارُ الْمُتَّقِينَ
और जब परहेज़गारों से पूछा जाता है कि तुम्हारे परवरदिगार ने क्या नाज़िल किया है तो बोल उठते हैं सब अच्छे से अच्छा जिन लोगों ने नेकी की उनके लिए इस दुनिया में (भी) भलाई (ही भलाई) है और आख़िरत का घर क्या उम्दा है
31جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَاءُونَ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْزِي اللَّهُ الْمُتَّقِينَ
सदा बहार (हरे भरे) बाग़ हैं जिनमें (वे तकल्लुफ) जा पहुँचेगें उनके नीचे नहरें जारी होंगी और ये लोग जो चाहेगें उनके लिए मुयय्या (मौजूद) है यूँ ख़ुदा परहेज़गारों (को उनके किए) की जज़ा अता फरमाता है
32الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ طَيِّبِينَ ۙ يَقُولُونَ سَلَامٌ عَلَيْكُمُ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
(ये) वह लोग हैं जिनकी रुहें फरिश्ते इस हालत में क़ब्ज़ करतें हैं कि वह (नजासते कुफ्र से) पाक व पाकीज़ा होते हैं तो फरिश्ते उनसे (निहायत तपाक से) कहते है सलामुन अलैकुम जो नेकियाँ दुनिया में तुम करते थे उसके सिले में जन्नत में (बेतकल्लुफ) चले जाओ
33هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَٰكِن كَانُوا أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
(ऐ रसूल) क्या ये (अहले मक्का) इसी बात के मुन्तिज़र है कि उनके पास फरिश्ते (क़ब्ज़े रुह को) आ ही जाएँ या (उनके हलाक करने को) तुम्हारे परवरदिगार का अज़ाब ही आ पहुँचे जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं वह ऐसी बातें कर चुके हैं और ख़ुदा ने उन पर (ज़रा भी) जुल्म नहीं किया बल्कि वह लोग ख़ुद कुफ़्र की वजह से अपने ऊपर आप जुल्म करते रहे
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अनुवाद — अन-नहल 31

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Tuesday, August 18, 2026

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