अल-माइदा · 30/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ ۝٣٠
Fatawwa`at lahoo nafsu hoo qatla akheehi faqatalahoo fa asbaha minal khaasireen
📖 हिंदी अर्थ
फिर तो उसके नफ्स ने अपने भाई के क़त्ल पर उसे भड़का ही दिया आख़िर उस (कम्बख्त ने) उसको मार ही डाला तो घाटा उठाने वालों में से हो गया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ: उसके नफ्स (अहंकार/बुरी प्रवृत्ति) ने उसे प्रोत्साहित किया और उसके लिए इस काम को आसान और आकर्षक बना दिया।
  • قَتْلَ أَخِيهِ: अपने भाई की हत्या करना।
  • فَقَتَلَهُ: फिर उसने उसे मार डाला।
  • فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ: तो वह घाटे में रहने वालों में से हो गया।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत हमें क़ाबिल और हाबिल (आदम अलैहिस्सलाम के दो बेटों) की उस दुखद घटना से अवगत कराती है, जो मानव इतिहास की पहली हत्या थी। जब हाबिल की कुर्बानी अल्लाह ने क़बूल कर ली और क़ाबिल की कुर्बानी इसलिए क़बूल नहीं हुई क्योंकि उसका इरादा ख़ालिस नहीं था, तो क़ाबिल के दिल में ईर्ष्या और जलन की आग भड़क उठी।

उसकी बुरी प्रवृत्ति (नफ्स-ए-अम्मारा) ने उसे धीरे-धीरे यह समझाना शुरू किया कि अपने भाई को रास्ते से हटा देना ही सही रास्ता है। शैतान ने उसके नफ्स के ज़रिए उसके दिल में यह बात डाली कि यही तुम्हारी भलाई के लिए है। उसके नफ्स ने उसके लिए भाई की हत्या को इतना आसान और सुंदर बना दिया कि उसे इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आई।

आख़िरकार उसने अपने भाई हाबिल को मार ही डाला। लेकिन इस हत्या के बाद उसे क्या मिला? कुछ भी नहीं, बल्कि वह दुनिया और आख़िरत दोनों में घाटे में रहा। दुनिया में उसे पछतावे, दुख और अल्लाह की नाराज़गी मिली, और आख़िरत में उसे कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा। वह अपने दीन (धर्म) और दुनिया दोनों में नुक़सान उठाने वाला बन गया।

यह आयत हमें सिखाती है कि जब इंसान अपने नफ्स की बात मान लेता है और अल्लाह की नाराज़गी की परवाह नहीं करता, तो वह ऐसे काम कर बैठता है जिनका अंजाम सिर्फ़ नुक़सान और पछतावा होता है। नफ्स की बुरी प्रवृत्ति इंसान को धोखा देती है, लेकिन अल्लाह का डर और सब्र ही इंसान को इस धोखे से बचाता है।


दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह क़िस्सा हमारे लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। देखिए, क़ाबिल ने अपने भाई को सिर्फ़ इसलिए मार डाला क्योंकि उसे ईर्ष्या आ गई थी। आज भी दुनिया में कितने लोग ईर्ष्या, लालच और ग़ुस्से की वजह से एक-दूसरे को नुक़सान पहुँचाते हैं। लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने नफ्स पर क़ाबू रखें, अल्लाह से डरें और दूसरों के साथ भलाई करें। अगर हम अपने नफ्स की बात मान लेंगे, तो अंजाम वही होगा जो क़ाबिल का हुआ — घाटा और पछतावा। लेकिन अगर हम अल्लाह की राह पर चलेंगे, तो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी मिलेगी। अल्लाह हमें अपने नफ्स के शर से बचाए और हमें सब्र और नेकी की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 28-32 — अल-माइदा

28لَئِن بَسَطتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ ۖ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
अगर तुम मेरे क़त्ल के इरादे से मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाओगे (तो ख़ैर बढ़ाओ) (मगर) मैं तो तुम्हारे क़त्ल के ख्याल से अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं (क्योंकि) मैं तो उस ख़ुदा से जो सारे जहॉन का पालने वाला है ज़रूर डरता हूं
29إِنِّي أُرِيدُ أَن تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ
मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है
30فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
फिर तो उसके नफ्स ने अपने भाई के क़त्ल पर उसे भड़का ही दिया आख़िर उस (कम्बख्त ने) उसको मार ही डाला तो घाटा उठाने वालों में से हो गया
31فَبَعَثَ اللَّهُ غُرَابًا يَبْحَثُ فِي الْأَرْضِ لِيُرِيَهُ كَيْفَ يُوَارِي سَوْءَةَ أَخِيهِ ۚ قَالَ يَا وَيْلَتَا أَعَجَزْتُ أَنْ أَكُونَ مِثْلَ هَٰذَا الْغُرَابِ فَأُوَارِيَ سَوْءَةَ أَخِي ۖ فَأَصْبَحَ مِنَ النَّادِمِينَ
(तब उसे फ़िक्र हुई कि लाश को क्या करे) तो ख़ुदा ने एक कौवे को भेजा कि वह ज़मीन को कुरेदने लगा ताकि उसे (क़ाबील) को दिखा दे कि उसे अपने भाई की लाश क्योंकर छुपानी चाहिए (ये देखकर) वह कहने लगा हाए अफ़सोस क्या मैं उस से भी आजिज़ हूं कि उस कौवे की बराबरी कर सकॅू कि (बला से यह भी होता) तो अपने भाई की लाश छुपा देता अलगरज़ वह (अपनी हरकत से) बहुत पछताया
32مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم بَعْدَ ذَٰلِكَ فِي الْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ
इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहे
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अनुवाद — अल-माइदा 30

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Tuesday, August 18, 2026

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