अल-माइदा · 58/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ ۝٥٨
Wa izaa naadaitum ilas Salaatit takhazoohaa huzu wan`w wa la`ibaa; zaalika biannnahum qawmul laa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَادَيْتُمْ (नादैतुम): तुमने पुकारा, अर्थात अज़ान दी।
  • اتَّخَذُوهَا (इत्तख़ज़ूहा): उसे बना लिया, अपना लिया।
  • هُزُوًا (हुज़ुवन): मज़ाक, उपहास।
  • لَعِبًا (ल'अबन): खेल-तमाशा।
  • لَا يَعْقِلُونَ (ला य'क़िलून): वे समझ-बूझ नहीं रखते, अक़्ल से काम नहीं लेते।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमानवालों! जब तुम अज़ान देकर लोगों को नमाज़ की ओर बुलाते हो—जो इस्लाम का सबसे बड़ा शिआर (प्रतीक) और अल्लाह की इबादत का सर्वोच्च रूप है—तो यहूदी, ईसाई और मुशरिकीन (बहुदेववादी) उस अज़ान और नमाज़ को मज़ाक और खेल-तमाशा बना लेते हैं। वे तुम्हारी पुकार पर हँसते हैं, उसका उपहास करते हैं और उसे बेकार समझते हैं। यह उनका यह कृत्य इसलिए है क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो अक़्ल और समझ से काम नहीं लेते। यदि वे थोड़ी-सी भी समझ रखते, तो जान लेते कि नमाज़ अल्लाह और बंदे के बीच का रिश्ता है, और अज़ान सच्चाई की ओर बुलाने वाली आवाज़ है। उनकी नासमझी और अज्ञानता ही उन्हें इस पवित्र क्रिया का मज़ाक उड़ाने पर उकसाती है। वे अल्लाह की इबादत की असली हक़ीक़त और उसके दीन की श्रेष्ठता को नहीं समझते, इसलिए उसका उपहास करते हैं।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अज़ान और नमाज़ इस्लाम के महान प्रतीक हैं, और इन्हें हँसी-मज़ाक की नज़र से देखना अज्ञानता और मूर्खता की निशानी है।
  2. एक सच्चे मुसलमान को चाहिए कि वह अज़ान की पुकार का सम्मान करे और उस पर तुरंत लब्बैक (उत्तर) कहे, क्योंकि यह दुनिया की सबसे बेहतरीन पुकार है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि जब दुनिया वाले हमारे दीन का मज़ाक उड़ाएँ, तो हमें अपने ईमान और इबादत पर दृढ़ रहना चाहिए, क्योंकि उनका उपहास उनकी नासमझी की दलील है, हमारे दीन की कमी नहीं।
  4. अक़्लमंद वही है जो अल्लाह की इबादत की अहमियत को समझे और उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाए; जो लोग इसे हल्का समझते हैं, वे असल में खुद को ही नुक़सान पहुँचाते हैं।
  5. यह आयत मुसलमानों को तसल्ली देती है कि दुश्मनों की हँसी और मज़ाक के बावजूद, सच्चाई और अल्लाह का दीन ही बुलंद रहेगा, और उनका उपहास उन्हीं पर लौटकर आएगा।


📜 आयत 56-60 — अल-माइदा

56وَمَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है
57يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
58وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते
59قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ هَلْ تَنقِمُونَ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلُ وَأَنَّ أَكْثَرَكُمْ فَاسِقُونَ
(ऐ रसूल अहले किताब से कहो कि) आख़िर तुम हमसे इसके सिवा और क्या ऐब लगा सकते हो कि हम ख़ुदा पर और जो (किताब) हमारे पास भेजी गयी है और जो हमसे पहले भेजी गयी ईमान लाए हैं और ये तुममें के अक्सर बदकार हैं
60قُلْ هَلْ أُنَبِّئُكُم بِشَرٍّ مِّن ذَٰلِكَ مَثُوبَةً عِندَ اللَّهِ ۚ مَن لَّعَنَهُ اللَّهُ وَغَضِبَ عَلَيْهِ وَجَعَلَ مِنْهُمُ الْقِرَدَةَ وَالْخَنَازِيرَ وَعَبَدَ الطَّاغُوتَ ۚ أُولَٰئِكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضَلُّ عَن سَوَاءِ السَّبِيلِ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तुम्हें ख़ुदा के नज़दीक सज़ा में इससे कहीं बदतर ऐब बता दूं (अच्छा लो सुनो) जिसपर ख़ुदा ने लानत की हो और उस पर ग़ज़ब ढाया हो और उनमें से किसी को (मसख़ करके) बन्दर और (किसी को) सूअर बना दिया हो और (ख़ुदा को छोड़कर) शैतान की परस्तिश की हो पस ये लोग दरजे में कहीं बदतर और राहे रास्त से भटक के सबसे ज्यादा दूर जा पहुंचे हैं
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अनुवाद — अल-माइदा 58

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Tuesday, August 18, 2026

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