अल-अहज़ाब · 18/73
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अहज़ाब
۞ قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَالْقَائِلِينَ لِإِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ الْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا ۝١٨
Qad ya`lamul laahul mu`awwiqeena minkum walqaaa`ileena li ikhwaanihim hahumma ilainaa, wa laa yaatoonal baasa illaa qaleelaa
📖 हिंदी अर्थ
तुममें से जो लोग (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं खुदा उनको खूब जानता है और (उनको भी खूब जानता है) जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और खुद भी (फक़त पीछा छुड़ाने को लड़ाई के खेत) में बस एक ज़रा सा आकर तुमसे अपनी जान चुराई

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • المُعَوِّقِينَ: वे लोग जो दूसरों को जिहाद से रोकते हैं और उन्हें पीछे हटाते हैं।
  • هَلُمَّ إِلَيْنَا: हमारी ओर आओ, हमारे साथ हो जाओ।
  • البَأْسَ: युद्ध, लड़ाई।
  • قَلِيلًا: बहुत कम, नगण्य रूप से।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला को उन लोगों का हाल पूरी तरह मालूम है जो मुसलमानों को जिहाद से रोकते हैं और उनके कदमों को पीछे धकेलते हैं। वे लोग जब अपने भाइयों को देखते हैं कि वे अल्लाह के रास्ते में लड़ने के लिए निकल रहे हैं, तो उन्हें आवाज़ देते हैं: "हमारी तरफ आ जाओ, हमारे साथ रहो, मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का साथ छोड़ दो, उनके साथ युद्ध में मत जाओ, क्योंकि हमें डर है कि तुम उनके साथ जाकर मारे न जाओ और हम तुम्हें खो दें।" वे इस तरह दूसरों को रोकते हैं, लेकिन जब युद्ध का समय आता है और लड़ाई छिड़ जाती है, तो वे स्वयं भी युद्ध के मैदान में नहीं आते, और अगर आते भी हैं तो बहुत कम आते हैं—और वह भी दिखावे के लिए, लोगों को दिखाने के लिए, ताकि उन पर कायरता का आरोप न लगे। वे अल्लाह की राह में लड़ने के लिए नहीं आते, बल्कि अपनी बेइज़्ज़ती बचाने के लिए आते हैं।

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है जो मुसलमानों के खिलाफ़ साज़िश करते थे और उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश करते थे। अल्लाह तआला उनके इरादों से पूरी तरह वाक़िफ़ है और उनके किए की सज़ा उन्हें ज़रूर देगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला हर चीज़ को देख रहा है और जान रहा है। कोई भी व्यक्ति अपने बुरे इरादों को अल्लाह से छिपा नहीं सकता। इसलिए हमें हमेशा सच्चे दिल से अल्लाह के रास्ते में काम करना चाहिए, न कि दिखावे के लिए। जो लोग दूसरों को नेक कामों से रोकते हैं और खुद भी उनमें हिस्सा नहीं लेते, वे अल्लाह की नज़र में बहुत बुरे हैं। हमें चाहिए कि हम अपने भाइयों को अच्छे कामों की तरफ बुलाएँ, उन्हें रोकें नहीं। अल्लाह के रास्ते में किया गया हर छोटा काम भी उसके यहाँ बड़ा है, और दिखावे के लिए किया गया बड़ा काम भी बेकार है। आइए, हम सब मिलकर अल्लाह के दीन की मदद करें, क्योंकि अल्लाह ने वादा किया है कि जो उसके दीन की मदद करेगा, अल्लाह उसकी मदद करेगा।



📜 आयत 16-20 — सूरा अल-अहज़ाब

16قُل لَّن يَنفَعَكُمُ الْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ الْمَوْتِ أَوِ الْقَتْلِ وَإِذًا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) कह दो कि अगर तुम मौत का क़त्ल (के ख़ौफ) से भागे भी तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ कुछ भी मुफ़ीद न होगा और अगर तुम भागकर बच भी गए तो बस यही न की दुनिया में चन्द रोज़ा और चैनकर लो
17قُلْ مَن ذَا الَّذِي يَعْصِمُكُم مِّنَ اللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةً ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि अगर खुदा तुम्हारे साथ बुराई का इरादा कर बैठे तो तुम्हें उसके (अज़ाब) से कौन ऐसा है जो बचाए या भलाई ही करना चाहे (तो कौन रोक सकता है) और ये लोग खुदा के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार
18۞ قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَالْقَائِلِينَ لِإِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ الْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا
तुममें से जो लोग (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं खुदा उनको खूब जानता है और (उनको भी खूब जानता है) जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और खुद भी (फक़त पीछा छुड़ाने को लड़ाई के खेत) में बस एक ज़रा सा आकर तुमसे अपनी जान चुराई
19أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
20يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीअवतरण स्थान
18आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 18

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Thursday, October 1, 2026

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