अल-माइदा · 26/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
قَالَ فَإِنَّهَا مُحَرَّمَةٌ عَلَيْهِمْ ۛ أَرْبَعِينَ سَنَةً ۛ يَتِيهُونَ فِي الْأَرْضِ ۚ فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ ۝٢٦
Qaala fa innahaa muhar ramatun `alaihim arba`eena sanah; yateehoona fil ard; falaa taasa `alal qawmil faasiqeen
📖 हिंदी अर्थ
हमारा उनका साथ नहीं हो सकता (ख़ुदा ने फ़रमाया) (अच्छा) तो उनकी सज़ा यह है कि उनको चालीस बरस तक की हुकूमत नसीब न होगा (और उस मुद्दते दराज़ तक) यह लोग (मिस्र के) जंगल में सरगरदॉ रहेंगे तो फिर तुम इन बदचलन बन्दों पर अफ़सोस न करना

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُحَرَّمَةٌ عَلَيْهِمْ – उन पर हराम (वर्जित) कर दी गई।
  • يَتِيهُونَ – वे भटकते پھریں گے، حیران و سرگرداں رہیں گے।
  • فَلَا تَأْسَ – तो आप शोक न करें, दुखी न हों।
  • الْفَاسِقِينَ – आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, अवज्ञाकारी लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपने नबी मूसा (अलैहिस्सलाम) को खबर दी कि वह पवित्र भूमि (बैतुल-मुक़द्दस) जिसमें उन्होंने बनी इसराइल को दाखिल होने का आदेश दिया था, वह उन पर चालीस साल के लिए हराम कर दी गई है। यह सज़ा उनकी नाफ़रमानी और बुज़ुर्गी के कारण थी, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के हुक्म को मानने से इनकार कर दिया था और कहा था कि हम उस जगह नहीं जाएंगे जब तक वहाँ के ज़ालिम लोग वहाँ से निकल न जाएं। इसलिए अल्लाह ने उन्हें चालीस साल तक जंगल में भटकने की सज़ा दी, जहाँ वे हैरान और परेशान होकर इधर-उधर भटकते रहे, न उन्हें कोई ठिकाना मिला और न ही वे उस पवित्र भूमि में दाखिल हो सके।

अल्लाह तआला ने अपने नबी मूसा (अलैहिस्सलाम) को तसल्ली दी कि आप इन नाफ़रमान और अवज्ञाकारी लोगों पर शोक न करें, क्योंकि यह सज़ा उनके अपने कर्मों और गुनाहों का नतीजा है। यह उनकी हरकतों का स्वाभाविक परिणाम था, जो उन्होंने अल्लाह के हुक्म के सामने सरकशी और इनकार करके कमाया था।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की नाफ़रमानी और उसके हुक्म के सामने अकड़ने का अंजाम बहुत बुरा होता है। बनी इसराइल को चालीस साल की भटकन और मुश्किलों का सामना करना पड़ा, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने अल्लाह के हुक्म को मानने से इनकार किया। यह हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम अल्लाह के हुक्मों को बिना किसी हिचकिचाहट के मानें, क्योंकि अल्लाह जो कुछ भी फरमाता है, उसमें हमारी भलाई ही होती है। अल्लाह की राह में सब्र और भरोसा ही कामयाबी की कुंजी है। जो लोग अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाते हैं, अल्लाह उन्हें इज़्ज़त और कामयाबी देता है, और जो सरकशी करते हैं, वे अपने लिए मुसीबतें खुद लाते हैं। हमें चाहिए कि हम हर हाल में अल्लाह की आज्ञा का पालन करें और उसकी रहमत और माफ़ी के तलबगार रहें, क्योंकि अल्लाह बड़ा मेहरबान और रहम फरमाने वाला है।



📜 आयत 24-28 — अल-माइदा

24قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِنَّا لَن نَّدْخُلَهَا أَبَدًا مَّا دَامُوا فِيهَا ۖ فَاذْهَبْ أَنتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ
वह कहने लगे एक मूसा (चाहे जो कुछ हो) जब तक वह लोग इसमें हैं हम तो उसमें हरगिज़ (लाख बरस) पॉव न रखेंगे हॉ तुम जाओ और तुम्हारा ख़ुदा जाए ओर दोनों (जाकर) लड़ो हम तो यहीं जमे बैठे हैं
25قَالَ رَبِّ إِنِّي لَا أَمْلِكُ إِلَّا نَفْسِي وَأَخِي ۖ فَافْرُقْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ
तब मूसा ने अर्ज़ की ख़ुदावन्दा तू ख़ूब वाक़िफ़ है कि अपनी ज़ाते ख़ास और अपने भाई के सिवा किसी पर मेरा क़ाबू नहीं बस अब हमारे और उन नाफ़रमान लोगों के दरमियान जुदाई डाल दे
26قَالَ فَإِنَّهَا مُحَرَّمَةٌ عَلَيْهِمْ ۛ أَرْبَعِينَ سَنَةً ۛ يَتِيهُونَ فِي الْأَرْضِ ۚ فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ
हमारा उनका साथ नहीं हो सकता (ख़ुदा ने फ़रमाया) (अच्छा) तो उनकी सज़ा यह है कि उनको चालीस बरस तक की हुकूमत नसीब न होगा (और उस मुद्दते दराज़ तक) यह लोग (मिस्र के) जंगल में सरगरदॉ रहेंगे तो फिर तुम इन बदचलन बन्दों पर अफ़सोस न करना
27۞ وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ ابْنَيْ آدَمَ بِالْحَقِّ إِذْ قَرَّبَا قُرْبَانًا فَتُقُبِّلَ مِنْ أَحَدِهِمَا وَلَمْ يُتَقَبَّلْ مِنَ الْآخَرِ قَالَ لَأَقْتُلَنَّكَ ۖ قَالَ إِنَّمَا يَتَقَبَّلُ اللَّهُ مِنَ الْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) तुम इन लोगों से आदम के दो बेटों (हाबील, क़ाबील) का सच्चा क़स्द बयान कर दो कि जब उन दोनों ने ख़ुदा की दरगाह में नियाज़ें चढ़ाई तो (उनमें से) एक (हाबील) की (नज़र तो) क़ुबूल हुई और दूसरे (क़ाबील) की नज़र न क़ुबूल हुई तो (मारे हसद के) हाबील से कहने लगा मैं तो तुझे ज़रूर मार डालूंगा उसने जवाब दिया कि (भाई इसमें अपना क्या बस है) ख़ुदा तो सिर्फ परहेज़गारों की नज़र कुबूल करता है
28لَئِن بَسَطتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ ۖ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
अगर तुम मेरे क़त्ल के इरादे से मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाओगे (तो ख़ैर बढ़ाओ) (मगर) मैं तो तुम्हारे क़त्ल के ख्याल से अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं (क्योंकि) मैं तो उस ख़ुदा से जो सारे जहॉन का पालने वाला है ज़रूर डरता हूं
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अनुवाद — अल-माइदा 26

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सूरा आयत 26/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 24–28. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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