अल-अंबिया · 43/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
أَمْ لَهُمْ آلِهَةٌ تَمْنَعُهُم مِّن دُونِنَا ۚ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنفُسِهِمْ وَلَا هُم مِّنَّا يُصْحَبُونَ ۝٤٣
Am lahum aalihatun tamna`ulum min dooninaa; laa yastatee`oona nasra anfusihim wa laa hum minnna yus-haboon
📖 हिंदी अर्थ
क्या हमरो सिवा उनके कुछ और परवरदिगार हैं कि जो उनको (हमारे अज़ाब से) बचा सकते हैं (वह क्या बचाएँगे) ये लोग खुद अपनी आप तो मदद कर ही नहीं सकते और न हमारे अज़ाब से उन्हें पनाह दी जाएगी
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • آلِهَةٌ — पूज्य देवता या माबूद।
  • تَمْنَعُهُم — उन्हें बचाएँ / रोक दें।
  • مِن دُونِنَا — हमारे सिवा / हमारे अज़ाब के मुक़ाबले में।
  • لَا يَسْتَطِيعُونَ — वे (देवता) सामर्थ्य नहीं रखते।
  • نَصْرَ أَنفُسِهِمْ — अपनी ही मदद करना।
  • يُصْحَبُونَ — उन्हें पनाह दी जाए / उन्हें बचाया जाए (अज़ाब से)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकीन (बहुदेववादियों) से एक सवालिया अंदाज़ में फ़रमाता है: क्या उनके पास ऐसे माबूद हैं जो हमारे अज़ाब से उन्हें बचा सकें? यानी क्या उन्होंने ऐसे देवता बना रखे हैं जो हमारी पकड़ से उन्हें छुड़ा सकें? यह एक ऐसा सवाल है जो उनके अक़ीदे की बुनियाद को हिला देता है।

फिर अल्लाह उन देवताओं की हक़ीक़त बयान करता है — वे देवता ख़ुद अपनी मदद नहीं कर सकते। अगर उन पर कोई मुसीबत आ जाए, अगर उन्हें कोई नुक़सान पहुँचे, तो वे उसे टालने की ताक़त नहीं रखते। जो ख़ुद अपनी रक्षा न कर सके, वह दूसरों की रक्षा क्या करेगा? और यह भी कि उन देवताओं को हमारे अज़ाब से कोई पनाह नहीं मिल सकती — न वे किसी को पनाह दे सकते हैं, न ख़ुद पनाह पा सकते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के सिवा किसी और से मदद माँगना, किसी और पर भरोसा करना, किसी और को पूजना — यह सब बिल्कुल बेकार है। सिर्फ़ अल्लाह ही है जो अपने बंदों की हिफ़ाज़त करता है, उन्हें मुसीबतों से बचाता है, और उन्हें अपनी रहमत से पनाह देता है।

इस आयत में एक बड़ी नसीहत है — हमें अपनी ज़िंदगी में सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। जब हम जान लें कि अल्लाह के सिवा कोई मददगार नहीं, कोई बचाने वाला नहीं, तो हमारा दिल सिर्फ़ उसी की तरफ़ मुड़ता है। और जो दिल अल्लाह से जुड़ जाए, उसे किसी और की ज़रूरत नहीं रहती। यही तोहीद (एकेश्वरवाद) की असली मिठास है — कि बंदा अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरता, और अल्लाह के सिवा किसी से उम्मीद नहीं रखता।

🎧 सुनें

📜 आयत 41-45 — अल-अंबिया

41وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذِينَ سَخِرُوا مِنْهُم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
और (ऐ रसूल) कुछ तुम ही नहीं तुमसे पहले पैग़म्बरों के साथ मसख़रापन किया जा चुका है तो उन पैग़म्बरों से मसखरापन करने वालों को उस सख्त अज़ाब ने आ घेर लिया जिसकी वह हँसी उड़ाया करते थे
42قُلْ مَن يَكْلَؤُكُم بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ مِنَ الرَّحْمَٰنِ ۗ بَلْ هُمْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِم مُّعْرِضُونَ
(ऐ रसूल) तुम उनसे पूछो तो कि खुदा (के अज़ाब) से (बचाने में) रात को या दिन को तुम्हारा कौन पहरा दे सकता है उस पर डरना तो दर किनार बल्कि ये लोग अपने परवरदिगार की याद से मुँह फेरते हैं
43أَمْ لَهُمْ آلِهَةٌ تَمْنَعُهُم مِّن دُونِنَا ۚ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنفُسِهِمْ وَلَا هُم مِّنَّا يُصْحَبُونَ
क्या हमरो सिवा उनके कुछ और परवरदिगार हैं कि जो उनको (हमारे अज़ाब से) बचा सकते हैं (वह क्या बचाएँगे) ये लोग खुद अपनी आप तो मदद कर ही नहीं सकते और न हमारे अज़ाब से उन्हें पनाह दी जाएगी
44بَلْ مَتَّعْنَا هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ طَالَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ ۗ أَفَلَا يَرَوْنَ أَنَّا نَأْتِي الْأَرْضَ نَنقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا ۚ أَفَهُمُ الْغَالِبُونَ
बल्कि हम ही ने उनको और उनके बुर्जुग़ों को आराम व चैन रहा यहाँ तक कि उनकी उम्रें बढ़ गई तो फिर क्या ये लोग नहीं देखते कि हम रूए ज़मीन को चारों तरफ से क़ब्ज़ा करते और उसको फतेह करते चले आते हैं तो क्या (अब भी यही लोग कुफ्फ़ारे मक्का) ग़ालिब और वर हैं
45قُلْ إِنَّمَا أُنذِرُكُم بِالْوَحْيِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ الصُّمُّ الدُّعَاءَ إِذَا مَا يُنذَرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो बस तुम लोगों को ''वही'' के मुताबिक़ (अज़ाब से) डराता हूँ (मगर तुम लोग गोया बहरे हो) और बहरों को जब डराया जाता है तो वह पुकारने ही को नहीं सुनते (डरें क्या ख़ाक)
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अनुवाद — अल-अंबिया 43

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सूरा आयत 43/112 — अल-अंबिया الأنبياء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अंबिया सुनें, अल-अंबिया अनुवाद, अल-अंबिया mp3, अल-अंबिया pdf. आयत 41–45. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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