अज़-ज़ुखरुफ · 32/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ ۝٣٢
Ahum yaqsimoona rahmata Rabbik; Nahnu qasamnaa bainahum ma`eeshatahum fil hayaatid dunyaa wa rafa`naa ba`dahum fawqa ba`din darajaatil liyattakhiza ba`duhum ba`dan sukhriyyaa; wa rahmatu Rabbika khairum mimmaa yajma`oon
📖 हिंदी अर्थ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • रहमत: यहाँ अर्थ है नबुव्वत (पैग़म्बरी) और आख़िरत की नेमतें।
  • मआश: गुज़ारा, रोज़ी, जीविका।
  • सुख़्रिय्यन: एक दूसरे के अधीन और सेवा में लगा हुआ।

तफ़सीर:

क्या ये लोग तेरे रब की रहमत (नबुव्वत) को बाँटने वाले हैं कि जिसे चाहें दे दें और जिससे चाहें रोक लें? हालाँकि ये ख़ुद इस बात की ताक़त नहीं रखते। अल्लाह ही है जिसने इनकी दुनियावी रोज़ी को इनके बीच बाँटा है — किसी को धन दिया, किसी को ग़रीबी दी, किसी को ताक़त दी, किसी को कमज़ोरी दी, किसी को ऊँचा दर्जा दिया और किसी को नीचा। यह सब कुछ अल्लाह की हिकमत से है, ताकि लोग एक दूसरे के ज़रिए अपनी ज़रूरतें पूरी करें — अमीर ग़रीब की मेहनत से काम ले और ग़री� अमीर के पैसे से अपना गुज़ारा करे। इस तरह दुनिया का निज़ाम चलता है।

और ऐ नबी! तेरे रब की रहमत — यानी जन्नत और उसकी नेमतें — उन सब चीज़ों से कहीं बेहतर है जो ये लोग दुनिया में जमा कर रहे हैं। दुनिया का माल तो फ़ानी है, जन्नत हमेशा रहने वाली है। ये लोग जो दौलत इकट्ठा करते हैं, वह उनके काम न आएगी, लेकिन अल्लाह की रहमत उसके नेक बंदों के लिए हमेशा रहने वाली नेमत है।

दावती पहलू:

इस आयत में अल्लाह तआला हमें सिखाता है कि रोज़ी और दर्जे बाँटने वाला अकेला अल्लाह है। जिस तरह उसने दुनिया की रोज़ी बाँटी है, उसी तरह नबुव्वत और हिदायत भी उसी की मर्ज़ी से आती है। जब हम यह समझ लें कि सब कुछ अल्लाह के हाथ में है, तो हमारा दिल उसी से जुड़ जाता है। हमें अपनी रोज़ी की चिंता में घुलने की ज़रूरत नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत — यानी ईमान, नेक अमल और जन्नत — की तरफ़ दौड़ना चाहिए। यही सबसे बड़ी कामयाबी है। जो लोग सिर्फ़ दुनिया की दौलत जमा करने में लगे हैं, वे असली ख़ज़ाने से महरूम हैं। अल्लाह की रहमत और उसकी रज़ा हर दौलत से बेहतर है।



📜 आयत 30-34 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

30وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ
और जब उनके पास (दीन) हक़ आ गया तो कहने लगे ये तो जादू है और हम तो हरगिज़ इसके मानने वाले नहीं
31وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया
32أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है
33وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)
34وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ
और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
32आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 32

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Saturday, October 3, 2026

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