अल-क़सस · 76/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
۞ إِنَّ قَارُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَآتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوزِ مَا إِنَّ مَفَاتِحَهُ لَتَنُوءُ بِالْعُصْبَةِ أُولِي الْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِحِينَ ۝٧٦
Inna Qaaroona kaana min qawmi Moosaa fabaghaaa `alaihim wa aatainaahu minal kunoozi maaa inna mafaati hahoo latanooo`u bil`usbati ulil quwwati iz qaala lahoo qawmuhoo laa tafrah innal laahaa laa yuhibbul fariheen
📖 हिंदी अर्थ
(नाशुक्री का एक क़िस्सा सुनो) मूसा की क़ौम से एक शख्स कारुन (नामी) था तो उसने उन पर सरकशी शुरु की और हमने उसको इस क़दर ख़ज़ाने अता किए थे कि उनकी कुन्जियाँ एक सकतदार जमाअत (की जामअत) को उठाना दूभर हो जाता था जब (एक बार) उसकी क़ौम ने उससे कहा कि (अपनी दौलत पर) इतरा मत क्योंकि ख़ुदा इतराने वालों को दोस्त नहीं रखता
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَبَغَى عَلَيْهِمْ: उन पर ज़ुल्म किया, सरकशी और घमंड किया।
  • الْكُنُوزِ: ख़ज़ाने, छिपाए हुए धन।
  • مَفَاتِحَهُ: उसकी चाबियाँ।
  • تَنُوءُ بِالْعُصْبَةِ: भारी होने के कारण ताकतवर लोगों के समूह को झुका देना, यानी उठाना मुश्किल हो जाना।
  • الْعُصْبَةِ: मज़बूत लोगों का जत्था।
  • لَا تَفْرَحْ: इतराओ मत, घमंड मत करो।
  • الْفَرِحِينَ: इतराने वाले, अकड़ने वाले, घमंडी लोग।

तफ़सीर:

यह आयत हमें क़ारून के क़िस्से से रूबरू कराती है, जो मूसा (अलैहिस्सलाम) की क़ौम बनी इस्राईल में से था। अल्लाह ने उसे बेशुमार दौलत और ख़ज़ाने दिए थे, यहाँ तक कि उसके ख़ज़ानों की चाबियाँ इतनी भारी थीं कि ताकतवर आदमियों का एक गिरोह उन्हें उठाने से झुक जाता था। लेकिन इस दौलत ने उसे घमंडी और सरकश बना दिया, और उसने अपनी क़ौम पर ज़ुल्म और सरकशी की। उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) की नाफ़रमानी की और उन्हें झुठलाया।

जब उसकी यह हालत देखी तो उसकी क़ौम के नेक और ईमानदार लोगों ने उसे नसीहत की और कहा: "इतराओ मत, घमंड मत करो, और अपनी दौलत पर फूलो मत। यह दौलत अल्लाह की तरफ से एक इम्तिहान है। अल्लाह उन लोगों को पसंद नहीं करता जो अपनी नेअमतों पर इतराते हैं, अकड़ते हैं, और शुक्र अदा नहीं करते।"

यह नसीहत सिर्फ़ क़ारून के लिए नहीं थी, बल्कि हर उस इंसान के लिए है जिसे अल्लाह ने माल, औलाद, इल्म, ताक़त या कोई और नेअमत दी है। हमें चाहिए कि हर नेअमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करें, उसका सही इस्तेमाल करें, और घमंड और इतराने से बचें। याद रखें, दौलत और ताक़त अल्लाह की देन हैं, और वही इंसान कामयाब है जो इन नेअमतों को अल्लाह की राह में खर्च करे और उसके बंदों के काम आए।

यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि दुनिया की चमक-दमक और माल-दौलत पर भरोसा करना और उस पर इतराना अल्लाह की नाराज़गी का सबब बनता है। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो नम्र, शुक्रगुज़ार और अपने रब के आगे झुकने वाले हों। आइए, हम अपनी ज़िंदगी में इस नसीहत को अपनाएँ और अल्लाह की नेअमतों का शुक्र अदा करते हुए उसकी राह में खर्च करें, ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।

🎧 सुनें

📜 आयत 74-78 — अल-क़सस

74وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
और (उस दिन को याद करो) जिस दिन वह उन्हें पुकार कर पूछेगा जिनको तुम लोग मेरा शरीक ख्याल करते थे वह (आज) कहाँ हैं
75وَنَزَعْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا فَقُلْنَا هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ فَعَلِمُوا أَنَّ الْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
और हम हर एक उम्मत से एक गवाह (पैग़म्बर) निकाले (सामने बुलाएँगे) फिर (उस दिन मुशरेकीन से) कहेंगे कि अपनी (बराअत की) दलील पेश करो तब उन्हें मालूम हो जाएगा कि हक़ ख़ुदा ही की तरफ़ है और जो इफ़तेरा परवाज़ियाँ ये लोग किया करते थे सब उनसे ग़ायब हो जाएँगी
76۞ إِنَّ قَارُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَآتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوزِ مَا إِنَّ مَفَاتِحَهُ لَتَنُوءُ بِالْعُصْبَةِ أُولِي الْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِحِينَ
(नाशुक्री का एक क़िस्सा सुनो) मूसा की क़ौम से एक शख्स कारुन (नामी) था तो उसने उन पर सरकशी शुरु की और हमने उसको इस क़दर ख़ज़ाने अता किए थे कि उनकी कुन्जियाँ एक सकतदार जमाअत (की जामअत) को उठाना दूभर हो जाता था जब (एक बार) उसकी क़ौम ने उससे कहा कि (अपनी दौलत पर) इतरा मत क्योंकि ख़ुदा इतराने वालों को दोस्त नहीं रखता
77وَابْتَغِ فِيمَا آتَاكَ اللَّهُ الدَّارَ الْآخِرَةَ ۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ الدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِن كَمَا أَحْسَنَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ الْفَسَادَ فِي الْأَرْضِ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ
और जो कुछ ख़ुदा ने तूझे दे रखा है उसमें आख़िरत के घर की भी जुस्तजू कर और दुनिया से जिस क़दर तेरा हिस्सा है मत भूल जा और जिस तरह ख़ुदा ने तेरे साथ एहसान किया है तू भी औरों के साथ एहसान कर और रुए ज़मीन में फसाद का ख्वाहा न हो-इसमें शक नहीं कि ख़ुदा फ़साद करने वालों को दोस्त नहीं रखता
78قَالَ إِنَّمَا أُوتِيتُهُ عَلَىٰ عِلْمٍ عِندِي ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِن قَبْلِهِ مِنَ الْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةً وَأَكْثَرُ جَمْعًا ۚ وَلَا يُسْأَلُ عَن ذُنُوبِهِمُ الْمُجْرِمُونَ
तो क़ारुन कहने लगा कि ये (माल व दौलत) तो मुझे अपने इल्म (कीमिया) की वजह से हासिल होता है क्या क़ारुन ने ये भी न ख्याल किया कि अल्लाह उसके पहले उन लोगों को हलाक़ कर चुका है जो उससे क़ूवत और हैसियत में कहीं बढ़ बढ़ के थे और गुनाहगारों से (उनकी सज़ा के वक्त) उनके गुनाहों की पूछताछ नहीं हुआ करती
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अनुवाद — अल-क़सस 76

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Tuesday, August 18, 2026

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