अल-मुजादिला · 2/22
अनुवाद उच्चारण — अल-मुजादिला
الَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَائِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَاتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ ۝٢
Allazeena yuzaahiroona minkum min nisaaa`ihim maa hunnaa ummahaatihim in ummahaatuhum illal laaa`ee waladnahum; wa innaahum la yaqooloona munkaram minal qawli wa zooraa; wa innal laaha la`afuwwun ghafoor
📖 हिंदी अर्थ
तुम में से जो लोग अपनी बीवियों के साथ ज़हार करते हैं अपनी बीवी को माँ कहते हैं वह कुछ उनकी माएँ नहीं (हो जातीं) उनकी माएँ तो बस वही हैं जो उनको जनती हैं और वह बेशक एक नामाक़ूल और झूठी बात कहते हैं और ख़ुदा बेशक माफ करने वाला और बड़ा बख्शने वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُظَاهِرُونَ (युज़ाहिरून): ज़िहार करना, यानी पति का अपनी पत्नी से यह कहना कि "तू मुझ पर मेरी माँ की पीठ के समान है" (यानी तू मेरे लिए हराम है जैसे मेरी माँ)।
  • مُنكَرًا (मुनकरन): बुरी और घृणित बात जिसे अक्ल और शरियत दोनों नापसंद करते हैं।
  • زُورًا (ज़ूरन): झूठ और बातिल कथन।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो ज़िहार करते हैं, यानी अपनी पत्नी को यह कहकर हराम कर लेते हैं कि "तू मुझ पर मेरी माँ की पीठ के समान है।" अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि ये लोग जो अपनी पत्नियों को माँ कहकर हराम समझ लेते हैं, वे बिल्कुल झूठ बोलते हैं। उनकी पत्नियाँ उनकी माँएँ नहीं हैं। असली माँएँ तो वही हैं जिन्होंने उन्हें जन्म दिया। यह महज़ एक बुरी और झूठी बात है जो वे अपनी ज़ुबान से निकालते हैं।

अल्लाह तआला ने इस कृत्य को "मुनकर" (बुरा) और "ज़ूर" (झूठ) क़रार दिया है, क्योंकि यह अल्लाह की बनाई हुई हलाल चीज़ को हराम करने की कोशिश है, और यह एक ऐसा क़ौल है जिसे न तो अक्ल मानती है और न ही शरियत।

लेकिन इसी के साथ अल्लाह तआला अपनी रहमत और मेहरबानी का पर्दा भी खोलते हैं। वे फ़रमाते हैं कि अल्लाह माफ़ करने वाला और बख्शने वाला है। उसने इस गलती का इलाज भी रखा है—कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) का नियम बनाया है, ताकि इंसान अपनी गलती से तौबा करके पलट सके और अल्लाह की रहमत से दोबारा जुड़ सके।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है। इंसान से गलती हो जाए, लेकिन अगर वह सच्चे दिल से तौबा करे और अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चले, तो अल्लाह उसे माफ़ कर देता है। इस्लाम में हर बुराई का इलाज मौजूद है, और अल्लाह ने अपने बंदों पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि उनकी भलाई के लिए ही हुक्म भेजे हैं।

तो अगर किसी से ऐसी गलती हो जाए, तो निराश न हों, बल्कि अल्लाह की तरफ लौटें, तौबा करें, और उसके बताए हुए कफ़्फ़ारे (जैसे ग़ुलाम आज़ाद करना, या लगातार दो महीने रोज़े रखना, या साठ मिस्कीनों को खाना खिलाना) पर अमल करें। अल्लाह तौबा करने वालों से बहुत प्यार करता है और उन्हें माफ़ कर देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 1-4 — अल-मुजादिला

1قَدْ سَمِعَ اللَّهُ قَوْلَ الَّتِي تُجَادِلُكَ فِي زَوْجِهَا وَتَشْتَكِي إِلَى اللَّهِ وَاللَّهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَا ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ
ऐ रसूल जो औरत (ख़ुला) तुमसे अपने शौहर (उस) के बारे में तुमसे झगड़ती और ख़ुदा से गिले शिकवे करती है ख़ुदा ने उसकी बात सुन ली और ख़ुदा तुम दोनों की ग़ुफ्तगू सुन रहा है बेशक ख़ुदा बड़ा सुनने वाला देखने वाला है
2الَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَائِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَاتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ
तुम में से जो लोग अपनी बीवियों के साथ ज़हार करते हैं अपनी बीवी को माँ कहते हैं वह कुछ उनकी माएँ नहीं (हो जातीं) उनकी माएँ तो बस वही हैं जो उनको जनती हैं और वह बेशक एक नामाक़ूल और झूठी बात कहते हैं और ख़ुदा बेशक माफ करने वाला और बड़ा बख्शने वाला है
3وَالَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِن نِّسَائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِّن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
और जो लोग अपनी बीवियों से ज़हार कर बैठे फिर अपनी बात वापस लें तो दोनों के हमबिस्तर होने से पहले (कफ्फ़ारे में) एक ग़ुलाम का आज़ाद करना (ज़रूरी) है उसकी तुमको नसीहत की जाती है और तुम जो कुछ भी करते हो (ख़ुदा) उससे आगाह है
4فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۖ فَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ ۗ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ
फिर जिसको ग़ुलाम न मिले तो दोनों की मुक़ारबत के क़ब्ल दो महीने के पै दर पै रोज़े रखें और जिसको इसकी भी क़ुदरत न हो साठ मोहताजों को खाना खिलाना फर्ज़ है ये (हुक्म इसलिए है) ताकि तुम ख़ुदा और उसके रसूल की (पैरवी) तसदीक़ करो और ये ख़ुदा की मुक़र्रर हदें हैं और काफ़िरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
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अनुवाद — अल-मुजादिला 2

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Tuesday, August 18, 2026

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