अल-क़सस · 57/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ۝٥٧
Wa qaalooo in nattabi`il hudaa ma`aka nutakhattaf min ardinaa; awalam numakkkil lahum haraman aaminany yujbaaa ilaihi samaraatu kulli shai`ir rizqam mil ladunnaa wa laakinna aksarahum laa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ दीन हक़ की पैरवी करें तो हम अपने मुल्क़ से उचक लिए जाएँ (ये क्या बकते है) क्या हमने उन्हें हरम (मक्का) में जहाँ हर तरह का अमन है जगह नहीं दी वहाँ हर किस्म के फल रोज़ी के वास्ते हमारी बारगाह से खिंचे चले जाते हैं मगर बहुतेरे लोग नहीं जाते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُتَخَطَّفْ – हमें उखाड़ फेंका जाए, हम पर धावा बोल दिया जाए
  • حَرَمًا آمِنًا – पवित्र और सुरक्षित स्थान (मक्का)
  • يُجْبَى – लाया जाता है, एकत्र किया जाता है
  • مِن لَّدُنَّا – हमारी ओर से, हमारे विशेष अनुग्रह से

तफसीर (व्याख्या):

मक्का के काफिरों ने जब नबी करीम ﷺ की दावत सुनी, तो उन्होंने एक बहाना बनाया और कहा: "अगर हम आपके साथ होकर इस हिदायत (इस्लाम) की पैरवी करें, तो हमें डर है कि आस-पास के कबीले हम पर हमला कर देंगे, हमें हमारी ज़मीन से उखाड़ फेंकेंगे, हमारे माल लूट लेंगे और हमें कत्ल कर देंगे।" यानी उन्होंने ईमान लाने से बचने के लिए यह बहाना गढ़ा कि इस्लाम क़बूल करने से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

अल्लाह तआला ने उनके इस बहाने का जवाब दिया और फ़रमाया: "क्या हमने उन्हें एक ऐसे पवित्र और सुरक्षित हरम (मक्का) में जगह नहीं दी, जहाँ खून बहाना हराम है, जहाँ हर तरफ़ से लोग आकर अमन से रहते हैं? क्या हमने उनके लिए यह इंतज़ाम नहीं किया कि हर तरह के फल और रिज़्क़ के सामान वहाँ खिंचे चले आते हैं — यह सब हमारी ओर से उनके लिए रोज़ी के तौर पर है?"

अल्लाह का इशारा यह है कि जिस ज़मीन को उन्होंने अपनी सुरक्षा का ज़रिया बताया, असल में वह सुरक्षा अल्लाह की देन है। अल्लाह ने उन्हें मक्का जैसा हरम अता किया, जहाँ कोई शिकार नहीं कर सकता, कोई पेड़ नहीं काट सकता, और जहाँ दुश्मन भी ज़ुल्म करने की जुर्रत नहीं करता। यह सब उनके कुफ्र के बावजूद अल्लाह का करम था। फिर अगर वे ईमान ले आएँ, तो अल्लाह उनकी हिफाज़त और भी बेहतर तरीके से करेगा। अल्लाह के भरोसे पर चलने वालों को कभी नुकसान नहीं होता।

लेकिन अफसोस! उनमें से अधिकतर लोग इन नेअमतों की क़द्र नहीं करते। वे नहीं जानते कि यह सब किसका दिया हुआ है। अगर वे जानते और शुक्र अदा करते, तो उन्हें और भी बरकतें मिलतीं। यह उनकी नादानी है कि वे अल्लाह की दी हुई सुरक्षा को अपनी ताकत समझते हैं, जबकि असल मालिक अल्लाह ही है।

दावती पहलू:

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है — अल्लाह पर भरोसा करने वालों को कभी डरना नहीं चाहिए। जिस अल्लाह ने मक्का के काफिरों को भी अपनी पनाह में रखा, वही अल्लाह अपने मोमिन बंदों की हिफाज़त क्यों नहीं करेगा? ईमान की राह पर चलने वाला अकेला नहीं होता, उसके साथ अल्लाह की ताकत होती है। जो लोग दुनिया के डर से दीन छोड़ देते हैं, वे असल में अल्लाह की कुदरत को भूल जाते हैं। हमें चाहिए कि हम अल्लाह की नेअमतों को पहचानें, उसका शुक्र अदा करें, और उसके दीन पर साबित क़दम रहें — क्योंकि जो अल्लाह के साथ होता है, उसे दुनिया की कोई ताकत नुकसान नहीं पहुँचा सकती।

🎧 सुनें

📜 आयत 55-59 — अल-क़सस

55وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं
56إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है
57وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ दीन हक़ की पैरवी करें तो हम अपने मुल्क़ से उचक लिए जाएँ (ये क्या बकते है) क्या हमने उन्हें हरम (मक्का) में जहाँ हर तरह का अमन है जगह नहीं दी वहाँ हर किस्म के फल रोज़ी के वास्ते हमारी बारगाह से खिंचे चले जाते हैं मगर बहुतेरे लोग नहीं जाते
58وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ
और हमने तो बहुतेरी बस्तियाँ बरबाद कर दी जो अपनी मइशत (रोजी) में बहुत इतराहट से (ज़िन्दगी) बसर किया करती थीं-(तो देखो) ये उन ही के (उजड़े हुए) घर हैं जो उनके बाद फिर आबाद नहीं हुए मगर बहुत कम और (आख़िर) हम ही उनके (माल व असबाब के) वारिस हुए
59وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ
और तुम्हारा परवरदिगार जब तक उन गाँव के सदर मक़ाम पर अपना पैग़म्बर न भेज ले और वह उनके सामने हमारी आयतें न पढ़ दे (उस वक्त तक) बस्तियों को बरबाद नहीं कर दिया करता-और हम तो बस्तियों को बरबाद करते ही नहीं जब तक वहाँ के लोग ज़ालिम न हों
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अनुवाद — अल-क़सस 57

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Tuesday, August 18, 2026

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