अल-माइदा · 29/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
إِنِّي أُرِيدُ أَن تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ ۝٢٩
Inee ureedu an tabooo`a bi ismee wa ismika fatakoona min Ashaabin Naar; wa zaalika jazaaa`uz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَبُوءَ: लौटना या उठाना, यहाँ अर्थ है अपने ऊपर लेना या वहन करना।
  • بِإِثْمِي: मेरे क़त्ल का गुनाह (मुझे मारने का पाप)।
  • وَإِثْمِكَ: अपने पिछले गुनाहों का बोझ भी।
  • أَصْحَابِ النَّارِ: जहन्नम में रहने वाले, आग के साथी।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब क़ाबिल ने हाबिल को मारने का पक्का इरादा कर लिया और अल्लाह तआला व अपने पिता आदम (अलैहिस्सलाम) की नाफ़रमानी पर उतर आया, तो हाबिल ने उसे नसीहत करते हुए कहा: "मैं नहीं चाहता कि तू मेरे क़त्ल का गुनाह अपने सर ले, बल्कि मैं चाहता हूँ कि तू मेरे क़त्ल का पाप और अपने पिछले सारे गुनाह अपने ऊपर लेकर जहन्नम का निवासी बने। यही ज़ालिमों (अत्याचारियों) की सज़ा है।"

हाबिल ने यह बात इसलिए कही कि वह ख़ुद क़ाबिल को मारने का गुनाह अपने सिर लेना नहीं चाहता था, क्योंकि वह नेक और पवित्र इंसान था। वह चाहता था कि क़ाबिल अपने किए की सज़ा भुगते और अल्लाह की नाराज़गी का शिकार हो। यह हाबिल की बड़ी ऊँची नीयत और तक़वा की निशानी थी कि उसने बदला लेने या ज़्यादती करने की बजाय अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी रहना पसंद किया।

यह आयत हमें सिखाती है कि एक मोमिन को कभी भी ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए, चाहे उसके साथ कितना भी बुरा क्यों न हुआ हो। हाबिल ने अपने भाई के ज़ुल्म के बावजूद उसे अच्छी नसीहत दी और अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुकाया। यही वह रास्ता है जो हमें जहन्नम से बचाकर जन्नत तक पहुँचाता है। अल्लाह तआला ज़ालिमों को कभी बेइंसाफ़ी की सज़ा बग़ैर नहीं छोड़ता, और मज़लूमों की फ़रियाद सुनता है।

आज हमें भी हाबिल की इस सीख पर अमल करना चाहिए—बुराई का जवाब अच्छाई से देना, और अल्लाह के फ़ैसले पर भरोसा रखना। यही इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 27-31 — अल-माइदा

27۞ وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ ابْنَيْ آدَمَ بِالْحَقِّ إِذْ قَرَّبَا قُرْبَانًا فَتُقُبِّلَ مِنْ أَحَدِهِمَا وَلَمْ يُتَقَبَّلْ مِنَ الْآخَرِ قَالَ لَأَقْتُلَنَّكَ ۖ قَالَ إِنَّمَا يَتَقَبَّلُ اللَّهُ مِنَ الْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) तुम इन लोगों से आदम के दो बेटों (हाबील, क़ाबील) का सच्चा क़स्द बयान कर दो कि जब उन दोनों ने ख़ुदा की दरगाह में नियाज़ें चढ़ाई तो (उनमें से) एक (हाबील) की (नज़र तो) क़ुबूल हुई और दूसरे (क़ाबील) की नज़र न क़ुबूल हुई तो (मारे हसद के) हाबील से कहने लगा मैं तो तुझे ज़रूर मार डालूंगा उसने जवाब दिया कि (भाई इसमें अपना क्या बस है) ख़ुदा तो सिर्फ परहेज़गारों की नज़र कुबूल करता है
28لَئِن بَسَطتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ ۖ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
अगर तुम मेरे क़त्ल के इरादे से मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाओगे (तो ख़ैर बढ़ाओ) (मगर) मैं तो तुम्हारे क़त्ल के ख्याल से अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं (क्योंकि) मैं तो उस ख़ुदा से जो सारे जहॉन का पालने वाला है ज़रूर डरता हूं
29إِنِّي أُرِيدُ أَن تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ
मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है
30فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
फिर तो उसके नफ्स ने अपने भाई के क़त्ल पर उसे भड़का ही दिया आख़िर उस (कम्बख्त ने) उसको मार ही डाला तो घाटा उठाने वालों में से हो गया
31فَبَعَثَ اللَّهُ غُرَابًا يَبْحَثُ فِي الْأَرْضِ لِيُرِيَهُ كَيْفَ يُوَارِي سَوْءَةَ أَخِيهِ ۚ قَالَ يَا وَيْلَتَا أَعَجَزْتُ أَنْ أَكُونَ مِثْلَ هَٰذَا الْغُرَابِ فَأُوَارِيَ سَوْءَةَ أَخِي ۖ فَأَصْبَحَ مِنَ النَّادِمِينَ
(तब उसे फ़िक्र हुई कि लाश को क्या करे) तो ख़ुदा ने एक कौवे को भेजा कि वह ज़मीन को कुरेदने लगा ताकि उसे (क़ाबील) को दिखा दे कि उसे अपने भाई की लाश क्योंकर छुपानी चाहिए (ये देखकर) वह कहने लगा हाए अफ़सोस क्या मैं उस से भी आजिज़ हूं कि उस कौवे की बराबरी कर सकॅू कि (बला से यह भी होता) तो अपने भाई की लाश छुपा देता अलगरज़ वह (अपनी हरकत से) बहुत पछताया
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अनुवाद — अल-माइदा 29

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Tuesday, August 18, 2026

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