अल-बकरा · 273/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
لِلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُحْصِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ الْجَاهِلُ أَغْنِيَاءَ مِنَ التَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَاهُمْ لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ ۝٢٧٣
Lilfuqaraaa`il lazeena uhsiroo fee sabeelil laahi laa yastatee`oona darban fil ardi yah sabuhumul jaahilu aghniyaaa`a minat ta`affufi ta`rifuhum biseemaahum laa yas`aloonan naasa ilhaafaa; wa maa tunfiqoo min khairin fa innal laaha bihee `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
(यह खैरात) ख़ास उन हाजतमन्दों के लिए है जो ख़ुदा की राह में घिर गये हो (और) रूए ज़मीन पर (जाना चाहें तो) चल नहीं सकते नावाक़िफ़ उनको सवाल न करने की वजह से अमीर समझते हैं (लेकिन) तू (ऐ मुख़ातिब अगर उनको देखे) तो उनकी सूरत से ताड़ जाये (कि ये मोहताज हैं अगरचे) लोगों से चिमट के सवाल नहीं करते और जो कुछ भी तुम नेक काम में ख़र्च करते हो ख़ुदा उसको ज़रूर जानता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أُحْصِرُوا: रोक दिए गए, बंदी बना लिए गए।
  • ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ: ज़मीन में चलना, यानी रोज़ी-रोटी के लिए सफ़र करना।
  • التَّعَفُّفِ: भीख माँगने से बचना, सवाल न करना, अपने आप को बचाए रखना।
  • بِسِيمَاهُمْ: उनकी निशानियों से, उनके चेहरे और हालत से।
  • إِلْحَافًا: लगातार और ज़्यादा तकलीफ़ देकर माँगना, हठपूर्वक सवाल करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में बताती है जो अल्लाह के रास्ते में (जिहाद या इबादत के लिए) रुके हुए हैं और रोज़ी-रोटी के लिए ज़मीन में सफ़र नहीं कर सकते। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की राह में कुर्बान कर दी है, और उनकी मजबूरी के कारण वे व्यापार या काम-धंधे के लिए बाहर नहीं जा सकते।

ऐसे लोगों की ख़ासियत यह है कि वे भीख माँगने से इतना बचते हैं कि जो शख्स उन्हें नहीं जानता, वह उन्हें अमीर समझ बैठता है। उनके चेहरे पर ग़रीबी और ज़रूरत के निशान साफ़ दिखाई देते हैं, लेकिन वे किसी से कुछ नहीं माँगते। अगर कभी मजबूरी में माँगना पड़े भी, तो वे लगातार और तकलीफ़ देकर नहीं माँगते, बल्कि बहुत ही संकोच और शर्म के साथ माँगते हैं।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि तुम जो भी अच्छी चीज़ (धन, वस्त्र, भोजन आदि) ख़र्च करोगे, अल्लाह उसे पूरी तरह जानता है और उसका पूरा-पूरा बदला क़यामत के दिन देगा। यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि अपना ख़ैरात (दान) उन्हीं लोगों को दो जो सच्चे ग़रीब हैं, चाहे वे दिखने में अमीर ही क्यों न लगें।

फ़ायदे (सीख):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दान करते समय सबसे पहले उन लोगों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो अल्लाह की राह में लगे हुए हैं और अपनी ज़रूरतों के बावजूद लोगों से माँगने से बचते हैं।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी ज़रूरतों को छिपाए और भीख माँगने से बचे, क्योंकि यह एक बहुत बड़ी इज़्ज़त और आत्म-सम्मान की बात है।
  3. अल्लाह तआला हर छोटे-बड़े ख़र्च को जानता है, और उसका बदला कभी ज़ाया नहीं करता। यह हमें नेकी और ख़ैरात पर उत्साहित करता है।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम में ग़रीबों की इज़्ज़त और उनके जज़्बात का पूरा ख़्याल रखा गया है, और उन्हें बेइज़्ज़त करने या उनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाने की इजाज़त नहीं है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि दान देते समय सिर्फ़ दिखावे या ज़ाहिरी हालत को नहीं देखना चाहिए, बल्कि असली ज़रूरतमंदों की पहचान करनी चाहिए, जो अक्सर अपनी ग़रीबी छिपाते हैं।

