अल-माइदा · 31/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
فَبَعَثَ اللَّهُ غُرَابًا يَبْحَثُ فِي الْأَرْضِ لِيُرِيَهُ كَيْفَ يُوَارِي سَوْءَةَ أَخِيهِ ۚ قَالَ يَا وَيْلَتَا أَعَجَزْتُ أَنْ أَكُونَ مِثْلَ هَٰذَا الْغُرَابِ فَأُوَارِيَ سَوْءَةَ أَخِي ۖ فَأَصْبَحَ مِنَ النَّادِمِينَ ۝٣١
Faba`asal laahu ghuraabai yabhasu fil ardi liyuriyahoo kaifa yuwaaree sawata akheeh; qaala yaa wailataaa a`ajaztu an akoona misla haazal ghuraabi fa uwaariya saw ata akhee fa asbaha minan naadimeen
📖 हिंदी अर्थ
(तब उसे फ़िक्र हुई कि लाश को क्या करे) तो ख़ुदा ने एक कौवे को भेजा कि वह ज़मीन को कुरेदने लगा ताकि उसे (क़ाबील) को दिखा दे कि उसे अपने भाई की लाश क्योंकर छुपानी चाहिए (ये देखकर) वह कहने लगा हाए अफ़सोस क्या मैं उस से भी आजिज़ हूं कि उस कौवे की बराबरी कर सकॅू कि (बला से यह भी होता) तो अपने भाई की लाश छुपा देता अलगरज़ वह (अपनी हरकत से) बहुत पछताया
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَبْحَثُ (यब्हसु): खोदना, मिट्टी को खुरचना और उलटना।
  • يُوَارِي (युवारी): छिपाना, ढकना, दफनाना।
  • سَوْءَةَ (सौ'अत): शरीर का वह हिस्सा जिसे छिपाना ज़रूरी है, यहाँ मतलब लाश (मृत शरीर)।
  • يَا وَيْلَتَا (या वैलता): हाय अफसोस! विपत्ति और पछतावे का वाक्य।
  • أَعَجَزْتُ (अ'अज़्तु): क्या मैं असमर्थ हो गया?
  • النَّادِمِينَ (अन-नादिमीन): पछतावा करने वाले, शर्मिंदा और दुखी लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब क़ाबिल ने अपने भाई हाबिल को मार डाला, तो वह उसकी लाश को लेकर परेशान हो गया। उसे समझ नहीं आया कि इस शव का क्या करे? उसने लाश को ज़मीन पर छोड़ दिया। अल्लाह तआला ने अपनी रहमत और हिकमत से एक कौवा भेजा, जो ज़मीन खोदने लगा। वह एक मरे हुए कौवे को ज़मीन में दफनाने के लिए गड्ढा खोद रहा था। अल्लाह ने यह इसलिए किया ताकि क़ाबिल को सिखाया जाए कि इंसान की लाश को किस तरह दफनाया जाता है।

यह देखकर क़ाबिल को अपनी नादानी का एहसास हुआ और वह हैरान रह गया। उसने कहा: "हाय मेरा अफसोस! क्या मैं इस कौवे जितना भी अच्छा नहीं हो सकता कि अपने भाई की लाश को दफना देता?" यह कहकर उसने अपने भाई को दफना दिया। लेकिन यह पछतावा सिर्फ इस बात का था कि उसने भाई की लाश को सही तरीके से छिपाया नहीं था, या उसे अपने माता-पिता के गुस्से और अल्लाह की नाराज़गी का डर था। वह हत्या करने पर पछतावा नहीं कर रहा था, बल्कि अपनी भूल और बुरे अंजाम पर शर्मिंदा था। इस तरह वह पछतावा करने वालों में से हो गया, लेकिन यह पछतावा उसके लिए माफी का ज़रिया नहीं बना, क्योंकि उसकी हत्या बहुत बड़ा गुनाह थी।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

