अल-हज · 34/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हज
وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّن بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ۗ فَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا ۗ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ ۝٣٤
Wa likulli ummatin ja`alnaa mansakal liyazkurus mal laahi `alaa maa razaqahum mim baheematil an`aam; failaahukum ilaahunw Waahidun falahooo aslimoo; wa bashshiril mukhbiteen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मन्सकन (مَنسَكًا): अर्थात क़ुर्बानी का स्थान, या क़ुर्बानी की रस्म और तरीक़ा।
  • बहीमतिल अनआम (بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ): चौपाये जानवर, जिनमें ऊँट, गाय, बकरी आदि शामिल हैं।
  • मुख़बितीन (الْمُخْبِتِينَ): वे लोग जो अल्लाह के आगे झुकने वाले, विनम्र और नम्र हों, जिनके दिल अल्लाह के ज़िक्र से इत्मिनान पाते हैं।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि हर उम्मत (समुदाय) के लिए, जो पहले गुज़री है, हमने क़ुर्बानी की रस्म मुक़र्रर की थी। यह एक पुरानी और सार्वभौमिक इबादत है, जो अल्लाह की वहदानियत (एकता) और उसकी नेमतों के शुक्र का ज़रिया है। इसका मक़सद यह है कि लोग उन जानवरों को ज़बह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें रिज़्क़ के तौर पर दिए हैं — जैसे ऊँट, गाय, बकरी और भेड़। यह ज़िक्र सिर्फ़ ज़बान से नहीं, बल्कि दिल की गहराई से होना चाहिए, ताकि बंदे को याद रहे कि यह रिज़्क़ अल्लाह की तरफ़ से है और उसी के नाम पर इसे ज़बह किया जा रहा है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: "तुम्हारा माबूद (पूज्य) सिर्फ़ एक ही है — वह अल्लाह है।" यह एकता का पैग़ाम है, जो सभी उम्मतों को दिया गया। इसलिए ऐ लोगों! तुम सब उसी के आगे झुको, उसी की इताअत (आज्ञाकारिता) करो, और अपने आप को उसी के सुपुर्द कर दो। इस्लाम का मतलब ही यही है — अल्लाह के सामने पूर्ण समर्पण। जो लोग ऐसा करते हैं, वही असली मुसलमान हैं।

आख़िर में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को हुक्म देते हैं कि वे "मुख़बितीन" — यानी उन लोगों को ख़ुशख़बरी सुनाएँ जो अल्लाह के आगे झुकने वाले, विनम्र, नम्र और उसकी इबादत में सच्चे हैं। उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई है। वे अल्लाह के ज़िक्र से दिलों को तसल्ली देते हैं, और अल्लाह उन्हें अपनी रहमत, मग़फ़िरत और जन्नत की ख़ुशख़बरी देता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुर्बानी सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि अल्लाह से जुड़ने का ज़रिया है। जब हम अपने माल में से अल्लाह के नाम पर क़ुर्बानी करते हैं, तो हम यह सबूत देते हैं कि हमारा दिल अल्लाह की मोहब्बत से भरा है और हम उसकी नेमतों के शुक्रगुज़ार हैं। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की वहदानियत की तरफ़ ले जाता है — एक अल्लाह, एक उम्मत, एक रस्म। और जो लोग इस रास्ते पर चलते हैं, उनके लिए अल्लाह ने बेशुमार ख़ुशियाँ तैयार कर रखी हैं। आओ, हम सब अपने दिलों को अल्लाह के आगे झुकाएँ, उसकी इताअत करें, और उस विनम्रता को अपनाएँ जो हमें दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाती है।



📜 आयत 32-36 — सूरा अल-हज

32ذَٰلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ
ये (याद रखो) और जिस शख्स ने खुदा की निशानियों की ताज़ीम की तो कुछ शक नहीं कि ये भी दिलों की परहेज़गारी से हासिल होती है
33لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ثُمَّ مَحِلُّهَا إِلَى الْبَيْتِ الْعَتِيقِ
और इन चार पायों में एक मुअय्युन मुद्दत तक तुम्हार लिये बहुत से फायदें हैं फिर उनके ज़िबाह होने की जगह क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा है
34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّن بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ۗ فَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا ۗ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ
और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ
35الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَالصَّابِرِينَ عَلَىٰ مَا أَصَابَهُمْ وَالْمُقِيمِي الصَّلَاةِ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और (ऐ रसूल हमारे) गिड़गिड़ाने वाले बन्दों को (बेहश्त की) खुशख़बरी दे दो ये वह हैं कि जब (उनके सामने) खुदा का नाम लिया जाता है तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उनपर कोई मुसीबत आ पड़े तो सब्र करते हैं और नमाज़ पाबन्दी से अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है उसमें से (राहे खुदा में) ख़र्च करते हैं
36وَالْبُدْنَ جَعَلْنَاهَا لَكُم مِّن شَعَائِرِ اللَّهِ لَكُمْ فِيهَا خَيْرٌ ۖ فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ ۖ فَإِذَا وَجَبَتْ جُنُوبُهَا فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْقَانِعَ وَالْمُعْتَرَّ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرْنَاهَا لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
और कुरबानी (मोटे गदबदे) ऊँट भी हमने तुम्हारे वास्ते खुदा की निशानियों में से क़रार दिया है इसमें तुम्हारी बहुत सी भलाईयाँ हैं फिर उनका तांते का तांता बाँध कर ज़िबाह करो और उस वक्त उन पर खुदा का नाम लो फिर जब उनके दस्त व बाजू काटकर गिर पड़े तो उन्हीं से तुम खुद भी खाओ और केनाअत पेशा फक़ीरों और माँगने वाले मोहताजों (दोनों) को भी खिलाओ हमने यूँ इन जानवरों को तुम्हारा ताबेए कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
34आयत

अनुवाद — अल-हज 34

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Monday, September 28, 2026

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