अज़-ज़ुखरुफ · 33/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ ۝٣٣
Wa law laaa any yakoonan naasu ummatanw waahidatal laja`alnaa limany yakfuru bir Rahmaani libu yootihim suqufam min fiddatinw wa ma`aarija `alaihaa yazharoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • सुक़ुफ़न (سُقُفًا): छतें
  • मआरिज (مَعَارِجَ): सीढ़ियाँ, जिन पर चढ़कर ऊपर जाते हैं
  • यज़्हरून (يَظْهَرُونَ): वे ऊपर चढ़ते हैं / प्रकट होते हैं

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि दुनिया की दौलत और ऐशो-आराम का अल्लाह के यहाँ कोई मूल्य नहीं है। अगर यह डर न होता कि सारे लोग कुफ्र पर इकट्ठे हो जाएँगे और दुनिया की इस चमक-दमक को देखकर काफ़िरों के पीछे हो लेंगे, तो अल्लाह तआला काफ़िरों को दुनिया की इतनी नेअमतें देता कि उनके घरों की छतें चाँदी की होतीं और उनके लिए चाँदी की सीढ़ियाँ होतीं जिन पर वे चढ़ते-उतरते।

यह बात बताती है कि दुनिया की दौलत अल्लाह की नज़र में कोई चीज़ नहीं है। अल्लाह तआला चाहे तो काफ़िरों को भी ये सब कुछ दे सकता है, लेकिन उसने यह इसलिए नहीं दिया कि लोग दुनिया को ही सब कुछ न समझ लें और कुफ्र की तरफ आकर्षित न हो जाएँ। असल में अल्लाह तआला ने दुनिया की दौलत को आख़िरत की भलाई से कहीं कम दर्जा दिया है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि दुनिया का माल-ओ-दौलत, सोना-चाँदी और ऐशो-आराम के साधन किसी इंसान की असली क़द्र-ओ-मंज़िलत का पैमाना नहीं हैं। अल्लाह तआला जिसे चाहता है दुनिया देता है और जिसे चाहता है नहीं देता। असली कामयाबी तो अल्लाह की रहमत और उसकी मग़फिरत है। मोमिन को चाहिए कि वह दुनिया की चमक-दमक से धोखा न खाए और न ही काफ़िरों की फ़राग़त (सुख-समृद्धि) को देखकर अपने ईमान में कमज़ोरी लाए। अल्लाह तआला ने मोमिनों के लिए जो कुछ आख़िरत में रखा है, वह दुनिया की हर चीज़ से बेहतर और पाएदार है।

याद रखिए! अल्लाह तआला अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान है। वह दुनिया की आज़माइश में जो कुछ भी देता है, उसमें हिकमत होती है। कभी वह किसी को दौलत देकर आज़माता है और कभी किसी को फ़क़ीरी (गरीबी) देकर। हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें और उसकी रहमत के तलबगार रहें। दुनिया की ज़िंदगी तो चंद रोज़ की है, लेकिन आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा की है। जो इंसान आख़िरत को सामने रखकर ज़िंदगी गुज़ारता है, वही असल में कामयाब है।



📜 आयत 31-35 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

31وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
और कहने लगे कि ये क़ुरान इन दो बस्तियों (मक्के ताएफ) में से किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं नाज़िल किया गया
32أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है
33وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)
34وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ
और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते
35وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَالْآخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ
ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहॉ ख़ास परहेज़गारों के लिए है
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
33आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 33

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Friday, October 2, 2026

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