अल-मुमतहिना · 6/13
अनुवाद उच्चारण — अल-मुमतहिना
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيهِمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ ۚ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ ۝٦
Laqad kaana lakum feehim uswatunhasanatul liman kaana yarjul laaha wal yawmal aakhir; wa many yatawalla fa innal laaha huwal ghaniyyul hameed
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों) उन लोगों के (अफ़आल) का तुम्हारे वास्ते जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत की उम्मीद रखता हो अच्छा नमूना है और जो (इससे) मुँह मोड़े तो ख़ुदा भी यक़ीनन बेपरवा (और) सज़ावारे हम्द है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • उस्वतुन हसनह: अच्छा आदर्श, अनुकरणीय उदाहरण
  • यरजू: आशा रखता है, उम्मीद करता है
  • यतवल्ल: मुँह मोड़ लेता है, विमुख हो जाता है
  • अल-ग़नी: बेनियाज़, जो किसी का मुहताज न हो
  • अल-हमीद: हर हाल में प्रशंसा के योग्य

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला आपको बता रहा है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके साथ के ईमान वालों के जीवन में तुम्हारे लिए एक बेहतरीन आदर्श है। उन्होंने अल्लाह की राह में हर क़ुर्बानी दी, हर मुश्किल सही, और कुफ़्र व शिर्क के आगे कभी सर नहीं झुकाया। उन्होंने अपने ही रिश्तेदारों से दुश्मनी मोल ली जब उन्होंने अल्लाह की वहदानियत (एकता) का एलान किया। यह आदर्श उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखते हैं और आख़िरत के दिन से डरते हैं — यानी जिनके दिलों में अल्लाह का खौफ़ और उसकी रज़ा की चाहत हो।

यहाँ दो तरह की उस्वत (आदर्श) का ज़िक्र है: पहली उस्वत दुश्मनों से बराअत (बरी होने) में है, और दूसरी उस्वत अल्लाह से डरने और उसकी पनाह लेने में है। यानी जिस तरह इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम के काफ़िरों से किनारा किया और अल्लाह पर भरोसा किया, उसी तरह तुम्हें भी अल्लाह के दुश्मनों से बराअत का एलान करना है और अल्लाह ही पर भरोसा रखना है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: जो कोई इस आदर्श से मुँह मोड़ ले और अल्लाह के दुश्मनों से मुहब्बत रखे, तो उसे समझ लेना चाहिए कि अल्लाह को उसकी इबादत की ज़रूरत नहीं। अल्लाह बेनियाज़ है — वह अपनी ज़ात और सिफ़ात में हर कमी से पाक है, और हर हाल में प्रशंसा के योग्य है। किसी काफ़िर का कुफ़्र और किसी मुनाफ़िक़ का निफ़ाक़ उसके राज़ (साम्राज्य) में कोई कमी नहीं ला सकता। वह तो अपनी ज़ात में हम्द (प्रशंसा) का हक़दार है, चाहे लोग उसकी इबादत करें या न करें।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि एक मोमिन की पहचान यह है कि वह अल्लाह के प्यारे नबियों के नक़्शे-क़दम पर चले। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी हमारे लिए रौशनी का मीनार है — उन्होंने अकेले दुनिया के सामने सच का एलान किया, और अल्लाह ने उन्हें दुनिया में भी इमाम बनाया और आख़िरत में भी। जो लोग अल्लाह की राह पर चलते हैं, अल्लाह उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता। यह आयत हमें हौसला देती है कि सच्चाई पर क़ायम रहो, भले ही दुनिया तुम्हारे ख़िलाफ़ हो जाए, क्योंकि अल्लाह तुम्हारे साथ है और वही सबसे बड़ा मददगार है।



📜 आयत 4-8 — अल-मुमतहिना

4قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِي إِبْرَاهِيمَ وَالَّذِينَ مَعَهُ إِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَآءُ مِنكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَاءُ أَبَدًا حَتَّىٰ تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَحْدَهُ إِلَّا قَوْلَ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ لَأَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَا أَمْلِكُ لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن شَيْءٍ ۖ رَّبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَإِلَيْكَ أَنَبْنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो इबराहीम और उनके साथियों (के क़ौल व फेल का अच्छा नमूना मौजूद है) कि जब उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि हम तुमसे और उन (बुतों) से जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा पूजते हो बेज़ार हैं हम तो तुम्हारे (दीन के) मुनकिर हैं और जब तक तुम यकता ख़ुदा पर ईमान न लाओ हमारे तुम्हारे दरमियान खुल्लम खुल्ला अदावत व दुशमनी क़ायम हो गयी मगर (हाँ) इबराहीम ने अपने (मुँह बोले) बाप से ये (अलबत्ता) कहा कि मैं आपके लिए मग़फ़िरत की दुआ ज़रूर करूँगा और ख़ुदा के सामने तो मैं आपके वास्ते कुछ एख्तेयार नहीं रखता ऐ हमारे पालने वाले (ख़ुदा) हमने तुझी पर भरोसा कर लिया है और तेरी ही तरफ हम रूजू करते हैं
5رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا وَاغْفِرْ لَنَا رَبَّنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
और तेरी तरफ हमें लौट कर जाना है ऐ हमारे पालने वाले तू हम लोगों को काफ़िरों की आज़माइश (का ज़रिया) न क़रार दे और परवरदिगार तू हमें बख्श दे बेशक तू ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
6لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيهِمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ ۚ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ
(मुसलमानों) उन लोगों के (अफ़आल) का तुम्हारे वास्ते जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत की उम्मीद रखता हो अच्छा नमूना है और जो (इससे) मुँह मोड़े तो ख़ुदा भी यक़ीनन बेपरवा (और) सज़ावारे हम्द है
7۞ عَسَى اللَّهُ أَن يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ الَّذِينَ عَادَيْتُم مِّنْهُم مَّوَدَّةً ۚ وَاللَّهُ قَدِيرٌ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
करीब है कि ख़ुदा तुम्हारे और उनमें से तुम्हारे दुश्मनों के दरमियान दोस्ती पैदा कर दे और ख़ुदा तो क़ादिर है और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
8لَّا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
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अनुवाद — अल-मुमतहिना 6

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Tuesday, August 18, 2026

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