Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- مُرْسِلَةٌ — भेजने वाली
- بِهَدِيَّةٍ — उपहार के साथ
- فَنَاظِرَةٌ — तो मैं प्रतीक्षा करूँगी
- بِمَ يَرْجِعُ الْمُرْسَلُونَ — किस चीज़ के साथ दूत लौटते हैं
तफ़सीर:
जब बिल्क़ीस (सबा की रानी) को सुलैमान अलैहिस्सलाम का पत्र मिला, जिसमें उन्होंने उसे अल्लाह की ओर बुलाया और उसकी सरकार के आगे समर्पण करने का आदेश दिया, तो उसने अपने दरबारी सरदारों से सलाह-मशविरा किया। उन्होंने युद्ध की तैयारी दिखाई, लेकिन बिल्क़ीस ने समझदारी और दूरदर्शिता से काम लेते हुए कहा कि मैं इस मामले में जल्दबाज़ी नहीं करूँगी। उसने सोचा कि पहले मैं सुलैमान की वास्तविक स्थिति को जानूँ — कि वह एक साधारण बादशाह है या कोई नबी।
इसलिए उसने कहा: "मैं उनके पास एक उपहार भेज रही हूँ" — यानी कीमती और अनमोल चीज़ें, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी और शाही तोहफ़ा थीं। उसका मक़सद यह था कि अगर सुलैमान एक साधारण बादशाह है, तो वह यह उपहार स्वीकार कर लेगा और इससे उसका ध्यान युद्ध से हट जाएगा। लेकिन अगर वह कोई नबी है, तो वह उपहार को अस्वीकार कर देगा और यह उसके लिए एक परीक्षा होगी।
फिर उसने कहा: "फिर मैं देखूँगी कि दूत क्या उत्तर लेकर लौटते हैं" — यानी मैं उनके जवाब का इंतज़ार करूँगी। अगर वे उपहार स्वीकार कर लेते हैं, तो मैं समझूँगी कि वे सिर्फ़ दुनियावी बादशाह हैं और उनसे बातचीत हो सकती है। लेकिन अगर वे उपहार वापस कर दें और अपनी बात पर अड़े रहें, तो यह साबित होगा कि वे कोई और ही शख्सियत हैं।
यह बिल्क़ीस की राजनीतिक समझदारी और दूरदर्शिता को दिखाता है। उसने जल्दबाज़ी में युद्ध का फैसला नहीं किया, बल्कि पहले जाँच-पड़ताल करना उचित समझा।
दावती पहलू:
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि मामलों में अक़्लमंदी और समझदारी से काम लेना चाहिए। जल्दबाज़ी और ग़ुस्से में फैसले लेना अक्सर नुक़सानदेह होता है। बिल्क़ीस ने भले ही उस समय ईमान नहीं लाया था, लेकिन उसकी यह समझदारी ही आगे चलकर उसके ईमान लाने का ज़रिया बनी। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई को जानने के लिए खुले दिल और दिमाग़ से काम लेना चाहिए। अल्लाह तआला जब किसी को हिदायत देना चाहता है, तो उसके दिल में सच्चाई की तलाश का जज़्बा पैदा कर देता है। हमें भी चाहिए कि हम हर मामले में अल्लाह की हिदायत और रसूल की सुन्नत को अपना रास्ता बनाएँ, और दुनियावी मामलों में भी अक़्ल और समझदारी से काम लें।
📜 आयत 33-37 — सूरा अन-नमल
अनुवाद — अन-नमल 35
सूरा अन-नमल आयत 35 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और मैं उनके पास (एलचियों की माअरफ़त कुछ तोहफा भेजकर…सूरा आयत 35/93 — सूरा अन-नमल النمل (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-नमल सुनें, सूरा अन-नमल अनुवाद, सूरा अन-नमल mp3, सूरा अन-नमल pdf. आयत 33–37. हिंदी अर्थ: اردو.
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Thursday, October 1, 2026
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