अन-नमल · 34/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
قَالَتْ إِنَّ الْمُلُوكَ إِذَا دَخَلُوا قَرْيَةً أَفْسَدُوهَا وَجَعَلُوا أَعِزَّةَ أَهْلِهَا أَذِلَّةً ۖ وَكَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ ۝٣٤
Qaalat innal mulooka izaa dakhaloo qaryatan afsadoohaa wa ja`alooo a`izzata ahlihaaa azillah; wa kazaalika yaf`aloon
📖 हिंदी अर्थ
मलका ने कहा बादशाहों का क़ायदा है कि जब किसी बस्ती में (बज़ोरे फ़तेह) दाख़िल हो जाते हैं तो उसको उजाड़ देते हैं और वहाँ के मुअज़िज़ लोगों को ज़लील व रुसवा कर देते हैं और ये लोग भी ऐसा ही करेंगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अफ़्सदूहा (उसे बिगाड़ देना): उसे तबाह और वीरान कर देना।
  • अज़िल्ला (अपमानित): ज़लील और बेक़दर कर देना।

तफ़सीर:

जब बिल्क़ीस (सबा की रानी) को सुलैमान अलैहिस्सलाम का पत्र मिला और उसने अपनी क़ौम के सरदारों से मशविरा किया, तो उन्होंने युद्ध की पेशकश की। लेकिन रानी ने अक्लमंदी से काम लेते हुए उन्हें समझाया कि युद्ध का अंजाम बहुत बुरा होता है। उसने कहा: "मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि बादशाह जब किसी बस्ती में ज़बरदस्ती दाख़िल होते हैं, तो उसे तबाह कर देते हैं—उसकी आबादी को वीरान कर देते हैं, उसकी इज़्ज़त को मिट्टी में मिला देते हैं, और उसके बड़े-बड़े रईसों और सरदारों को ज़लील व ख़्वार कर देते हैं। वे लोगों को क़त्ल करते हैं, उनके माल-ओ-दौलत लूटते हैं, और उनकी इज़्ज़त को रौंदते हैं। यही बादशाहों का हमेशा से तरीक़ा रहा है—जब वे किसी क़ौम पर ग़ालिब आते हैं, तो उन्हें अपना रोब और दहशत जमाने के लिए ऐसा ही किया करते हैं।"

रानी ने यह बात सिर्फ़ अपनी राय से नहीं कही, बल्कि यह एक हक़ीक़त थी जिसकी तस्दीक़ अल्लाह ने ख़ुद फ़रमाई: "और वे ऐसा ही किया करते हैं।" यानी यह उनका स्थायी और पुराना तरीक़ा है, जिसे वे कभी नहीं बदलते।

इसके बाद रानी ने एक समझदाराना क़दम उठाया—उसने सुलैमान अलैहिस्सलाम के पास एक क़ीमती तोहफ़ा भेजने का फ़ैसला किया, ताकि वह देखे कि सुलैमान क्या जवाब देते हैं। यह उसकी दूरअंदेशी और सियासी समझ थी कि उसने जंग की आग भड़काने से पहले सुलह और मुक़ालमे का रास्ता अपनाया।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि इस्लाम अमन और सुलह का दीन है। रानी ने भले ही यह बात एक ग़ैर-मुस्लिम के तौर पर कही, लेकिन उसकी यह बात आज भी हक़ीक़त है कि ज़ुल्म और जबरदस्ती कभी बरकत नहीं लाती। अल्लाह के नबी सुलैमान अलैहिस्सलाम ने उसके तोहफ़े को ठुकरा दिया और उसे अल्लाह की तरफ़ बुलाया—यह दिखाता है कि दुनियावी माल-ओ-दौलत के आगे झुकना किसी मोमिन का काम नहीं। हमें भी चाहिए कि हम अपने मामलों में अक्लमंदी, हिकमत और अमन को पेशे-नज़र रखें, और जहाँ हक़ की बात हो, वहाँ दुनियावी लालच को हावी न होने दें। यह क़िस्सा हमें बताता है कि अल्लाह अपने नबियों की मदद करता है और हक़ बातिल पर ग़ालिब आकर रहता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 32-36 — अन-नमल

32قَالَتْ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ أَفْتُونِي فِي أَمْرِي مَا كُنتُ قَاطِعَةً أَمْرًا حَتَّىٰ تَشْهَدُونِ
तब मलका (विलक़ीस) बोली ऐ मेरे दरबार के सरदारों तुम मेरे इस मामले में मुझे राय दो (क्योंकि मेरा तो ये क़ायदा है कि) जब तक तुम लोग मेरे सामने मौजूद न हो (मशवरा न दे दो) मैं किसी अम्र में क़तई फैसला न किया करती
33قَالُوا نَحْنُ أُولُو قُوَّةٍ وَأُولُو بَأْسٍ شَدِيدٍ وَالْأَمْرُ إِلَيْكِ فَانظُرِي مَاذَا تَأْمُرِينَ
उन लोगों ने अर्ज़ की हम बड़े ज़ोरावर बडे लड़ने वाले हैं और (आइन्दा) हर अम्र का आप को एख्तियार है तो जो हुक्म दे आप (खुद अच्छी) तरह इसके अन्जाम पर ग़ौर कर ले
34قَالَتْ إِنَّ الْمُلُوكَ إِذَا دَخَلُوا قَرْيَةً أَفْسَدُوهَا وَجَعَلُوا أَعِزَّةَ أَهْلِهَا أَذِلَّةً ۖ وَكَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ
मलका ने कहा बादशाहों का क़ायदा है कि जब किसी बस्ती में (बज़ोरे फ़तेह) दाख़िल हो जाते हैं तो उसको उजाड़ देते हैं और वहाँ के मुअज़िज़ लोगों को ज़लील व रुसवा कर देते हैं और ये लोग भी ऐसा ही करेंगे
35وَإِنِّي مُرْسِلَةٌ إِلَيْهِم بِهَدِيَّةٍ فَنَاظِرَةٌ بِمَ يَرْجِعُ الْمُرْسَلُونَ
और मैं उनके पास (एलचियों की माअरफ़त कुछ तोहफा भेजकर देखती हूँ कि एलची लोग क्या जवाब लाते हैं) ग़रज़ जब बिलक़ीस का एलची (तोहफा लेकर) सुलेमान के पास आया
36فَلَمَّا جَاءَ سُلَيْمَانَ قَالَ أَتُمِدُّونَنِ بِمَالٍ فَمَا آتَانِيَ اللَّهُ خَيْرٌ مِّمَّا آتَاكُم بَلْ أَنتُم بِهَدِيَّتِكُمْ تَفْرَحُونَ
तो सुलेमान ने कहा क्या तुम लोग मुझे माल की मदद देते हो तो ख़ुदा ने जो (माल दुनिया) मुझे अता किया है वह (माल) उससे जो तुम्हें बख्शा है कहीं बेहतर है (मैं तो नही) बल्कि तुम्ही लोग अपने तोहफे तहायफ़ से ख़ुश हुआ करो
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अनुवाद — अन-नमल 34

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Tuesday, August 18, 2026

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