अज़-ज़ुखरुफ · 31/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ ۝٣١
Wa qaaloo law laa nuzzila haazal Quraanu `alaa rajulim minal qaryataini `azeem
📖 हिंदी अर्थ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَوْلَا (लौला): क्यों नहीं / ऐसा क्यों नहीं हुआ
  • نُزِّلَ (नुज़्ज़िला): उतारा गया
  • الْقَرْيَتَيْنِ (अल-क़र्यतैन): दो बस्तियों (शहरों) से — अर्थात मक्का और ताइफ़
  • عَظِيمٍ (अज़ीम): बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मक्का के मुशरिकीन ने देखा कि अल्लाह तआला ने अपना आख़िरी ग्रंथ क़ुरआन हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ पर उतारा है, तो उन्होंने अपने घमंड और अहंकार की वजह से यह कहा: "यह क़ुरआन अगर सच में अल्लाह की तरफ से है, तो इसे किसी बड़े और प्रतिष्ठित आदमी पर क्यों नहीं उतारा गया — या तो मक्का के किसी रईस पर या ताइफ़ के किसी सरदार पर?" उनका इशारा मक्का के वलीद बिन मुग़ीरा और ताइफ़ के उरवा बिन मसूद सक़फ़ी की तरफ था, जो अपनी दौलत और रुतबे की वजह से लोगों में बड़े समझे जाते थे।

यानी उन्होंने यह कहकर नबुव्वत के चुनाव पर एतराज़ किया कि अल्लाह ने एक यतीम, ग़रीब और बेसहारा इंसान (मुहम्मद ﷺ) को क्यों चुना? उनकी नज़र में बड़ाई दौलत, ख़ानदान और दुनियावी ओहदे से थी, जबकि अल्लाह तआला की नज़र में बड़ाई तक़वा, ईमान और अच्छे चरित्र से है।

यह उनकी बड़ी नादानी और जहालत थी कि उन्होंने अल्लाह के फैसले पर सवाल उठाया। अल्लाह तआला जिसे चाहता है अपनी रिसालत के लिए चुनता है, और उसका चुनाव पूरी हिकमत (बुद्धिमत्ता) पर आधारित होता है। अल्लाह ने अपने नबी ﷺ को इसलिए चुना कि वह सबसे अच्छे अख़्लाक़, सबसे सच्चे, सबसे अमानतदार और सबसे पाकीज़ा सीरत के मालिक थे — चाहे वह दुनियावी नज़र में ग़रीब ही क्यों न हों।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि इंसान को अल्लाह के फैसलों पर भरोसा करना चाहिए और दुनियावी ऊँचाई-नीचाई को कसौटी नहीं बनाना चाहिए। अल्लाह की रहमत और हिदायत उसी को मिलती है जो दिल से सच्चा हो, चाहे वह किसी भी घराने या माली हालत से क्यों न हो। यही वह सच्चाई है जो हमें अल्लाह के दीन की तरफ खींचती है — कि इस्लाम में बड़ाई का मापदंड तक़वा है, न कि दौलत और ओहदा।



📜 आयत 29-33 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

29بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ
बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा
30وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ
और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं
31وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया
32أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है
33وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
31आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 31

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Sunday, October 4, 2026

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