अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- أُحْصِرُوا: रोक दिए गए, बंदी बना लिए गए।
- ضَرْبًا فِي الْأَرْضِ: ज़मीन में चलना, यानी रोज़ी-रोटी के लिए सफ़र करना।
- التَّعَفُّفِ: भीख माँगने से बचना, सवाल न करना, अपने आप को बचाए रखना।
- بِسِيمَاهُمْ: उनकी निशानियों से, उनके चेहरे और हालत से।
- إِلْحَافًا: लगातार और ज़्यादा तकलीफ़ देकर माँगना, हठपूर्वक सवाल करना।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में बताती है जो अल्लाह के रास्ते में (जिहाद या इबादत के लिए) रुके हुए हैं और रोज़ी-रोटी के लिए ज़मीन में सफ़र नहीं कर सकते। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की राह में कुर्बान कर दी है, और उनकी मजबूरी के कारण वे व्यापार या काम-धंधे के लिए बाहर नहीं जा सकते।
ऐसे लोगों की ख़ासियत यह है कि वे भीख माँगने से इतना बचते हैं कि जो शख्स उन्हें नहीं जानता, वह उन्हें अमीर समझ बैठता है। उनके चेहरे पर ग़रीबी और ज़रूरत के निशान साफ़ दिखाई देते हैं, लेकिन वे किसी से कुछ नहीं माँगते। अगर कभी मजबूरी में माँगना पड़े भी, तो वे लगातार और तकलीफ़ देकर नहीं माँगते, बल्कि बहुत ही संकोच और शर्म के साथ माँगते हैं।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि तुम जो भी अच्छी चीज़ (धन, वस्त्र, भोजन आदि) ख़र्च करोगे, अल्लाह उसे पूरी तरह जानता है और उसका पूरा-पूरा बदला क़यामत के दिन देगा। यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि अपना ख़ैरात (दान) उन्हीं लोगों को दो जो सच्चे ग़रीब हैं, चाहे वे दिखने में अमीर ही क्यों न लगें।
फ़ायदे (सीख):
- इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दान करते समय सबसे पहले उन लोगों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो अल्लाह की राह में लगे हुए हैं और अपनी ज़रूरतों के बावजूद लोगों से माँगने से बचते हैं।
- यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी ज़रूरतों को छिपाए और भीख माँगने से बचे, क्योंकि यह एक बहुत बड़ी इज़्ज़त और आत्म-सम्मान की बात है।
- अल्लाह तआला हर छोटे-बड़े ख़र्च को जानता है, और उसका बदला कभी ज़ाया नहीं करता। यह हमें नेकी और ख़ैरात पर उत्साहित करता है।
- इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम में ग़रीबों की इज़्ज़त और उनके जज़्बात का पूरा ख़्याल रखा गया है, और उन्हें बेइज़्ज़त करने या उनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाने की इजाज़त नहीं है।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दान देते समय सिर्फ़ दिखावे या ज़ाहिरी हालत को नहीं देखना चाहिए, बल्कि असली ज़रूरतमंदों की पहचान करनी चाहिए, जो अक्सर अपनी ग़रीबी छिपाते हैं।
📜 आयत 271-275 — अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 273
सूरा अल-बकरा आयत 273 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (यह खैरात) ख़ास उन हाजतमन्दों के लिए है जो ख़ुदा…सूरा आयत 273/286 — अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-बकरा सुनें, अल-बकरा अनुवाद, अल-बकरा mp3, अल-बकरा pdf. आयत 271–275. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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