अज़-ज़ुखरुफ · 30/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ ۝٣٠
Wa lammaa jaaa`ahumul haqqu qaaloo haazaa sihrunw wa innaa bihee kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْحَقّ (अल-हक़): सत्य, यहाँ अर्थात क़ुरआन।
  • سِحْر (सिह्र): जादू।
  • كَافِرُونَ (काफ़िरून): इनकार करने वाले, न मानने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन काफ़िरों के पास सत्य आया, यानी क़ुरआन जो अल्लाह की ओर से उतारा गया और जो उन्हें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर लाने वाला था, तो उन्होंने उसे स्वीकार करने के बजाय उसका उपहास किया और कहा: "यह तो महज़ जादू है जो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हम पर कर रहे हैं, यह अल्लाह की वही (प्रकाशना) नहीं है।" उन्होंने यह भी कहा: "हम इस पर ईमान नहीं लाएँगे और इसे पूरी तरह अस्वीकार करते हैं।"

यह उनकी अज्ञानता और हठधर्मिता की पराकाष्ठा थी। जब उनके पास वह चीज़ आई जो उनके भले के लिए थी, तो उन्होंने उसे जादू कहकर खारिज कर दिया। उन्होंने अपने शिर्क (बहुदेववाद) के साथ-साथ सत्य का विरोध भी किया, क़ुरआन को तुच्छ समझा और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अपमान किया। यह उनकी ग़लती थी कि उन्होंने उस चीज़ को नकार दिया जो उनके लिए हिदायत और रहमत बनकर आई थी।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य को स्वीकार करने में देरी नहीं करनी चाहिए। जब अल्लाह की ओर से हिदायत आए, तो उसे खुले दिल से क़बूल करना चाहिए। क़ुरआन एक ऐसी किताब है जो इंसान को ज़िंदगी की हर मुश्किल से निकालने का रास्ता दिखाती है। यह कोई जादू नहीं, बल्कि एक रोशनी है जो दिलों को मालिक की याद से जोड़ती है। आइए, हम उन लोगों की तरह न बनें जिन्होंने सत्य को ठुकराया और पछताए। बल्कि हम उन लोगों में से बनें जो सुनते ही मान लेते हैं और अल्लाह की रहमत के हक़दार बन जाते हैं। क़ुरआन को अपनी ज़िंदगी में उतारें, उस पर अमल करें, और यही हमारी सफलता की कुंजी है। अल्लाह हम सबको सत्य को समझने और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 28-32 — अज़-ज़ुखरुफ

28وَجَعَلَهَا كَلِمَةً بَاقِيَةً فِي عَقِبِهِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और उसी (ईमान) को इब्राहीम ने अपनी औलाद में हमेशा बाक़ी रहने वाली बात छोड़ गए ताकि वह (ख़ुदा की तरफ रूजू) करें
29بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ
बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा
30وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ
और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं
31وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया
32أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीRevelation
30आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 30

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Tuesday, August 18, 2026

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