अल-इंसान · 8/31
अनुवाद उच्चारण — अल-इंसान
وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا ۝٨
Wa yut``imoonat ta`aama `alaa hubbihee miskeenanw wa yatemanw wa aseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِسْكِينًا (मिस्कीन) : वह गरीब जिसके पास अपनी ज़रूरतों के लिए भी कुछ न हो।
  • يَتِيمًا (यतीम) : वह बच्चा जिसका पिता मर चुका हो और जिसके पास कोई संपत्ति न हो।
  • أَسِيرًا (असीर) : क़ैदी, जैसे युद्ध के क़ैदी।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये वे नेक लोग हैं जो अल्लाह की राह में अपना धन और साधन खर्च करते हैं। वे भोजन कराते हैं, और यह भोजन कराना उनके लिए बड़ी मुश्किल से होता है, क्योंकि उन्हें खुद उस भोजन की सख्त ज़रूरत होती है और वे उसे चाहते भी हैं। इसके बावजूद वे उसे उन लोगों को देते हैं जो ज़रूरतमंद हैं — चाहे वह कोई गरीब हो जिसके पास कुछ भी नहीं, या कोई अनाथ बच्चा हो जिसने अपने पिता को खो दिया हो, या कोई क़ैदी हो जो अपनी आज़ादी खो चुका हो। यह कार्य वे केवल अल्लाह की खुशी और उसके सवाब (पुण्य) के लिए करते हैं, न कि किसी सांसारिक लाभ या प्रशंसा के लिए। वे अल्लाह के उस दिन से डरते हैं जो बहुत कठिन और भयावह होगा, जिस दिन चेहरे सिकुड़ जाएँगे और माथे पर बल पड़ जाएँगे।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से होता है। अल्लाह उन लोगों से बहुत प्यार करता है जो दूसरों की मदद करते हैं, खासकर उन लोगों की जो सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद हैं — गरीब, अनाथ और क़ैदी। यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी ज़रूरतों के बावजूद दूसरों के लिए कुर्बानी देनी चाहिए। इस्लाम में दूसरों की मदद करना सबसे बड़ी इबादत है। अगर हम सिर्फ़ अपने लिए नहीं जीते, बल्कि दूसरों के लिए भी जीते हैं, तो अल्लाह हमें उस दिन ज़रूर सवाब देगा जब कोई और मदद नहीं कर सकता। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाता है — जहाँ हर तरह की नेमतें और खुशियाँ होंगी।

🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — अल-इंसान

6عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا عِبَادُ اللَّهِ يُفَجِّرُونَهَا تَفْجِيرًا
और जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे
7يُوفُونَ بِالنَّذْرِ وَيَخَافُونَ يَوْمًا كَانَ شَرُّهُ مُسْتَطِيرًا
ये वह लोग हैं जो नज़रें पूरी करते हैं और उस दिन से जिनकी सख्ती हर तरह फैली होगी डरते हैं
8وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا
और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं
9إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمْ جَزَاءً وَلَا شُكُورًا
(और कहते हैं कि) हम तो तुमको बस ख़ालिस ख़ुदा के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के
10إِنَّا نَخَافُ مِن رَّبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًا قَمْطَرِيرًا
हमको तो अपने परवरदिगार से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे (और) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी
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अनुवाद — अल-इंसान 8

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Tuesday, August 18, 2026

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