अल-अहज़ाब · 48/73
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अहज़ाब
وَلَا تُطِعِ الْكَافِرِينَ وَالْمُنَافِقِينَ وَدَعْ أَذَاهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَكِيلًا ۝٤٨
Wa laa tuti`il kaafireena walmunaafiqeena wa da`azaahum wa tawakkal `alallaah; wa kafaa billaahi Wakeelaa
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम (कहीं) काफिरों और मुनाफिक़ों की इताअत न करना और उनकी ईज़ारसानी का ख्याल छोड़ दो और खुदा पर भरोसा रखो और कारसाज़ी में खुदा काफ़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَلاَ تُطِعِ: और आज्ञा मत मानो
  • الْكَافِرِينَ: काफिरों (ईमान न लाने वालों) की
  • الْمُنَافِقِينَ: मुनाफिकों (दिखावटी मुसलमानों) की
  • وَدَعْ أَذَاهُمْ: और उनके अत्याचार/तकलीफ को छोड़ दो (सहन करो)
  • وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ: और अल्लाह पर भरोसा रखो
  • وَكِيلًا: कार्य-साधक, भरोसेमंद संरक्षक

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! अल्लाह तआला आपको निर्देश देता है कि काफिरों और मुनाफिकों की बात मत मानो, चाहे वे आपको किसी भी काम के लिए उकसाएँ या आपको सत्य के मार्ग से रोकने की कोशिश करें। उनकी ओर से आने वाली तकलीफों और अत्याचारों को सहन करो और उनसे बदला लेने की जल्दी मत करो। यह सब्र और क्षमा का रास्ता अपनाना स्वयं उनके लिए ईमान लाने का कारण बन सकता है।

फिर अल्लाह तआला आपको सिखाता है कि सभी मामलों में अल्लाह पर भरोसा रखो और अपने कार्यों को उसे सौंप दो। वही आपके लिए काफी है, वही आपकी रक्षा करेगा, आपकी सहायता करेगा और आपके दुश्मनों के मुकाबले में आपको विजय प्रदान करेगा। अल्लाह पर भरोसा करना ही सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है और उसकी पकड़ से कोई बच नहीं सकता।

यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम अल्लाह पर पूर्ण भरोसा कर लेते हैं, तो हमें किसी इंसान की परवाह नहीं रहती। चाहे दुश्मन कितने भी ताकतवर क्यों न हों, अल्लाह की मदद उसके ईमानदार बंदों के साथ होती है। यही वह रास्ता है जो हमें सच्ची कामयाबी तक पहुँचाता है — सब्र, क्षमा और अल्लाह पर भरोसा।

याद रखिए, अल्लाह तआला अपने बंदों से वादा करता है कि जो उस पर भरोसा करता है, वह उसके लिए हर मुश्किल का हल निकालता है और उसे हर बुराई से बचाता है। तो आइए, हम भी अपने जीवन के हर क्षेत्र में अल्लाह पर भरोसा करें और उसकी राह पर चलें — यही सच्ची सफलता का मार्ग है।



📜 आयत 46-50 — सूरा अल-अहज़ाब

46وَدَاعِيًا إِلَى اللَّهِ بِإِذْنِهِ وَسِرَاجًا مُّنِيرًا
और खुदा की तरफ उसी के हुक्म से बुलाने वाला और (ईमान व हिदायत का) रौशन चिराग़ बनाकर भेजा
47وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ بِأَنَّ لَهُم مِّنَ اللَّهِ فَضْلًا كَبِيرًا
और तुम मोमिनीन को खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए खुदा की तरफ से बहुत बड़ी (मेहरबानी और) बख्शिश है
48وَلَا تُطِعِ الْكَافِرِينَ وَالْمُنَافِقِينَ وَدَعْ أَذَاهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَكِيلًا
और (ऐ रसूल) तुम (कहीं) काफिरों और मुनाफिक़ों की इताअत न करना और उनकी ईज़ारसानी का ख्याल छोड़ दो और खुदा पर भरोसा रखो और कारसाज़ी में खुदा काफ़ी है
49يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَكَحْتُمُ الْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍ تَعْتَدُّونَهَا ۖ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحًا جَمِيلًا
ऐ ईमानवालों जब तुम मोमिना औरतों से (बग़ैर मेहर मुक़र्रर किये) निकाह करो उसके बाद उन्हें अपने हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ दे दो तो फिर तुमको उनपर कोई हक़ नहीं कि (उनसे) इद्दा पूरा कराओ उनको तो कुछ (कपड़े रूपये वग़ैरह) देकर उनवाने शाइस्ता से रूख़सत कर दो
50يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ اللَّاتِي آتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالَاتِكَ اللَّاتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ وَامْرَأَةً مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنْ أَرَادَ النَّبِيُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةً لَّكَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِي أَزْوَاجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌ ۗ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
ऐ नबी हमने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी उन बीवियों को हलाल कर दिया है जिनको तुम मेहर दे चुके हो और तुम्हारी उन लौंडियों को (भी) जो खुदा ने तुमको (बग़ैर लड़े-भिड़े) माले ग़नीमत में अता की है और तुम्हारे चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामू की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जो तुम्हारे साथ हिजरत करके आयी हैं (हलाल कर दी और हर ईमानवाली औरत (भी हलाल कर दी) अगर वह अपने को (बग़ैर मेहर) नबी को दे दें और नबी भी उससे निकाह करना चाहते हों मगर (ऐ रसूल) ये हुक्म सिर्फ तुम्हारे वास्ते ख़ास है और मोमिनीन के लिए नहीं और हमने जो कुछ (मेहर या क़ीमत) आम मोमिनीन पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर कर दिया है हम खूब जानते हैं और (तुम्हारी रिआयत इसलिए है) ताकि तुमको (बीवियों की तरफ से) कोई दिक्क़त न हो और खुदा तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीअवतरण स्थान
48आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 48

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Wednesday, September 30, 2026

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