यासीन · 6/83
अनुवाद उच्चारण — सूरा यासीन
لِتُنذِرَ قَوْمًا مَّا أُنذِرَ آبَاؤُهُمْ فَهُمْ غَافِلُونَ ۝٦
Litunzira qawmam maaa unzira aabaaa`uhum fahum ghaafiloon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि तुम उन लोगों को (अज़ाबे खुदा से) डराओ जिनके बाप दादा (तुमसे पहले किसी पैग़म्बर से) डराए नहीं गए

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِتُنذِرَ: ताकि आप डराएँ (सचेत करें)
  • قَوْمًا: एक क़ौम (समुदाय) को
  • مَّا أُنذِرَ آبَاؤُهُمْ: जिनके पूर्वजों को (पहले) डराया नहीं गया था (कोई नबी नहीं आया था)
  • غَافِلُونَ: बेख़बर, लापरवाह, ग़फ़लत में डूबे हुए

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत उस महान उद्देश्य को बयान करती है जिसके लिए यह क़ुरआन आप (ﷺ) पर उतारा गया। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने यह क़ुरआन आप पर इसलिए नाज़िल किया ताकि आप उन लोगों को डराएँ और सचेत करें जिनके पूर्वजों के पास पहले कोई नबी या रसूल नहीं आया था — यानी अरब की क़ौम, ख़ासकर क़ुरैश। उनके पास आपसे पहले कोई आसमानी किताब या नबी नहीं पहुँचा था, इसलिए वे ईमान और हिदायत से बिल्कुल बेख़बर और ग़फ़लत में पड़े हुए थे।

यह आयत हमें सिखाती है कि जिस क़ौम तक अल्लाह का पैग़ाम नहीं पहुँचता, वह स्वाभाविक रूप से ग़फ़लत और अज्ञानता में डूब जाती है। इसलिए अल्लाह ने अपने रसूल (ﷺ) को रहमत बनाकर भेजा ताकि वे उन्हें अंधेरे से निकालकर रोशनी की ओर लाएँ।

इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि जिन लोगों तक दीन की दावत नहीं पहुँची है, उन तक पहुँचाना हमारी ज़िम्मेदारी है। जिस तरह रसूल (ﷺ) ने ग़ाफ़िल क़ौम को जगाया, उसी तरह आज हम पर भी फ़र्ज़ है कि हम अपने समाज में फैली ग़फ़लत को दूर करें और लोगों को अल्लाह की याद और ईमान की ओर बुलाएँ। यह आयत दावत और तब्लीग़ की अहमियत पर एक मज़बूत दलील है — कि इल्म रखने वालों पर वाजिब है कि वे लोगों को जगाएँ और उन्हें अल्लाह के दीन की ओर बुलाएँ।

और ख़ुशख़बरी की बात यह है कि जिस क़ौम को यह नेमत मिली कि उनके पास रसूल (ﷺ) आए और उन्होंने दावत दी, उनके लिए यह सबसे बड़ी रहमत है। आज हमारे पास यह क़ुरआन मौजूद है जो हर ज़माने के लिए हिदायत है। हमें चाहिए कि हम इसे पढ़ें, समझें और इस पर अमल करें, ताकि हम उन लोगों में से हों जो ग़फ़लत से बचे और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 4-8 — सूरा यासीन

4عَلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
(और दीन के बिल्कुल) सीधे रास्ते पर (साबित क़दम) हो
5تَنزِيلَ الْعَزِيزِ الرَّحِيمِ
जो बड़े मेहरबान (और) ग़ालिब (खुदा) का नाज़िल किया हुआ (है)
6لِتُنذِرَ قَوْمًا مَّا أُنذِرَ آبَاؤُهُمْ فَهُمْ غَافِلُونَ
ताकि तुम उन लोगों को (अज़ाबे खुदा से) डराओ जिनके बाप दादा (तुमसे पहले किसी पैग़म्बर से) डराए नहीं गए
7لَقَدْ حَقَّ الْقَوْلُ عَلَىٰ أَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
तो वह दीन से बिल्कुल बेख़बर हैं उन में अक्सर तो (अज़ाब की) बातें यक़ीनन बिल्कुल ठीक पूरी उतरे ये लोग तो ईमान लाएँगे नहीं
8إِنَّا جَعَلْنَا فِي أَعْنَاقِهِمْ أَغْلَالًا فَهِيَ إِلَى الْأَذْقَانِ فَهُم مُّقْمَحُونَ
हमने उनकी गर्दनों में (भारी-भारी लोहे के) तौक़ डाल दिए हैं और ठुड्डियों तक पहुँचे हुए हैं कि वह गर्दनें उठाए हुए हैं (सर झुका नहीं सकते)
यासीनकुरान सूची
83आयत
मक्कीअवतरण स्थान
6आयत

अनुवाद — यासीन 6

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Thursday, October 1, 2026

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