अल-माइदा · 57/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۝٥٧
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattakhizul lazeenat takhazoo deenakum huzuwanw wa la`ibam minal lazeena ootul Kitaaba min qablikum walkuffaara awliyaaa`; wattaqul laaha in kuntum muu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • هُزُوًا: मज़ाक़, उपहास
  • لَعِبًا: खेल-तमाशा, मज़ाक़
  • أَوْلِيَاءَ: मित्र, सहायक, संरक्षक
  • اتَّقُوا اللَّهَ: अल्लाह से डरो, उसकी अवज्ञा से बचो

व्याख्या:

हे ईमान वालो! जिन लोगों ने तुम्हारे धर्म को मज़ाक़ और खेल बना रखा है—चाहे वे अहले-किताब (यहूदी और ईसाई) हों जो तुमसे पहले किताब दिए गए थे, या अन्य काफ़िर हों—उन्हें अपना मित्र और संरक्षक मत बनाओ। यह आयत उन मुसलमानों के बारे में उतरी जो कुछ मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) से दोस्ती रखते थे, जिन्होंने बाहर से इस्लाम क़बूल किया था लेकिन अंदर से दुश्मन थे और धर्म का मज़ाक़ उड़ाते थे। अल्लाह तआला मुसलमानों को सख़्त तौर पर मना कर रहे हैं कि ऐसे लोगों से कभी दोस्ती न करो, क्योंकि यह तुम्हारे ईमान के ख़िलाफ़ है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और अल्लाह से डरो अगर तुम सच्चे मोमिन हो।" यानी अगर तुम्हें अपने ईमान पर भरोसा है और तुम सच्चे दिल से अल्लाह पर ईमान रखते हो, तो उसके हुक्मों का पालन करो और उन लोगों से दोस्ती से बचो जो अल्लाह के धर्म का मज़ाक़ उड़ाते हैं। सच्चा ईमान इसी का तक़ाज़ा है कि इंसान अल्लाह के दुश्मनों से दोस्ती न करे।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि मुसलमान को अपनी पहचान और अपने धर्म की इज़्ज़त का ख़याल रखना चाहिए। जो लोग हमारे धर्म का मज़ाक़ उड़ाएँ, उनसे दोस्ती रखना ईमान के ख़िलाफ़ है।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि दोस्ती और मुहब्बत में धार्मिक पहचान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारे दोस्त वही होने चाहिए जो हमारे धर्म और हमारी इज़्ज़त का सम्मान करें।
  3. अल्लाह तआला ने इस आयत में ईमान को तक़वा (अल्लाह का डर) से जोड़ा है, यानी सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से होता है। जो इंसान अल्लाह से डरता है, वह उसकी नफ़रमानी से बचता है।
  4. इस आयत में मुसलमानों को यह भी सिखाया गया है कि वे अपने धर्म की रक्षा करें और उसे किसी के मज़ाक़ का निशाना न बनने दें। धर्म की इज़्ज़त हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है।
  5. यह आयत हमें यह भी बताती है कि इस्लाम दूसरों के साथ अच्छे संबंध रखने से मना नहीं करता, लेकिन जहाँ धर्म का मज़ाक़ उड़ाया जाए, वहाँ दोस्ती नहीं हो सकती। यह हमारे लिए एक स्पष्ट नीति है कि हम अपने धर्म की इज़्ज़त को किसी भी हालत में कम न होने दें।
🎧 सुनें

📜 आयत 55-59 — अल-माइदा

55إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम्हारे मालिक सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और हालत रूकूउ में ज़कात देते हैं
56وَمَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है
57يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
58وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते
59قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ هَلْ تَنقِمُونَ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلُ وَأَنَّ أَكْثَرَكُمْ فَاسِقُونَ
(ऐ रसूल अहले किताब से कहो कि) आख़िर तुम हमसे इसके सिवा और क्या ऐब लगा सकते हो कि हम ख़ुदा पर और जो (किताब) हमारे पास भेजी गयी है और जो हमसे पहले भेजी गयी ईमान लाए हैं और ये तुममें के अक्सर बदकार हैं
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अनुवाद — अल-माइदा 57

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Tuesday, August 18, 2026

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