इस घटना से हमें कई अहम सबक मिलते हैं। पहला यह कि अल्लाह तआला अपने बंदों को सिखाने के लिए छोटे से छोटे ज़रिये का इस्तेमाल कर सकता है — एक कौवे के ज़रिए उसने इंसान को दफनाने का तरीका सिखाया। यह अल्लाह की रहमत है कि वह हमें गलतियों से निकालकर सही रास्ता दिखाता है। दूसरा सबक यह कि इंसान को अपने गुनाहों पर तुरंत पछतावा करके अल्लाह से माफी मांगनी चाहिए, लेकिन सच्चा पछतावा वही है जो इंसान को गुनाह छोड़ने और अच्छे कामों की तरफ ले जाए। तीसरा सबक यह कि हमें अपने गुस्से और ईर्ष्या पर काबू रखना चाहिए, क्योंकि क़ाबिल की ईर्ष्या ही उसके पतन का कारण बनी। इस्लाम हमें सिखाता है कि भाईचारा, माफी और नेकी के रास्ते पर चलना ही सच्ची कामयाबी है। अल्लाह हमें हिदायत दे और हमें नेक रास्ते पर चलाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 29-33 — अल-माइदा

29إِنِّي أُرِيدُ أَن تَبُوءَ بِإِثْمِي وَإِثْمِكَ فَتَكُونَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ
मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है
30فَطَوَّعَتْ لَهُ نَفْسُهُ قَتْلَ أَخِيهِ فَقَتَلَهُ فَأَصْبَحَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
फिर तो उसके नफ्स ने अपने भाई के क़त्ल पर उसे भड़का ही दिया आख़िर उस (कम्बख्त ने) उसको मार ही डाला तो घाटा उठाने वालों में से हो गया
31فَبَعَثَ اللَّهُ غُرَابًا يَبْحَثُ فِي الْأَرْضِ لِيُرِيَهُ كَيْفَ يُوَارِي سَوْءَةَ أَخِيهِ ۚ قَالَ يَا وَيْلَتَا أَعَجَزْتُ أَنْ أَكُونَ مِثْلَ هَٰذَا الْغُرَابِ فَأُوَارِيَ سَوْءَةَ أَخِي ۖ فَأَصْبَحَ مِنَ النَّادِمِينَ
(तब उसे फ़िक्र हुई कि लाश को क्या करे) तो ख़ुदा ने एक कौवे को भेजा कि वह ज़मीन को कुरेदने लगा ताकि उसे (क़ाबील) को दिखा दे कि उसे अपने भाई की लाश क्योंकर छुपानी चाहिए (ये देखकर) वह कहने लगा हाए अफ़सोस क्या मैं उस से भी आजिज़ हूं कि उस कौवे की बराबरी कर सकॅू कि (बला से यह भी होता) तो अपने भाई की लाश छुपा देता अलगरज़ वह (अपनी हरकत से) बहुत पछताया
32مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم بَعْدَ ذَٰلِكَ فِي الْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ
इसी सबब से तो हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज्यादतियॉ करते रहे
33إِنَّمَا جَزَاءُ الَّذِينَ يُحَارِبُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا أَن يُقَتَّلُوا أَوْ يُصَلَّبُوا أَوْ تُقَطَّعَ أَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُم مِّنْ خِلَافٍ أَوْ يُنفَوْا مِنَ الْأَرْضِ ۚ ذَٰلِكَ لَهُمْ خِزْيٌ فِي الدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ
जो लोग ख़ुदा और उसके रसूल से लड़ते भिड़ते हैं (और एहकाम को नहीं मानते) और फ़साद फैलाने की ग़रज़ से मुल्को (मुल्को) दौड़ते फिरते हैं उनकी सज़ा बस यही है कि (चुन चुनकर) या तो मार डाले जाएं या उन्हें सूली दे दी जाए या उनके हाथ पॉव हेर फेर कर एक तरफ़ का हाथ दूसरी तरफ़ का पॉव काट डाले जाएं या उन्हें (अपने वतन की) सरज़मीन से शहर बदर कर दिया जाए यह रूसवाई तो उनकी दुनिया में हुई और फिर आख़ेरत में तो उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब ही है
अल-माइदाकुरान सूची
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अनुवाद — अल-माइदा 31

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सूरा आयत 31/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 29–33. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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