Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
بَلْ قَالُوا أَضْغَاثُ أَحْلَامٍ... (अर्थात, उन्होंने कहा: ये तो सपनों के उलझे हुए टुकड़े हैं)
शब्दों के अर्थ:
- أَضْغَاثُ أَحْلَامٍ: उलझे हुए, मिले-जुले और बेमतलब के सपने, जिनकी कोई हकीकत नहीं होती।
- افْتَرَاهُ: उसने इसे स्वयं गढ़ लिया है, अर्थात झूठ बना लिया है।
- شَاعِرٌ: शायर (कवि), और उनका मतलब था कि यह कलाम शायरी है, वह शायर है।
- آيَةٌ: निशानी, चमत्कार, वह मौजिज़ा जो नबियों को दिया जाता है।
- كَمَا أُرْسِلَ الْأَوَّلُونَ: जैसे पहले भेजे गए रसूलों के साथ चमत्कार भेजे गए थे।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उस हठधर्मिता और जिद को बयान करती है जो काफ़िरों ने अपनाई थी जब उन्हें सच्चाई पेश की गई। उन्होंने कुरआन को सुनकर भी उसे कबूल नहीं किया, बल्कि उसके बारे में अलग-अलग बातें गढ़ने लगे। कभी कहते कि ये तो सपनों के उलझे हुए टुकड़े हैं, जिनका कोई मतलब नहीं। कभी कहते कि नहीं, ये तो उसने खुद गढ़ लिया है, यह कोई वही (प्रकाशना) नहीं है। और कभी कहते कि वह तो शायर है, और यह सब शायरी है।
फिर उन्होंने एक और बात कही कि अगर वह सच्चा है तो हमारे सामने कोई ऐसा चमत्कार लाए जैसे पहले के रसूलों के साथ आए थे — जैसे सालेह अलैहिस्सलाम की ऊँटनी, मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी, और ईसा अलैहिस्सलाम के मुर्दे ज़िंदा करने का मौजिज़ा।
यह उनकी जिद और सच्चाई से मुँह मोड़ने की सबसे बड़ी दलील थी। वे सच्चाई को मानने के लिए तैयार नहीं थे, बल्कि हर बार कोई न कोई बहाना ढूँढ़ते रहे। जब कुरआन उनके सामने आया — जो अपने आप में सबसे बड़ा चमत्कार है, जिसकी तरफ चुनौती दी गई कि इस जैसी एक सूरत बना कर लाओ, और वे न ला सके — तब भी उन्होंने उसे नहीं माना और नए-नए बहाने बनाते रहे।
इस आयत से हमें सबक मिलता है कि जिस दिल में हक़ (सच्चाई) को कबूल करने की नीयत न हो, उसके लिए कोई भी दलील और चमत्कार काफी नहीं होता। अल्लाह तआला ने पैगंबर मुहम्मद ﷺ को कुरआन जैसा जावेदानी (स्थायी) चमत्कार दिया, जो क़यामत तक के लिए है। यह किताब अपने अंदर इंसानियत की हर ज़रूरत का हल रखती है, और इसकी बलाग़त (वाक्पटुता), इसका इल्म और इसकी हिदायत ऐसी है कि अक्लमंद इंसान उसे पढ़कर यकीन कर लेता है कि यह अल्लाह का कलाम है।
हमें चाहिए कि हम कुरआन को सिर्फ पढ़ने तक ही सीमित न रखें, बल्कि उस पर अमल करें और उसे अपनी ज़िंदगी का नक्शा बनाएं। क्योंकि यही वह किताब है जो हमें दुनिया और आख़िरत की भलाई तक पहुँचाती है। अल्लाह हमें कुरआन को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
📜 आयत 3-7 — सूरा अल-अंबिया
अनुवाद — अल-अंबिया 5
सूरा अल-अंबिया आयत 5 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (उस पर भी उन लोगों ने इक्तिफ़ा न की) बल्कि…सूरा आयत 5/112 — सूरा अल-अंबिया الأنبياء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अंबिया सुनें, सूरा अल-अंबिया अनुवाद, सूरा अल-अंबिया mp3, सूरा अल-अंबिया pdf. आयत 3–7. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-अंबिया
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


