Walyahkum Ahlul Injeeli bimaaa anzalal laahu feeh; wa mal lam yahkum bimaaa anzalal laahu fa ulaaa`ika humul faasiqoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
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اور اہل انجیل کو چاہیئے کہ جو احکام خدا نے اس میں نازل فرمائے ہیں اس کے مطابق حکم دیا کریں اور جو خدا کے نازل کئے ہوئے احکام کے مطابق حکم نہ دے گا تو ایسے لوگ نافرماں ہیں
और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
أَهْلُ الْإِنجِيلِ: अर्थात वे लोग जिन्हें इंजील दी गई थी, अर्थात ईसाई (नसारा)।
الْفَاسِقُونَ: अवज्ञाकारी, आज्ञा से बाहर निकलने वाले, सत्य को छोड़कर असत्य की ओर झुकने वाले।
तफसीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला ने इस आयत में ईसाइयों को संबोधित करते हुए आदेश दिया कि जो लोग इंजील की ओर बुलाए गए थे, उन्हें चाहिए कि वे उस किताब के अनुसार निर्णय करें जो अल्लाह ने उसमें उतारी थी। यानी उन्हें उन आदेशों और शिक्षाओं पर अमल करना चाहिए जो अल्लाह ने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) पर उतारी थीं, जब तक कि उनके पास अल्लाह का नया संदेश (कुरआन) न आ जाए। यह आदेश उन्हें उस समय तक के लिए था जब तक कि अल्लाह की अंतिम शरिया (इस्लाम) नहीं आ गई। इस आयत से यह भी स्पष्ट होता है कि इंजील में अल्लाह के आदेश और नियम मौजूद थे, और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की शरिया अपने समय में एक स्वतंत्र और पूर्ण शरिया थी, जिसने पहले की शरिया (तौरात) को रद्द कर दिया था।
फिर अल्लाह तआला ने एक सामान्य नियम बताया: "और जो कोई उस (किताब) के अनुसार निर्णय नहीं करता जो अल्लाह ने उतारी है, तो ऐसे लोग ही वास्तव में फ़ासिक़ (अवज्ञाकारी) हैं।" यानी जो व्यक्ति अल्लाह के उतारे हुए कानून को छोड़कर किसी और कानून या अपनी इच्छाओं के अनुसार निर्णय करता है, वह अल्लाह की आज्ञा से बाहर निकल जाता है, सत्य को छोड़ देता है और असत्य की ओर झुक जाता है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि अल्लाह के कानून को छोड़ना और उसके बजाय किसी और चीज़ को अपनाना फ़िस्क़ (अवज्ञा) है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह तआला ने हर युग में अपने नबियों के माध्यम से मार्गदर्शन भेजा, और हर किताब में न्याय और सत्य के आदेश थे। यह अल्लाह की दया और न्याय का प्रमाण है कि उसने कभी भी मानवता को बिना मार्गदर्शन के नहीं छोड़ा।
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि न्याय और फैसले अल्लाह के उतारे हुए कानून के अनुसार होने चाहिए, क्योंकि अल्लाह का कानून ही सत्य और न्याय पर आधारित है। जो इसे छोड़ता है, वह भटक जाता है।
यह आयत हमें चेतावनी देती है कि अल्लाह की आज्ञा का पालन करना ही सफलता का मार्ग है, और उसकी अवज्ञा करना विनाश का कारण बनता है। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह के कुरआन और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत को अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए।
इस आयत में ईसाइयों को उनकी किताब पर अमल करने का आदेश दिया गया, जो यह दर्शाता है कि अल्लाह हर उम्मत से उसके पास भेजे गए संदेश के अनुसार पूछताछ करेगा। यह हमें यह भी बताता है कि सच्चा दीन वही है जो अल्लाह की ओर से आया हो, और अंतिम और पूर्ण दीन इस्लाम है, जो सभी पिछली शरियाओं को पूरा करता है।
और हम ने तौरेत में यहूदियों पर यह हुक्म फर्ज क़र दिया था कि जान के बदले जान और ऑख के बदले ऑख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दॉत के बदले दॉत और जख्म के बदले (वैसा ही) बराबर का बदला (जख्म) है फिर जो (मज़लूम ज़ालिम की) ख़ता माफ़ कर दे तो ये उसके गुनाहों का कफ्फ़ारा हो जाएगा और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब) के मुवाफ़िक़ हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी
और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
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