अल-कहफ · 69/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
قَالَ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ صَابِرًا وَلَا أَعْصِي لَكَ أَمْرًا ۝٦٩
Qaala satajiduneee in shaa `al laahu saabiranw wa laaa a`see laka amraa
📖 हिंदी अर्थ
उस पर आप सब्र क्योंकर कर सकते हैं मूसा ने कहा (आप इत्मिनान रखिए) अगर ख़ुदा ने चाहा तो आप मुझे साबिर आदमी पाएँगें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • साबिरन (صَابِرًا): धैर्यवान, सहनशील
  • आ'सी (أَعْصِي): अवज्ञा करूँ, विरोध करूँ
  • अम्रन (أَمْرًا): आदेश, हुक्म

तफ़सीर:

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने हज़रत ख़िज़्र (अलैहिस्सलाम) की शर्तों को सुनकर जवाब दिया: "आप मुझे अल्लाह की तौफ़ीक़ से साबिर (धैर्यवान) पाएँगे। मैं आपके किसी भी आदेश की अवज्ञा नहीं करूँगा।"

इस जवाब में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने बड़ी ही अदब और इन्किसारी (विनम्रता) का सबक़ सिखाया। उन्होंने "इन शा अल्लाह" (अगर अल्लाह ने चाहा) कहकर अपनी ताक़त पर भरोसा नहीं जताया, बल्कि अल्लाह की मदद और तौफ़ीक़ को ज़रूरी बताया। यह नबियों और अल्लाह वालों की सुन्नत (तरीक़ा) है कि वे अपने नफ़्स पर भरोसा नहीं करते, बल्कि अल्लाह पर भरोसा करते हैं।

इस आयत से हमें कई सबक़ मिलते हैं:

  1. अल्लाह पर भरोसा: हमें हर काम में "इन शा अल्लाह" कहना चाहिए और अपनी ताक़त पर घमंड नहीं करना चाहिए। यही इंसान की कमज़ोरी और अल्लाह की कुदरत का एहसास है।
  2. उस्ताद का अदब: हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) जैसे बड़े नबी ने अपने उस्ताद के सामने पूरा अदब और इताअत (आज्ञाकारिता) का वादा किया। यह हमें सिखाता है कि इल्म (ज्ञान) हासिल करने के लिए उस्ताद की इज़्ज़त और उनके हुक्म की पैरवी ज़रूरी है।
  3. धैर्य की अहमियत: सीखने और तरक़्क़ी के सफ़र में सब्र (धैर्य) बहुत ज़रूरी है। बिना सब्र के इल्म और हिकमत (ज्ञान और बुद्धि) हासिल नहीं हो सकती।
  4. वादे की पाबंदी: हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने वादा किया कि वे किसी भी आदेश की अवज्ञा नहीं करेंगे। यह हमें सिखाता है कि अच्छे इंसान की पहचान उसके वादे की पाबंदी से होती है।

यह आयत हमें बताती है कि इल्म हासिल करने के लिए इंसान को अपने अहंकार (ego) को छोड़ना पड़ता है और अपने उस्ताद के सामने पूरी तरह से समर्पण करना पड़ता है। जो लोग इल्म के सफ़र में सब्र और अदब से काम लेते हैं, अल्लाह उन्हें वो हिकमत अता करता है जो आम लोगों को नहीं मिलती।

प्यारे भाइयों और बहनों! आज हमें भी चाहिए कि हम दीन की तालीम (शिक्षा) हासिल करते वक़्त सब्र और अदब से काम लें, और अल्लाह से तौफ़ीक़ की दुआ करते रहें। अल्लाह हमें अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 67-71 — अल-कहफ

67قَالَ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِيَ صَبْرًا
कि जो रहनुमाई का इल्म आपको है (ख़ुदा की तरफ से) सिखाया गया है उसमें से कुछ मुझे भी सिखा दीजिए खिज्र ने कहा (मै सिखा दूँगा मगर) आपसे मेरे साथ सब्र न हो सकेगा
68وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَىٰ مَا لَمْ تُحِطْ بِهِ خُبْرًا
और (सच तो ये है) जो चीज़ आपके इल्मी अहाते से बाहर हो
69قَالَ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ صَابِرًا وَلَا أَعْصِي لَكَ أَمْرًا
उस पर आप सब्र क्योंकर कर सकते हैं मूसा ने कहा (आप इत्मिनान रखिए) अगर ख़ुदा ने चाहा तो आप मुझे साबिर आदमी पाएँगें
70قَالَ فَإِنِ اتَّبَعْتَنِي فَلَا تَسْأَلْنِي عَن شَيْءٍ حَتَّىٰ أُحْدِثَ لَكَ مِنْهُ ذِكْرًا
और मै आपके किसी हुक्म की नाफरमानी न करुँगा खिज्र ने कहा अच्छा तो अगर आप को मेरे साथ रहना है तो जब तक मै खुद आपसे किसी बात का ज़िक्र न छेडँ
71فَانطَلَقَا حَتَّىٰ إِذَا رَكِبَا فِي السَّفِينَةِ خَرَقَهَا ۖ قَالَ أَخَرَقْتَهَا لِتُغْرِقَ أَهْلَهَا لَقَدْ جِئْتَ شَيْئًا إِمْرًا
आप मुझसे किसी चीज़ के बारे में न पूछियेगा ग़रज़ ये दोनो (मिलकर) चल खड़े हुए यहाँ तक कि (एक दरिया में) जब दोनों कश्ती में सवार हुए तो ख़िज्र ने कश्ती में छेद कर दिया मूसा ने कहा (आप ने तो ग़ज़ब कर दिया) क्या कश्ती में इस ग़रज़ से सुराख़ किया है
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अनुवाद — अल-कहफ 69

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Tuesday, August 18, 2026

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