📜 आयत 271-275 — अल-बकरा

271إِن تُبْدُوا الصَّدَقَاتِ فَنِعِمَّا هِيَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا الْفُقَرَاءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّئَاتِكُمْ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
अगर ख़ैरात को ज़ाहिर में दो तो यह (ज़ाहिर करके देना) भी अच्छा है और अगर उसको छिपाओ और हाजतमन्दों को दो तो ये छिपा कर देना तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है और ऐसे देने को ख़ुदा तुम्हारे गुनाहों का कफ्फ़ारा कर देगा और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
272۞ لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَاهُمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ
ऐ रसूल उनका मंज़िले मक़सूद तक पहुंचाना तुम्हारा काम नहीं (तुम्हारा काम सिर्फ रास्ता दिखाना है) मगर हॉ ख़ुदा जिसको चाहे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे और (लोगों) तुम जो कुछ नेक काम में ख़र्च करोगे तो अपने लिए और तुम ख़ुदा की ख़ुशनूदी के सिवा और काम में ख़र्च करते ही नहीं हो (और जो कुछ तुम नेक काम में ख़र्च करोगे) (क़यामत में) तुमको भरपूर वापस मिलेगा और तुम्हारा हक़ न मारा जाएगा
273لِلْفُقَرَاءِ الَّذِينَ أُحْصِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ الْجَاهِلُ أَغْنِيَاءَ مِنَ التَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَاهُمْ لَا يَسْأَلُونَ النَّاسَ إِلْحَافًا ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ بِهِ عَلِيمٌ
(यह खैरात) ख़ास उन हाजतमन्दों के लिए है जो ख़ुदा की राह में घिर गये हो (और) रूए ज़मीन पर (जाना चाहें तो) चल नहीं सकते नावाक़िफ़ उनको सवाल न करने की वजह से अमीर समझते हैं (लेकिन) तू (ऐ मुख़ातिब अगर उनको देखे) तो उनकी सूरत से ताड़ जाये (कि ये मोहताज हैं अगरचे) लोगों से चिमट के सवाल नहीं करते और जो कुछ भी तुम नेक काम में ख़र्च करते हो ख़ुदा उसको ज़रूर जानता है
274الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُم بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ سِرًّا وَعَلَانِيَةً فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
जो लोग रात को या दिन को छिपा कर या दिखा कर (ख़ुदा की राह में) ख़र्च करते हैं तो उनके लिए उनका अज्र व सवाब उनके परवरदिगार के पास है और (क़यामत में) न उन पर किसी क़िस्म का ख़ौफ़ होगा और न वह आज़ुर्दा ख़ातिर होंगे
275الَّذِينَ يَأْكُلُونَ الرِّبَا لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ الَّذِي يَتَخَبَّطُهُ الشَّيْطَانُ مِنَ الْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا إِنَّمَا الْبَيْعُ مِثْلُ الرِّبَا ۗ وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ الرِّبَا ۚ فَمَن جَاءَهُ مَوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّهِ فَانتَهَىٰ فَلَهُ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُ إِلَى اللَّهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
जो लोग सूद खाते हैं वह (क़यामत में) खड़े न हो सकेंगे मगर उस शख्स की तरह खड़े होंगे जिस को शैतान ने लिपट कर मख़बूतुल हवास (पागल) बना दिया है ये इस वजह से कि वह उसके क़ायल हो गए कि जैसा बिक्री का मामला वैसा ही सूद का मामला हालॉकि बिक्री को तो खुदा ने हलाल और सूद को हराम कर दिया बस जिस शख्स के पास उसके परवरदिगार की तरफ़ से नसीहत (मुमानियत) आये और वह बाज़ आ गया तो इस हुक्म के नाज़िल होने से पहले जो सूद ले चुका वह तो उस का हो चुका और उसका अम्र (मामला) ख़ुदा के हवाले है और जो मनाही के बाद फिर सूद ले (या बिक्री के माले को यकसा बताए जाए) तो ऐसे ही लोग जहन्नुम में रहेंगे
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अनुवाद — अल-बकरा 273

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Tuesday, August 18, 2026

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