अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- نُتَخَطَّفْ – हमें उखाड़ फेंका जाए, हम पर धावा बोल दिया जाए
- حَرَمًا آمِنًا – पवित्र और सुरक्षित स्थान (मक्का)
- يُجْبَى – लाया जाता है, एकत्र किया जाता है
- مِن لَّدُنَّا – हमारी ओर से, हमारे विशेष अनुग्रह से
तफसीर (व्याख्या):
मक्का के काफिरों ने जब नबी करीम ﷺ की दावत सुनी, तो उन्होंने एक बहाना बनाया और कहा: "अगर हम आपके साथ होकर इस हिदायत (इस्लाम) की पैरवी करें, तो हमें डर है कि आस-पास के कबीले हम पर हमला कर देंगे, हमें हमारी ज़मीन से उखाड़ फेंकेंगे, हमारे माल लूट लेंगे और हमें कत्ल कर देंगे।" यानी उन्होंने ईमान लाने से बचने के लिए यह बहाना गढ़ा कि इस्लाम क़बूल करने से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
अल्लाह तआला ने उनके इस बहाने का जवाब दिया और फ़रमाया: "क्या हमने उन्हें एक ऐसे पवित्र और सुरक्षित हरम (मक्का) में जगह नहीं दी, जहाँ खून बहाना हराम है, जहाँ हर तरफ़ से लोग आकर अमन से रहते हैं? क्या हमने उनके लिए यह इंतज़ाम नहीं किया कि हर तरह के फल और रिज़्क़ के सामान वहाँ खिंचे चले आते हैं — यह सब हमारी ओर से उनके लिए रोज़ी के तौर पर है?"
अल्लाह का इशारा यह है कि जिस ज़मीन को उन्होंने अपनी सुरक्षा का ज़रिया बताया, असल में वह सुरक्षा अल्लाह की देन है। अल्लाह ने उन्हें मक्का जैसा हरम अता किया, जहाँ कोई शिकार नहीं कर सकता, कोई पेड़ नहीं काट सकता, और जहाँ दुश्मन भी ज़ुल्म करने की जुर्रत नहीं करता। यह सब उनके कुफ्र के बावजूद अल्लाह का करम था। फिर अगर वे ईमान ले आएँ, तो अल्लाह उनकी हिफाज़त और भी बेहतर तरीके से करेगा। अल्लाह के भरोसे पर चलने वालों को कभी नुकसान नहीं होता।
लेकिन अफसोस! उनमें से अधिकतर लोग इन नेअमतों की क़द्र नहीं करते। वे नहीं जानते कि यह सब किसका दिया हुआ है। अगर वे जानते और शुक्र अदा करते, तो उन्हें और भी बरकतें मिलतीं। यह उनकी नादानी है कि वे अल्लाह की दी हुई सुरक्षा को अपनी ताकत समझते हैं, जबकि असल मालिक अल्लाह ही है।
दावती पहलू:
इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है — अल्लाह पर भरोसा करने वालों को कभी डरना नहीं चाहिए। जिस अल्लाह ने मक्का के काफिरों को भी अपनी पनाह में रखा, वही अल्लाह अपने मोमिन बंदों की हिफाज़त क्यों नहीं करेगा? ईमान की राह पर चलने वाला अकेला नहीं होता, उसके साथ अल्लाह की ताकत होती है। जो लोग दुनिया के डर से दीन छोड़ देते हैं, वे असल में अल्लाह की कुदरत को भूल जाते हैं। हमें चाहिए कि हम अल्लाह की नेअमतों को पहचानें, उसका शुक्र अदा करें, और उसके दीन पर साबित क़दम रहें — क्योंकि जो अल्लाह के साथ होता है, उसे दुनिया की कोई ताकत नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
📜 आयत 55-59 — अल-क़सस
अनुवाद — अल-क़सस 57
सूरा अल-क़सस आयत 57 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम…सूरा आयत 57/88 — अल-क़सस القصص (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़सस सुनें, अल-क़सस अनुवाद, अल-क़सस mp3, अल-क़सस pdf. आयत 55–59. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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