अल-क़सस · 56/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ ۝٥٦
Innaka laa tahdee man ahbata wa laakinna laaha yahdee mai yashaaa`; wa Huwaa`lamu bilmuhtadeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لا تَهْدِي: तुम हिदायत नहीं दे सकते (अर्थात् हिदायत देने की तौफ़ीक़ तुम्हारे हाथ में नहीं है)
  • مَنْ أَحْبَبْتَ: जिसे तुम चाहो (अर्थात् जिसके ईमान लाने की तुम्हें लालसा हो)
  • يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ: जिसे चाहता है हिदायत देता है (अर्थात् तौफ़ीक़ अल्लाह ही के हाथ में है)
  • بِالْمُهْتَدِينَ: हिदायत पाने वालों से (अर्थात् जो हिदायत के लिए तैयार और उसके हक़दार हैं)

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! यह बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि हिदायत देना आपके अख़्तियार में नहीं है। आप चाहे जितना चाहें कि आपके चहेते लोग ईमान ले आएँ, लेकिन हिदायत की तौफ़ीक़ तो सिर्फ़ अल्लाह ही के हाथ में है। यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब नबी करीम ﷺ ने अपने चाचा अबू तालिब के ईमान लाने के लिए बहुत ज़्यादा तमन्ना और कोशिश की, लेकिन अल्लाह ने उन्हें हिदायत न दी।

इस आयत का मतलब यह है कि आप ﷺ का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है, हिदायत देना नहीं। हिदायत तो अल्लाह की इच्छा पर मुनहसिर है — वह जिसे चाहता है ईमान की तौफ़ीक़ देता है और जिसे चाहता है उससे महरूम रखता है। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि किसके दिल में सच्चाई को क़बूल करने की सलाहियत है और कौन हिदायत का हक़दार है। उसका इल्म हर चीज़ पर हावी है, और वही जानता है कि कौन सी रूह हिदायत के लिए तैयार है और कौन सी नहीं।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें एक बहुत बड़ा सबक़ मिलता है कि हमारा फ़र्ज़ सिर्फ़ अच्छी बात पहुँचाना है, नतीजा अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। कितने ही लोग हमारी समझ में बहुत नेक और अच्छे लगते हैं, लेकिन हिदायत अल्लाह की मर्ज़ी से मिलती है। साथ ही यह भी यक़ीन दिलाती है कि अल्लाह की रहमत बहुत वसी' है — वह जिसे चाहता है अंधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ले आता है। इसलिए हमें अपनी कोशिशों में कभी कमी नहीं करनी चाहिए, लेकिन नतीजे के लिए अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने रिश्तेदारों और अज़ीज़ों के ईमान के लिए दुआ करते रहना चाहिए, क्योंकि दुआ ही वह ज़रिया है जिससे अल्लाह की तौफ़ीक़ नाज़िल होती है।



📜 आयत 54-58 — सूरा अल-क़सस

54أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
यही वह लोग हैं जिन्हें (इनके आमाले ख़ैर की) दोहरी जज़ा दी जाएगी-चूँकि उन लोगों ने सब्र किया और बदी को नेकी से दफ़ा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह में) ख़र्च करते हैं
55وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं
56إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है
57وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ दीन हक़ की पैरवी करें तो हम अपने मुल्क़ से उचक लिए जाएँ (ये क्या बकते है) क्या हमने उन्हें हरम (मक्का) में जहाँ हर तरह का अमन है जगह नहीं दी वहाँ हर किस्म के फल रोज़ी के वास्ते हमारी बारगाह से खिंचे चले जाते हैं मगर बहुतेरे लोग नहीं जाते
58وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ
और हमने तो बहुतेरी बस्तियाँ बरबाद कर दी जो अपनी मइशत (रोजी) में बहुत इतराहट से (ज़िन्दगी) बसर किया करती थीं-(तो देखो) ये उन ही के (उजड़े हुए) घर हैं जो उनके बाद फिर आबाद नहीं हुए मगर बहुत कम और (आख़िर) हम ही उनके (माल व असबाब के) वारिस हुए
अल-क़ससकुरान सूची
88आयत
मक्कीअवतरण स्थान
56आयत

अनुवाद — अल-क़सस 56

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Friday, October 2, 2026

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