अल-क़सस · 83/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
تِلْكَ الدَّارُ الْآخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّا فِي الْأَرْضِ وَلَا فَسَادًا ۚ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ ۝٨٣
Tilkad Daarul Aakhiratu naj`aluhaa lillazeena laa yureedoona `uluwwan fil ardi wa laa fasaadaa; wal `aaqibatu lilmuttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
ये आख़िरत का घर तो हम उन्हीं लोगों के लिए ख़ास कर देगें जो रुए ज़मीन पर न सरकशी करना चाहते हैं और न फसाद-और (सच भी यूँ ही है कि) फिर अन्जाम तो परहेज़गारों ही का है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • उलुव्वन (ऊँचाई/बड़ाई): अर्थात अहंकार, घमंड और दूसरों पर superiority जताने की चाहत।
  • फ़साद (बिगाड़): अर्थात ज़मीन पर बुराई, अत्याचार, और अव्यवस्था फैलाना।
  • आख़िरत (आख़िरत का घर): यहाँ अर्थ जन्नत से है।
  • अल-मुत्तक़ीन (परहेज़गार): वे लोग जो अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उसकी मनाही से बचें।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि आख़िरत का वह घर — यानी जन्नत — जो हमेशा रहने वाला और हर नेमत से भरा हुआ है, हम उसे उन लोगों के लिए बनाएँगे जो ज़मीन पर बड़ाई और घमंड नहीं चाहते, और न ही वे फ़साद और बुराई फैलाना चाहते हैं। यानी जो लोग अपने आपको बड़ा समझकर हक़ (सच्चाई) को क़बूल करने से इनकार करते हैं और लोगों पर ज़ुल्म करते हैं, वे जन्नत के हक़दार नहीं।

इसके विपरीत, जो लोग अल्लाह के सामने झुकते हैं, अपने अंदर से अहंकार को निकाल देते हैं, और ज़मीन पर अल्लाह की इबादत और अच्छाई फैलाते हैं — उन्हीं के लिए यह आख़िरी और बेहतरीन अंजाम है। अच्छा अंजाम (जन्नत) उन्हीं मुत्तक़ियों के लिए है जो अल्लाह से डरते हैं, उसके हुक्मों पर चलते हैं और गुनाहों से बचते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया में कामयाबी का पैमाना पैसा, ओहदा या ताक़त नहीं है, बल्कि अल्लाह की नज़र में वही इज़्ज़त वाला है जो अहंकार से पाक हो और अच्छाई का दामन थामे। अगर हम चाहते हैं कि आख़िरत में हमें सुकून और हमेशा की खुशियाँ मिलें, तो हमें अपने दिल से घमंड निकालना होगा और ज़मीन पर भलाई, इंसाफ़ और अल्लाह की इताअत का रास्ता अपनाना होगा। याद रखिए, अल्लाह उन्हीं को सच्ची इज़्ज़त देता है जो उसके लिए झुकते हैं। यही वादा है जो कभी टूटता नहीं — कि अच्छा अंजाम परहेज़गारों का ही है। आइए, हम अपनी ज़िंदगी में इसी राह को अपनाएँ ताकि हम उस हमेशा रहने वाले घर के हक़दार बन सकें।



📜 आयत 81-85 — अल-क़सस

81فَخَسَفْنَا بِهِ وَبِدَارِهِ الْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُ مِن فِئَةٍ يَنصُرُونَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُنتَصِرِينَ
और हमने क़ारुन और उसके घर बार को ज़मीन में धंसा दिया फिर ख़ुदा के सिवा कोई जमाअत ऐसी न थी कि उसकी मदद करती और न खुद आप अपनी मदद आप कर सका
82وَأَصْبَحَ الَّذِينَ تَمَنَّوْا مَكَانَهُ بِالْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَا أَن مَّنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ
और जिन लोगों ने कल उसके जाह व मरतबे की तमन्ना की थी वह (आज ये तमाशा देखकर) कहने लगे अरे माज़अल्लाह ये तो ख़ुदा ही अपने बन्दों से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग कर देता है और अगर (कहीं) ख़ुदा हम पर मेहरबानी न करता (और इतना माल दे देता) तो उसकी तरह हमको भी ज़रुर धॅसा देता-और माज़अल्लाह (सच है) हरगिज़ कुफ्फार अपनी मुरादें न पाएँगें
83تِلْكَ الدَّارُ الْآخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّا فِي الْأَرْضِ وَلَا فَسَادًا ۚ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ
ये आख़िरत का घर तो हम उन्हीं लोगों के लिए ख़ास कर देगें जो रुए ज़मीन पर न सरकशी करना चाहते हैं और न फसाद-और (सच भी यूँ ही है कि) फिर अन्जाम तो परहेज़गारों ही का है
84مَن جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ خَيْرٌ مِّنْهَا ۖ وَمَن جَاءَ بِالسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى الَّذِينَ عَمِلُوا السَّيِّئَاتِ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
जो शख्स नेकी करेगा तो उसके लिए उसे कहीं बेहतर बदला है औ जो बुरे काम करेगा तो वह याद रखे कि जिन लोगों ने बुराइयाँ की हैं उनका वही बदला हे जो दुनिया में करते रहे हैं
85إِنَّ الَّذِي فَرَضَ عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لَرَادُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍ ۚ قُل رَّبِّي أَعْلَمُ مَن جَاءَ بِالْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
(ऐ रसूल) ख़ुदा जिसने तुम पर क़ुरान नाज़िल किया ज़रुर ठिकाने तक पहुँचा देगा (ऐ रसूल) तुम कह दो कि कौन राह पर आया और कौन सरीही गुमराही में पड़ा रहा
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अनुवाद — अल-क़सस 83

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Tuesday, August 18, 2026

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