अल-माइदा · 28/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
لَئِن بَسَطتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ ۖ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ ۝٢٨
La`im basatta ilaiya yadaka litaqtulanee maaa ana bibaasitiny yadiya ilaika li aqtulaka inneee akhaaful laaha Rabbal `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
अगर तुम मेरे क़त्ल के इरादे से मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाओगे (तो ख़ैर बढ़ाओ) (मगर) मैं तो तुम्हारे क़त्ल के ख्याल से अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं (क्योंकि) मैं तो उस ख़ुदा से जो सारे जहॉन का पालने वाला है ज़रूर डरता हूं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بَسَطتَ – तूने बढ़ाई (हाथ)
  • لِتَقْتُلَنِي – मुझे मार डालने के लिए
  • بَاسِطٍ – बढ़ाने वाला
  • أَخَافُ – मैं डरता हूँ
  • رَبِّ الْعَالَمِينَ – सारे जहानों का पालनहार

तफसीर (व्याख्या):

हाबिल (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाई क़ाबिल को नसीहत करते हुए कहा: “अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाएगा, तो मैं तेरी तरफ अपना हाथ नहीं बढ़ाऊँगा कि तुझे क़त्ल करूँ।” यह बात उन्होंने कमज़ोरी या बुज़दिली की वजह से नहीं कही, बल्कि इसलिए कही कि उनके दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ था। वे जानते थे कि अल्लाह तआला ने क़त्ल को हराम किया है, और एक मोमिन का काम यह नहीं कि वह ज़ुल्म का जवाब ज़ुल्म से दे। हाबिल ने यह भी समझाना चाहा कि मेरा इम्तिना (इनकार) तेरे खिलाफ़ जंग का एलान नहीं, बल्कि अल्लाह के डर से है — मैं उस रब से डरता हूँ जो तमाम कायनात का पालनहार है, और मैं उसकी नाराज़गी को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता।

यहाँ हाबिल ने एक बहुत बड़ी तालीम दी — कि इंसान चाहे कितना ही मज़लूम हो, उसे चाहिए कि वह अल्लाह की मरज़ी को अपनी ज़ात पर मुक़द्दम रखे। उन्होंने यह भी दिखाया कि सब्र और अल्लाह का ख़ौफ़ ही असली ताक़त है, और जो शख्स अल्लाह से डरता है, वह कभी ज़ुल्म के रास्ते पर नहीं चलता। यह वाक़िया हमें सिखाता है कि मुसीबत और ज़ुल्म के वक़्त भी हमें इंसाफ़, हलीमी और अल्लाह की रज़ा को मद्देनज़र रखना चाहिए। हाबिल का यह अंदाज़ हमारे लिए एक रोशन नमूना है कि दुश्मन के साथ भी हमें अल्लाह की सीखी हुई अख़लाक़ का मुज़ाहिरा करना चाहिए, और यही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में सरबुलंदी देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 26-30 — अल-माइदा

26قَالَ فَإِنَّهَا مُحَرَّمَةٌ عَلَيْهِمْ ۛ أَرْبَعِينَ سَنَةً ۛ يَتِيهُونَ فِي الْأَرْضِ ۚ فَلَا تَأْسَ عَلَى الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ
हमारा उनका साथ नहीं हो सकता (ख़ुदा ने फ़रमाया) (अच्छा) तो उनकी सज़ा यह है कि उनको चालीस बरस तक की हुकूमत नसीब न होगा (और उस मुद्दते दराज़ तक) यह लोग (मिस्र के) जंगल में सरगरदॉ रहेंगे तो फिर तुम इन बदचलन बन्दों पर अफ़सोस न करना
27۞ وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ ابْنَيْ آدَمَ بِالْحَقِّ إِذْ قَرَّبَا قُرْبَانًا فَتُقُبِّلَ مِنْ أَحَدِهِمَا وَلَمْ يُتَقَبَّلْ مِنَ الْآخَرِ قَالَ لَأَقْتُلَنَّكَ ۖ قَالَ إِنَّمَا يَتَقَبَّلُ اللَّهُ مِنَ الْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) तुम इन लोगों से आदम के दो बेटों (हाबील, क़ाबील) का सच्चा क़स्द बयान कर दो कि जब उन दोनों ने ख़ुदा की दरगाह में नियाज़ें चढ़ाई तो (उनमें से) एक (हाबील) की (नज़र तो) क़ुबूल हुई और दूसरे (क़ाबील) की नज़र न क़ुबूल हुई तो (मारे हसद के) हाबील से कहने लगा मैं तो तुझे ज़रूर मार डालूंगा उसने जवाब दिया कि (भाई इसमें अपना क्या बस है) ख़ुदा तो सिर्फ परहेज़गारों की नज़र कुबूल करता है
28لَئِن بَسَطتَ إِلَيَّ يَدَكَ لِتَقْتُلَنِي مَا أَنَا بِبَاسِطٍ يَدِيَ إِلَيْكَ لِأَقْتُلَكَ ۖ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
अगर तुम मेरे क़त्ल के इरादे से मेरी तरफ़ अपना हाथ बढ़ाओगे (तो ख़ैर बढ़ाओ) (मगर) मैं तो तुम्हारे क़त्ल के ख्याल से अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं (क्योंकि) मैं तो उस ख़ुदा से जो सारे जहॉन का पालने वाला है ज़रूर डरता हूं
29إِنِّي أُرِيدُ أَن تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ
मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है
30فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
फिर तो उसके नफ्स ने अपने भाई के क़त्ल पर उसे भड़का ही दिया आख़िर उस (कम्बख्त ने) उसको मार ही डाला तो घाटा उठाने वालों में से हो गया
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अनुवाद — अल-माइदा 28

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Tuesday, August 18, 2026

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