Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يَسْتَفْتُونَكَ: वे आपसे पूछते हैं / फतवा माँगते हैं।
- الْكَلَالَةَ: वह व्यक्ति जो मर जाए और उसके न माँ-बाप हों और न कोई संतान (न बेटा, न बेटी)।
- هَلَكَ: मर गया।
- يَرِثُهَا: वह (भाई) उसका (बहन का) वारिस होगा।
- حَظِّ: हिस्सा।
विस्तृत व्याख्या:
यह आयत मीरास (विरासत) के उस नियम को स्पष्ट करती है जिसे "कलाला" कहा जाता है। कलाला उस मृतक को कहते हैं जिसके न तो माता-पिता जीवित हों और न ही उसकी कोई संतान हो। सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इस मामले में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूछा था, तो अल्लाह ने यह आयत उतारी।
अल्लाह तआला फरमाता है: "हे नबी! लोग आपसे कलाला के मीरास के बारे में पूछते हैं। आप कह दें कि अल्लाह खुद इसका फैसला सुना रहा है।"
फिर अल्लाह तआला नियम बताता है:
- अगर कोई पुरुष मरे जिसके न कोई संतान हो और न माँ-बाप, और उसकी एक सगी या पैतृक (बाप की तरफ से) बहन हो, तो उस बहन को उसकी आधी जायदाद मिलेगी।
- अगर वह बहन मर जाए और उसके भी कोई संतान न हो, तो उसका भाई (सगा या पैतृक) उसका पूरा वारिस होगा।
- अगर दो बहनें हों (या दो से ज़्यादा), तो उन्हें मिलकर दो-तिहाई (2/3) हिस्सा मिलेगा।
- अगर भाई-बहन मिले हुए हों (कुछ लड़के और कुछ लड़कियाँ), तो लड़के को दो लड़कियों के बराबर हिस्सा मिलेगा। यानी लड़के का हिस्सा लड़की से दोगुना होगा।
इसके बाद अल्लाह तआला फरमाता है: "अल्लाह तुम्हारे लिए ये नियम स्पष्ट कर रहा है ताकि तुम गुमराह न हो जाओ।" यानी अल्लाह ने अपनी रहमत से मीरास के पूरे नियम बता दिए हैं ताकि लोगों को कोई उलझन न रहे और वे हक़ से न भटकें। और अल्लाह हर चीज़ का पूरा ज्ञान रखता है — वह जानता है कि कौन सा हिस्सा किसके लिए बेहतर है और किसमें बंदों की भलाई है।
दावत और नसीहत (प्रेरणादायक पहलू):
यह आयत हमें अल्लाह की असीम रहमत और उसके पूर्ण ज्ञान की याद दिलाती है। अल्लाह ने हमारे जीवन के हर पहलू के लिए नियम बनाए हैं — यहाँ तक कि मृत्यु के बाद जायदाद की तकसीम का भी पूरा-पूरा इंतज़ाम किया है। यह इस बात का सबूत है कि इस्लाम सिर्फ इबादत का धर्म नहीं, बल्कि जीवन का एक मुकम्मल निज़ाम है।
जब हम देखते हैं कि अल्लाह ने हर छोटे-बड़े मामले में इंसाफ़ (न्याय) का रास्ता दिखाया है, तो हमारा दिल उसकी मुहब्बत से भर जाता है। यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने पारिवारिक और सामाजिक मामलों में भी अल्लाह के बताए हुए नियमों पर चलें, क्योंकि अल्लाह ही सबसे बेहतर जानता है कि हमारी भलाई किसमें है। जो व्यक्ति अल्लाह के फैसले पर राज़ी रहता है, उसे कभी पछतावा नहीं होता। अल्लाह ने हमें राह दिखाई है — बस ज़रूरत है उस पर चलने की।
📜 आयत 174-176 — सूरा अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 176
सूरा अन-निसा आयत 176 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) तुमसे लोग फ़तवा तलब करते हैं तुम कह…सूरा आयत 176/176 — सूरा अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-निसा सुनें, सूरा अन-निसा अनुवाद, सूरा अन-निसा mp3, सूरा अन-निसा pdf. आयत 174–176. हिंदी अर्थ: اردو.
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Thursday, October 1, 2026
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