अल-अंकबूत · 66/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ۝٦٦
Li yakfuroo bimaaa aatainaahum wa li yatamatta`oo fasaw fa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उन्हें अता की हैं उनका इन्कार कर बैठें और ताकि (दुनिया में) ख़ूब चैन कर लें तो अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِيَكْفُرُوا – ताकि वे कृतघ्नता करें (अर्थात नेमतों का इनकार करें)
  • بِمَا آتَيْنَاهُمْ – उस चीज़ के साथ जो हमने उन्हें दी (अर्थात नेमतें और रिज़्क़)
  • وَلِيَتَمَتَّعُوا – और ताकि वे (दुनिया में) आनंद उठाएँ
  • فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ – तो वे जल्द ही जान लेंगे (अपने किए का अंजाम)

तफ़सीर (व्याख्या):

जब ये लोग समुद्र में सफ़र करते हैं और तूफ़ान या डूबने का ख़तरा पैदा होता है, तो वे सारे झूठे माबूदों को भूलकर सिर्फ़ अल्लाह को पुकारते हैं और उसी से मदद माँगते हैं। लेकिन जब अल्लाह उन्हें सुरक्षित किनारे तक पहुँचा देता है और उनकी मुसीबत टल जाती है, तो वे फिर से अपने शिर्क (बहुदेववाद) की तरफ लौट जाते हैं। यह उनकी बड़ी नाइंसाफ़ी और विरोधाभास है — मुसीबत में तो वे अल्लाह को एक मानते हैं, लेकिन राहत मिलते ही उसके साथ दूसरों को शरीक करने लगते हैं।

यह उनका यह कृत्य इसलिए है ताकि वे उन नेमतों का इनकार करें जो अल्लाह ने उन्हें दी हैं — जैसे जान, माल, सेहत और सुरक्षा — और ताकि वे दुनिया के अस्थायी सुख-आनंद में डूबे रहें। वे समझते हैं कि यही उनकी कामयाबी है, लेकिन वे बहुत बड़ी ग़लती पर हैं। अल्लाह फ़रमाता है: "फिर वे जल्द ही जान लेंगे" — यानी जब मौत उनके सामने आएगी, या क़यामत का दिन आएगा, तो उन्हें पता चल जाएगा कि उनका यह कृत्य कितना बुरा था और उन्होंने कितनी बड़ी नेमतों को ठुकराया था। उस दिन उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार है, और यही उनका असली अंजाम होगा।


दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है — कि हमें सिर्फ़ मुसीबत के वक़्त अल्लाह को याद नहीं करना चाहिए, बल्कि हर हालत में उसका शुक्र अदा करना चाहिए। जब अल्लाह हमें राहत देता है, तो यह उसकी रहमत है, और हमें उस रहमत का सही इस्तेमाल करना चाहिए — नेकी में, इबादत में, और लोगों की मदद में। अगर हम नेमतें पाकर भी अल्लाह से ग़ाफ़िल रहें, तो यह हमारी नाइंसाफ़ी है। अल्लाह बहुत मेहरबान है, वह हमें मौक़ा देता है, लेकिन एक दिन हमें अपने आमाल का हिसाब देना होगा। इसलिए आज ही अपनी ज़िंदगी को सुधारें, अल्लाह के शुक्रगुज़ार बनें, और उसकी नेमतों को अपने लिए रहमत का ज़रिया बनाएँ — यही हमारी कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 64-68 — अल-अंकबूत

64وَمَا هَٰذِهِ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَهْوٌ وَلَعِبٌ ۚ وَإِنَّ الدَّارَ الْآخِرَةَ لَهِيَ الْحَيَوَانُ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
और ये दुनिया की ज़िन्दगी तो खेल तमाशे के सिवा कुछ नहीं और मगर ये लोग समझें बूझें तो इसमे शक नहीं कि अबदी ज़िन्दगी (की जगह) तो बस आख़ेरत का घर है (बाक़ी लग़ो)
65فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब ये लोग कश्ती में सवार होते हैं तो निहायत ख़ुलूस से उसकी इबादत करने वाले बन कर ख़ुदा से दुआ करते हैं फिर जब उन्हें ख़ुश्की में (पहुँचा कर) नजात देता है तो फौरन शिर्क करने लगते हैं
66لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उन्हें अता की हैं उनका इन्कार कर बैठें और ताकि (दुनिया में) ख़ूब चैन कर लें तो अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा
67أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا آمِنًا وَيُتَخَطَّفُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْ ۚ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَكْفُرُونَ
क्या उन लोगों ने इस पर ग़ौर नहीं किया कि हमने हरम (मक्का) को अमन व इत्मेनान की जगह बनाया हालॉकि उनके गिर्द व नवाह से लोग उचक ले जाते हैं तो क्या ये लोग झूठे माबूदों पर ईमान लाते हैं और ख़ुदा की नेअमत की नाशुक्री करते हैं
68وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ
और जो शख्स ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या जब उसके पास कोई सच्ची बात आए तो झुठला दे इससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा क्या (इन) काफिरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है (ज़रुर है)
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अनुवाद — अल-अंकबूत 66

सूरा अल-अंकबूत आयत 66 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ताकि जो (नेअमतें) हमने उन्हें अता की हैं उनका इन्कार…

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Tuesday, August 18, 2026

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