अज़-ज़ुखरुफ · 29/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ ۝٢٩
Bal matta`tu haaa`ulaaa`i wa aabaaa`ahum hattaa jaaa`a humul haqqu wa Rasoolum mubeen
📖 हिंदी अर्थ
बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَتَّعْتُ: मैंने आनंद दिया, सुख-सुविधाएँ दीं।
  • هَٰؤُلَاءِ: ये लोग (मक्का के काफ़िर)।
  • آبَاءَهُمْ: उनके बाप-दादा।
  • الْحَقُّ: सत्य (यहाँ अर्थ: क़ुरआन)।
  • رَسُولٌ مُّبِينٌ: स्पष्ट रूप से सत्य को बयान करने वाला रसूल (यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ को दिलासा देते हुए फ़रमा रहे हैं कि ऐ रसूल! आप इस बात से हैरान न हों कि ये मक्का के मुशरिकीन आपको झुठला रहे हैं और हक़ को क़बूल नहीं कर रहे। मैंने इन लोगों को और इनसे पहले इनके बाप-दादा को दुनिया में खूब सुख-सुविधाएँ और लंबी उम्र दी, उन्हें माल-दौलत और ताकत से नवाज़ा, लेकिन इनकी नाशुक्री के बावजूद मैंने उन पर फ़ौरन अज़ाब नाज़िल नहीं किया। मेरी यह मोहलत और ढील किसी कमज़ोरी की वजह से नहीं थी, बल्कि यह मेरी रहमत और हिकमत का तक़ाज़ा था।

मैंने उन्हें यह मोहलत इसलिए दी कि जब उनके पास हक़ (क़ुरआन) आए और एक रसूल जो सारे अहकाम और दीन की बातों को साफ़-साफ़ बयान करने वाला हो — यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ — तो वे उसे सुनकर समझें और ईमान ले आएँ। यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है कि उसने अपने बंदों को दुनिया में मोहलत दी, उनकी फ़ौरन पकड़ नहीं की, ताकि उन्हें हिदायत का मौक़ा मिले।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त बहुत ही रहीम और करीम है। वह गुनाहगारों को भी दुनिया में रिज़्क़ देता है और उन्हें मौक़ा देता है कि वे अपनी ग़लतियों से बाज़ आएँ। लेकिन यह मोहलत हमेशा के लिए नहीं है — जब अल्लाह का फ़ैसला आ जाता है, तो कोई उसे टाल नहीं सकता। इसलिए हमें चाहिए कि जब हमारे पास हक़ और सच्चाई पहुँचे, तो उसे खुले दिल से क़बूल करें, क्योंकि यही हमारी कामयाबी का ज़रिया है। अल्लाह ने क़ुरआन और रसूल ﷺ के ज़रिए हमें रास्ता दिखाया है — यह हमारी बड़ी किस्मत है कि हम उस उम्मत में हैं जिसे सबसे आख़िरी और पूरा दीन अता हुआ। हमें इस नेमत की क़द्र करनी चाहिए और अपनी ज़िंदगी को क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ ढालना चाहिए।



📜 आयत 27-31 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

27إِلَّا الَّذِي فَطَرَنِي فَإِنَّهُ سَيَهْدِينِ
मगर उसकी इबादत करता हूँ, जिसने मुझे पैदा किया तो वही बहुत जल्द मेरी हिदायत करेगा
28وَجَعَلَهَا كَلِمَةً بَاقِيَةً فِي عَقِبِهِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और उसी (ईमान) को इब्राहीम ने अपनी औलाद में हमेशा बाक़ी रहने वाली बात छोड़ गए ताकि वह (ख़ुदा की तरफ रूजू) करें
29بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ
बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता रहा यहाँ तक कि उनके पास (दीने) हक़ और साफ़ साफ़ बयान करने वाला रसूल आ पहुँचा
30وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ
और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं
31وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
29आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 29

सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 29 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : बल्कि मैं उनको और उनके बाप दादाओं को फायदा पहुँचाता…

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Saturday, October 3, 2026

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