अल-मुमतहिना · 8/13
अनुवाद उच्चारण — अल-मुमतहिना
لَّا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ۝٨
Laa yanhaakumul laahu `anil lazeena lam yuqaatilookum fid deeni wa lam yukhrijookum min diyaarikum an tabarroohum wa tuqsitooo ilaihim; innal laaha yuhibbul muqsiteen
📖 हिंदी अर्थ
जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ: जिन्होंने धर्म के मामले में आपसे युद्ध नहीं किया।
  • وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ: और जिन्होंने आपको आपके घरों से नहीं निकाला।
  • أَن تَبَرُّوهُمْ: कि आप उनके साथ भलाई करें (अच्छा व्यवहार करें)।
  • وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ: और उनके साथ न्याय और इंसाफ करें।
  • الْمُقْسِطِينَ: न्याय करने वाले, इंसाफ करने वाले लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को एक बहुत ही स्पष्ट और न्यायपूर्ण मार्गदर्शन दे रहा है। वह फ़रमाता है कि जो लोग (काफ़िरों में से) तुमसे धर्म के मामले में लड़े नहीं, और न ही उन्होंने तुम्हें तुम्हारे घरों और वतन से निकाला, तो अल्लाह तुम्हें उनके साथ भलाई करने और न्यायपूर्ण व्यवहार करने से नहीं रोकता। यानी उनके साथ अच्छा सलूक करना, उनके हक़ अदा करना, उनके साथ इंसाफ़ करना — यह सब जायज़ और पसंदीदा है।

यह आयत उस समय उतरी जब कुछ मुसलमानों के रिश्तेदार (जो काफ़िर थे) मक्का में रह गए थे और उन्होंने मुसलमानों से लड़ाई नहीं की थी, न ही उन्हें निकाला था। कुछ सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) अपने इन रिश्तेदारों से मेल-मिलाप और भलाई करने में संकोच करते थे, यह सोचकर कि शायद यह जायज़ न हो। तो अल्लाह ने यह आयत उतारकर साफ़ कर दिया कि जो काफ़िर तुमसे दुश्मनी नहीं रखते और न ही तुम्हें सताते हैं, उनके साथ नेकी और इंसाफ़ करना कोई गुनाह नहीं, बल्कि यह अल्लाह को बहुत पसंद है।

अल्लाह फ़रमाता है: "बेशक अल्लाह न्याय करने वालों से मुहब्बत करता है।" यानी जो लोग अपने क़ौल और फ़ेल (बात और काम) में इंसाफ़ करते हैं, अल्लाह उन्हें प्यार करता है। यह एक बहुत बड़ी फज़ीलत है — कि इंसाफ़ करने वालों को अल्लाह की मुहब्बत हासिल होती है।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम दुश्मनी और बुराई का धर्म नहीं, बल्कि न्याय, भलाई और अच्छे अख़लाक़ का धर्म है। जो लोग हमारे साथ अच्छा करें, हमें सताएं नहीं, हमारे धर्म में दखल न दें — उनके साथ हमें भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह हर उस इंसान के साथ नेकी और इंसाफ़ का हुक्म देता है जो हमारे साथ नेकी और इंसाफ़ करता है।

इस आयत से हमें यह भी सबक मिलता है कि हमें अपने गैर-मुस्लिम पड़ोसियों, रिश्तेदारों और साथियों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए, जब तक कि वे हमारे खिलाफ ज़ुल्म और दुश्मनी पर आमादा न हों। यह न सिर्फ़ हमारी ईमानदारी की निशानी है, बल्कि इससे दूसरों के दिलों में इस्लाम की अच्छी तस्वीर भी बनती है। अल्लाह इंसाफ़ करने वालों से मुहब्बत करता है — और यह मुहब्बत ही सबसे बड़ी कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — अल-मुमतहिना

6لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيهِمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ ۚ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ الْغَنِيُّ الْحَمِيدُ
(मुसलमानों) उन लोगों के (अफ़आल) का तुम्हारे वास्ते जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत की उम्मीद रखता हो अच्छा नमूना है और जो (इससे) मुँह मोड़े तो ख़ुदा भी यक़ीनन बेपरवा (और) सज़ावारे हम्द है
7۞ عَسَى اللَّهُ أَن يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ الَّذِينَ عَادَيْتُم مِّنْهُم مَّوَدَّةً ۚ وَاللَّهُ قَدِيرٌ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
करीब है कि ख़ुदा तुम्हारे और उनमें से तुम्हारे दुश्मनों के दरमियान दोस्ती पैदा कर दे और ख़ुदा तो क़ादिर है और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
8لَّا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
9إِنَّمَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَأَخْرَجُوكُم مِّن دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلَىٰ إِخْرَاجِكُمْ أَن تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
ख़ुदा तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हारे निकालने में (औरों की) मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं
10يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا جَاءَكُمُ الْمُؤْمِنَاتُ مُهَاجِرَاتٍ فَامْتَحِنُوهُنَّ ۖ اللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَانِهِنَّ ۖ فَإِنْ عَلِمْتُمُوهُنَّ مُؤْمِنَاتٍ فَلَا تَرْجِعُوهُنَّ إِلَى الْكُفَّارِ ۖ لَا هُنَّ حِلٌّ لَّهُمْ وَلَا هُمْ يَحِلُّونَ لَهُنَّ ۖ وَآتُوهُم مَّا أَنفَقُوا ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ أَن تَنكِحُوهُنَّ إِذَا آتَيْتُمُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ ۚ وَلَا تُمْسِكُوا بِعِصَمِ الْكَوَافِرِ وَاسْأَلُوا مَا أَنفَقْتُمْ وَلْيَسْأَلُوا مَا أَنفَقُوا ۚ ذَٰلِكُمْ حُكْمُ اللَّهِ ۖ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों जब तुम्हारे पास ईमानदार औरतें वतन छोड़ कर आएँ तो तुम उनको आज़मा लो, ख़ुदा तो उनके ईमान से वाकिफ़ है ही, पस अगर तुम भी उनको ईमानदार समझो तो उन्ही काफ़िरों के पास वापस न फेरो न ये औरतें उनके लिए हलाल हैं और न वह कुफ्फ़ार उन औरतों के लिए हलाल हैं और उन कुफ्फार ने जो कुछ (उन औरतों के मेहर में) ख़र्च किया हो उनको दे दो, और जब उनका महर उन्हें दे दिया करो तो इसका तुम पर कुछ गुनाह नहीं कि तुम उससे निकाह कर लो और काफिर औरतों की आबरू (जो तुम्हारी बीवियाँ हों) अपने कब्ज़े में न रखो (छोड़ दो कि कुफ्फ़ार से जा मिलें) और तुमने जो कुछ (उन पर) ख़र्च किया हो (कुफ्फ़ार से) लो, और उन्होने भी जो कुछ ख़र्च किया हो तुम से माँग लें यही ख़ुदा का हुक्म है जो तुम्हारे दरमियान सादिर करता है और ख़ुदा वाक़िफ़कार हकीम है
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अनुवाद — अल-मुमतहिना 8

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Tuesday, August 18, 2026

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