Wa maaa arsalnaa fee qaryatim min Nabiyyin illaaa akhaznaaa ahlahaa bil baasaaa`i waddarraaa`i la`allahum yaddarra`oon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और हमने किसी बस्ती में कोई नबी नही भेजा मगर वहाँ के रहने वालों को (कहना न मानने पर) सख्ती और मुसीबत में मुब्तिला किया ताकि वह लोग (हमारी बारगाह में) गिड़गिड़ाए
🌐 Additional reference in اردو
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اور ہم نے کسی شہر میں کوئی پیغمبر نہیں بھیجا مگر وہاں کے رہنے والوں کو (جو ایمان نہ لائے) دکھوں اور مصیبتوں میں مبتلا کیا تاکہ وہ عاجزی اور زاری کریں
بِالْبَأْسَاءِ: कठिनाई, तंगी, फ़क़ीरी और जीविका की संकीर्णता।
وَالضَّرَّاءِ: शारीरिक कष्ट, बीमारी, दर्द और शरीर को पहुँचने वाली तकलीफ़।
يَضَّرَّعُونَ: झुकना, गिड़गिड़ाना, अत्यंत विनम्रता के साथ अल्लाह की ओर रुजू करना और उसके सामने अपनी लाचारी का इज़हार करना।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपनी उस सुन्नत (क़ानून) का ज़िक्र कर रहा है जो उसने पहले की उम्मतों के साथ जारी रखी। जब भी किसी बस्ती में कोई नबी भेजा गया और उसकी क़ौम ने उसे झुठलाया और उसके पैग़ाम को क़बूल करने से इनकार कर दिया, तो अल्लाह ने उन लोगों को मुसीबतों और तकलीफ़ों में डाल दिया। उनकी जानों को बीमारियों और दर्दों में मुब्तला किया, और उनके माल को तबाही, फ़क़ीरी और कमी का शिकार बनाया। यह सब कुछ उनके हालात को बदलने के लिए किया गया, ताकि उनके दिल नरम हों, उनका ग़ुरूर और घमंड टूटे, और वे अपने किए पर शर्मिंदा होकर अल्लाह की तरफ़ रुजू करें, उसके आगे गिड़गिड़ाएँ, अपनी ग़लतियों से तौबा करें और सच्चाई को क़बूल कर लें। यह अल्लाह की रहमत और मेहरबानी का तरीक़ा है कि वह बंदों को नरमी और सख़्ती दोनों तरह से आज़माता है, ताकि वे अपने रब की याद करें और उसकी तरफ़ पलटें। यह आयत मक्का के काफ़िरों के लिए एक सख़्त चेतावनी भी है कि अगर उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को झुठलाने पर क़ायम रहा, तो उन पर भी वही अज़ाब और मुसीबतें आएँगी जो पहले की झुठलाने वाली उम्मतों पर आईं।
फ़ायदे (सबक़ और नसीहतें):
मुसीबतें और तकलीफ़ें अल्लाह की तरफ़ से एक नेमत भी हो सकती हैं, क्योंकि इनके ज़रिए बंदे का दिल अल्लाह की तरफ़ मुड़ता है और वह अपनी ग़लतियों से तौबा करता है।
अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है; वह उन्हें सज़ा देने में जल्दबाज़ी नहीं करता, बल्कि पहले उन्हें मुसीबतों से आगाह करता है ताकि वे सुधर जाएँ।
मुसीबत के वक़्त अल्लाह के आगे गिड़गिड़ाना और उससे दुआ करना बहुत पसंदीदा अमल है, और यही इंसान की फ़ितरत (स्वभाव) है।
यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम पर कोई मुसीबत आए, तो हमें अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए, न कि उससे दूर भागना चाहिए।
अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) कभी नहीं बदलती; जो लोग सच्चाई को झुठलाते हैं और हक़ से मुँह मोड़ते हैं, उनका अंजाम हमेशा बुरा ही रहा है।
और हमने किसी बस्ती में कोई नबी नही भेजा मगर वहाँ के रहने वालों को (कहना न मानने पर) सख्ती और मुसीबत में मुब्तिला किया ताकि वह लोग (हमारी बारगाह में) गिड़गिड़ाए
तब शुएब उन लोगों के सर से टल गए और (उनसे मुख़ातिब हो के) कहा ऐ मेरी क़ौम मैं ने तो अपने परवरदिगार के पैग़ाम तुम तक पहुँचा दिए और तुम्हारी ख़ैर ख्वाही की थी, फिर अब मैं काफिरों पर क्यों कर अफसोस करूँ
और हमने किसी बस्ती में कोई नबी नही भेजा मगर वहाँ के रहने वालों को (कहना न मानने पर) सख्ती और मुसीबत में मुब्तिला किया ताकि वह लोग (हमारी बारगाह में) गिड़गिड़ाए
फिर हमने तकलीफ़ की जगह आराम को बदल दिया यहाँ तक कि वह लोग बढ़ निकले और कहने लगे कि इस तरह की तकलीफ़ व आराम तो हमारे बाप दादाओं को पहुँच चुका है तब हमने (उस बढ़ाने के की सज़ा में (अचानक उनको अज़ाब में) गिरफ्तार किया
और वह बिल्कुल बेख़बर थे और अगर उन बस्तियों के रहने वाले ईमान लाते और परहेज़गार बनते तो हम उन पर आसमान व ज़मीन की बरकतों (के दरवाजे) ख़ोल देते मगर (अफसोस) उन लोगों ने (हमारे पैग़म्बरों को) झूठलाया तो हमने भी उनके करतूतों की बदौलत उन को (अज़ाब में) गिरफ्तार किया
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