अल-कहफ · 42/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِ فَأَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلَىٰ مَا أَنفَقَ فِيهَا وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُشْرِكْ بِرَبِّي أَحَدًا ۝٤٢
Wa uheeta bisamarihee faasbaha yuqallibu kaffaihi `alaa maaa anfaqa feehaa wa hiya khaawiyatun `alaa `urooshihaa wa yaqoolu yaalaitanee lam ushrik bi Rabbeee ahadaa
📖 हिंदी अर्थ
(चुनान्चे अज़ाब नाज़िल हुआ) और उसके (बाग़ के) फल (आफत में) घेर लिए गए तो उस माल पर जो बाग़ की तैयारी में सर्फ (ख़र्च) किया था (अफसोस से) हाथ मलने लगा और बाग़ की ये हालत थी कि अपनी टहनियों पर औंधा गिरा हुआ पड़ा था तो कहने लगा काश मै अपने परवरदिगार का किसी को शरीक न बनाता
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِ: उसके फल (और पूरी पैदावार) को हर तरफ से विनाश ने घेर लिया।
  • يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ: अपने हाथों को पछतावे और अफसोस के मारे उलट-पलट करता है।
  • خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا: वह (बाग़) अपनी छतों (टट्टियों) पर गिरा हुआ था, यानी पूरी तरह तबाह और वीरान।
  • يَا لَيْتَنِي: काश! मैंने...

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस मालिक का हाल बयान कर रही है जो अपने बाग़ और दौलत पर इतना घमंड कर रहा था कि उसने अल्लाह की नेमतों से इनकार किया और आख़िरत को झुठलाया। उसके नेक दोस्त ने उसे समझाया था कि यह सब कुछ अल्लाह की देन है, लेकिन उसने नहीं माना। फिर अल्लाह का अज़ाब आया और उसके पूरे बाग़ को जड़ से उखाड़ दिया।

जब वह तबाही देखता है तो हाथ मलता है — यह अफसोस और पछतावे की वह आदत है जो इंसान उस वक़्त करता है जब उसका सब कुछ बर्बाद हो जाता है। वह सोचता है कि उसने इस बाग़ पर कितना खर्च किया, कितनी मेहनत की, लेकिन आज सब कुछ खाक में मिल गया। बाग़ की दीवारें और छतें गिर पड़ी हैं, अंगूरों की बेलें उजड़ गई हैं, और वह सिर्फ यह कह रहा है: "काश! मैंने अपने रब के साथ किसी को शरीक नहीं बनाया होता।"

यह पछतावा उस वक़्त आया जब पछतावे का कोई फायदा नहीं था। अगर वह पहले अपने दोस्त की नसीहत मान लेता, तो यह दिन न देखना पड़ता। यह आयत हमें सिखाती है कि दौलत, बाग़ और ताकत पर घमंड करना कितनी बड़ी भूल है। जो चीज़ अल्लाह देता है, वही उसे छीन भी सकता है। इसलिए हमें हर वक़्त अल्लाह का शुक्र करना चाहिए और उसके साथ किसी को शरीक नहीं करना चाहिए।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह क़िस्सा हमारे लिए एक आईना है। आज हम में से कितने लोग अपनी जायदाद, नौकरी, बच्चों या ताकत पर इतना नाज़ करते हैं कि अल्लाह को भूल जाते हैं? याद रखिए, यह सब कुछ अल्लाह की अमानत है। जिसने दिया, वही छीन सकता है। इसलिए हमेशा अल्लाह के शुक्रगुज़ार रहिए, उसकी नेमतों का सही इस्तेमाल कीजिए, और उसके साथ किसी को शरीक मत बनाइए। अगर आज आपके पास सब कुछ है, तो यह अल्लाह की मेहरबानी है — इसका घमंड नहीं, बल्कि शुक्र करना चाहिए। और अगर कभी मुश्किल आए, तो याद रखिए कि अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से कहीं बड़ी है — बस उसी की तरफ पलटिए, और उसी से माफी मांगिए।

🎧 सुनें

📜 आयत 40-44 — अल-कहफ

40فَعَسَىٰ رَبِّي أَن يُؤْتِيَنِ خَيْرًا مِّن جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًا مِّنَ السَّمَاءِ فَتُصْبِحَ صَعِيدًا زَلَقًا
तो अनक़ीरब ही मेरा परवरदिगार मुझे वह बाग़ अता फरमाएगा जो तेरे बाग़ से कहीं बेहतर होगा और तेरे बाग़ पर कोई ऐसी आफत आसमान से नाज़िल करे कि (ख़ाक सियाह) होकर चटियल चिकना सफ़ाचट मैदान हो जाए
41أَوْ يُصْبِحَ مَاؤُهَا غَوْرًا فَلَن تَسْتَطِيعَ لَهُ طَلَبًا
उसका पानी नीचे उतर (के खुश्क) हो जाए फिर तो उसको किसी तरह तलब न कर सके
42وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِ فَأَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلَىٰ مَا أَنفَقَ فِيهَا وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُشْرِكْ بِرَبِّي أَحَدًا
(चुनान्चे अज़ाब नाज़िल हुआ) और उसके (बाग़ के) फल (आफत में) घेर लिए गए तो उस माल पर जो बाग़ की तैयारी में सर्फ (ख़र्च) किया था (अफसोस से) हाथ मलने लगा और बाग़ की ये हालत थी कि अपनी टहनियों पर औंधा गिरा हुआ पड़ा था तो कहने लगा काश मै अपने परवरदिगार का किसी को शरीक न बनाता
43وَلَمْ تَكُن لَّهُ فِئَةٌ يَنصُرُونَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مُنتَصِرًا
और ख़ुदा के सिवा उसका कोई जत्था भी न था कि उसकी मदद करता और न वह बदला ले सकता था इसी जगह से (साबित हो गया
44هُنَالِكَ الْوَلَايَةُ لِلَّهِ الْحَقِّ ۚ هُوَ خَيْرٌ ثَوَابًا وَخَيْرٌ عُقْبًا
कि सरपरस्ती ख़ास ख़ुदा ही के लिए है जो सच्चा है वही बेहतर सवाब (देने) वाला है और अन्जाम के जंगल से भी वही बेहतर है
अल-कहफकुरान सूची
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अनुवाद — अल-कहफ 42

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Tuesday, August 18, 2026

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