अल-बकरा · 211/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
سَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ كَمْ آتَيْنَاهُم مِّنْ آيَةٍ بَيِّنَةٍ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ اللَّهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ ۝٢١١
Sal Banee Israaa`eela kam aatainaahum min aayatim baiyinah; wa mai yubaddil ni`matal laahi mim ba`di maa jaaa`athu fa innallaaha shadeedul`iqaab
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेशक़ ख़ुदा सख्त अज़ाब वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَلْ – पूछिए, प्रश्न कीजिए।
  • آيَةٍ بَيِّنَةٍ – स्पष्ट निशानियाँ, खुले प्रमाण और चमत्कार।
  • يُبَدِّلْ – बदल दे, उलट-पलट दे, इनकार कर दे।
  • نِعْمَةَ اللهِ – अल्लाह की नेमत, जो यहाँ धर्म और मार्गदर्शन के अर्थ में है।
  • شَدِيدُ الْعِقَابِ – सख्त सज़ा देने वाला।

व्याख्या:

ऐ नबी! आप बनी इसराईल (इसराइल की संतान) से पूछिए—और यह प्रश्न उन्हें झिड़कने और उनके किए पर पर्दा उठाने के लिए है—कि हमने उन्हें कितनी स्पष्ट निशानियाँ दीं! उनके पूर्वजों के पास मूसा (अलैहिस्सलाम) के समय ऐसे खुले चमत्कार और प्रमाण आए जो सत्य को उजागर करने वाले थे, और उनकी किताबों (तौरात) में ऐसी साफ-साफ दलीलें मौजूद थीं जो उन्हें सीधे रास्ते की ओर बुलाती थीं, यहाँ तक कि आख़िरी नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आने की ख़बरें भी उनमें दर्ज थीं। इसके बावजूद उन्होंने उन सबको झुठलाया, उनसे मुँह मोड़ा और उन्हें तोड़-मरोड़ कर पेश किया। फिर जो कोई अल्लाह की नेमत—यानी उसका धर्म और उसकी स्पष्ट निशानियाँ—को जानने और उसके सत्य साबित हो जाने के बाद बदल डाले, उसे झुठलाए या उसका इनकार करे, तो अल्लाह उसे बहुत सख्त सज़ा देने वाला है। उसका इनकार उसे अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकता, क्योंकि अल्लाह की सज़ा बेहद कड़ी है।

फ़ायदे और सबक:

  1. अल्लाह की नेमतों को पहचानना और उनका शुक्र अदा करना हर इंसान का फ़र्ज़ है; नेमत को झुठलाना या बदलना अल्लाह के क्रोध का कारण बनता है।
  2. ज्ञान और स्पष्ट प्रमाण मिलने के बाद इनकार करना आम इनकार से कहीं ज़्यादा बुरा है, इसलिए हर इंसान को चाहिए कि सच्चाई सामने आने पर उसे तुरंत क़बूल करे।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की दी हुई नेमतें—चाहे वह धर्म हो, ज्ञान हो या कोई और भलाई—अमानत हैं; उन्हें संभाल कर रखना चाहिए, न कि उनसे मुँह मोड़ना चाहिए।
  4. अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, लेकिन वह उन्हीं पर आती है जो जानबूझकर सत्य का विरोध करते हैं; यह हमें सचेत करता है कि हम अपने जीवन में अल्लाह के दिए मार्गदर्शन को कभी तुच्छ न समझें।
🎧 सुनें

📜 आयत 209-213 — अल-बकरा

209فَإِن زَلَلْتُم مِّن بَعْدِ مَا جَاءَتْكُمُ الْبَيِّنَاتُ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
फिर जब तुम्हारे पास रौशन दलीले आ चुकी उसके बाद भी डगमगा गए तो अच्छी तरह समझ लो कि ख़ुदा (हर तरह) ग़ालिब और तदबीर वाला है
210هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن يَأْتِيَهُمُ اللَّهُ فِي ظُلَلٍ مِّنَ الْغَمَامِ وَالْمَلَائِكَةُ وَقُضِيَ الْأَمْرُ ۚ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ
क्या वह लोग इसी के मुन्तज़िर हैं कि सफेद बादल के साय बानो की आड़ में अज़ाबे ख़ुदा और अज़ाब के फ़रिश्ते उन पर ही आ जाए और सब झगड़े चुक ही जाते हालॉकि आख़िर कुल उमुर ख़ुदा ही की तरफ रुजू किए जाएँगे
211سَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ كَمْ آتَيْنَاهُم مِّنْ آيَةٍ بَيِّنَةٍ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ اللَّهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेशक़ ख़ुदा सख्त अज़ाब वाला है
212زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا ۘ وَالَّذِينَ اتَّقَوْا فَوْقَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ وَاللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
जिन लोगों ने कुफ्र इख्तेयार किया उन के लिये दुनिया की ज़रा सी ज़िन्दगी ख़ूब अच्छी दिखायी गयी है और ईमानदारों से मसखरापन करते हैं हालॉकि क़यामत के दिन परहेज़गारों का दरजा उनसे (कहीं) बढ़ चढ़ के होगा और ख़ुदा जिस को चाहता है बे हिसाब रोज़ी अता फरमाता है
213كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَمَا اخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا الَّذِينَ أُوتُوهُ مِن بَعْدِ مَا جَاءَتْهُمُ الْبَيِّنَاتُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا لِمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ مِنَ الْحَقِّ بِإِذْنِهِ ۗ وَاللَّهُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है
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211आयत

अनुवाद — अल-बकरा 211

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Tuesday, August 18, 2026

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