अल-अहकाफ · 12/35
अनुवाद उच्चारण — अल-अहकाफ
وَمِن قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَىٰ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ وَهَٰذَا كِتَابٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنذِرَ الَّذِينَ ظَلَمُوا وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ ۝١٢
Wa min qablihee kitaabu Moosaaa imaamanw-wa rahmah; wa haazaa Kitaabum musad diqul lisaanan `Arabiyyal liyunziral lazeena zalamoo wa bushraa lilmuhsineen
📖 हिंदी अर्थ
और इसके क़ब्ल मूसा की किताब पेशवा और (सरासर) रहमत थी और ये (क़ुरान) वह किताब है जो अरबी ज़बान में (उसकी) तसदीक़ करती है ताकि (इसके ज़रिए से) ज़ालिमों को डराए और नेकी कारों के लिए (अज़सरतापा) ख़ुशख़बरी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِمَامًا: नेता और अनुसरण किया जाने वाला, जिसकी पैरवी की जाए।
  • رَحْمَةً: दया और रहमत का ज़रिया।
  • مُصَدِّقٌ: सत्यापित करने वाला, पुष्टि करने वाला।
  • لِّيُنذِرَ: ताकि डराया जाए और सचेत किया जाए।
  • الَّذِينَ ظَلَمُوا: जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया (यानी कुफ्र और गुनाह किए)।
  • الْمُحْسِنِينَ: नेकी करने वाले, जो अपने ईमान और अमल में अच्छाई रखते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इस क़ुरआन से पहले हमने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) पर तौरात नाज़िल की थी, जो बनी इसराईल के लिए रहनुमा और नेता थी, जिसकी वे पैरवी करते थे, और उन लोगों के लिए रहमत थी जो उस पर ईमान लाए और उस पर अमल किया। और यह क़ुरआन जो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर नाज़िल हुआ है, वह अपने से पहले की किताबों की तस्दीक़ करने वाला है, यानी उन सच्चाइयों की पुष्टि करता है जो पहले की किताबों में थीं। इसे अरबी ज़बान में नाज़िल किया गया ताकि यह उन लोगों को डराए जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया — यानी शिर्क और गुनाहों के ज़रिए अपनी रूह पर अत्याचार किया — और यह उन नेक लोगों के लिए खुशख़बरी है जिन्होंने अपने अल्लाह के साथ अपना रिश्ता अच्छा किया और उसकी इबादत को सिर्फ़ उसी के लिए ख़ास किया, और अपने बंदों के साथ भी नेकी की।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला ने हर ज़माने में अपने बंदों की हिदायत के लिए किताबें भेजीं, और आख़िरी किताब क़ुरआन है जो पहले की सब किताबों की तस्दीक़ करती है। यह किताब सिर्फ़ डराने के लिए नहीं आई, बल्कि यह रहमत और खुशख़बरी भी है। जो लोग अपनी ज़िंदगी को सुधारेंगे और अल्लाह की राह पर चलेंगे, उनके लिए इसमें बेशुमार खुशख़बरियाँ हैं। यह हमारे लिए बड़ी नेमत है कि हमें ऐसी किताब मिली जो हमें सीधा रास्ता दिखाती है और हमें जहन्नुम के अज़ाब से बचाकर जन्नत की तरफ ले जाती है। आओ हम इस किताब को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें, ताकि हम उन नेक लोगों में शामिल हों जिनके लिए यह खुशख़बरी है।



📜 आयत 10-14 — अल-अहकाफ

10قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَكَفَرْتُم بِهِ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِّن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ مِثْلِهِ فَآمَنَ وَاسْتَكْبَرْتُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि भला देखो तो कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की तरफ से हो और तुम उससे इन्कार कर बैठे हालॉकि (बनी इसराईल में से) एक गवाह उसके मिसल की गवाही भी दे चुका और ईमान भी ले आया और तुमने सरकशी की (तो तुम्हारे ज़ालिम होने में क्या शक़ है) बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मन्ज़िल मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
11وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا لَوْ كَانَ خَيْرًا مَّا سَبَقُونَا إِلَيْهِ ۚ وَإِذْ لَمْ يَهْتَدُوا بِهِ فَسَيَقُولُونَ هَٰذَا إِفْكٌ قَدِيمٌ
और काफिर लोग मोमिनों के बारे में कहते हैं कि अगर ये (दीन) बेहतर होता तो ये लोग उसकी तरफ हमसे पहले न दौड़ पड़ते और जब क़ुरान के ज़रिए से उनकी हिदायत न हुई तो अब भी कहेंगे ये तो एक क़दीमी झूठ है
12وَمِن قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَىٰ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ وَهَٰذَا كِتَابٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنذِرَ الَّذِينَ ظَلَمُوا وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ
और इसके क़ब्ल मूसा की किताब पेशवा और (सरासर) रहमत थी और ये (क़ुरान) वह किताब है जो अरबी ज़बान में (उसकी) तसदीक़ करती है ताकि (इसके ज़रिए से) ज़ालिमों को डराए और नेकी कारों के लिए (अज़सरतापा) ख़ुशख़बरी है
13إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
बेशक जिन लोगों ने कहा कि हमारा परवरदिगार ख़ुदा है फिर वह इस पर क़ायम रहे तो (क़यामत में) उनको न कुछ ख़ौफ़ होगा और न वह ग़मग़ीन होंगे
14أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ خَالِدِينَ فِيهَا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
यही तो अहले जन्नत हैं कि हमेशा उसमें रहेंगे (ये) उसका सिला है जो ये लोग (दुनिया में) किया करते थे
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अनुवाद — अल-अहकाफ 12

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पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

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