अत-तौबा · 119/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ ۝١١٩
Yaaa aiyuhal lazeena aamanut taqul laaha wa koonoo ma`as saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اتَّقُوا اللَّهَ: अल्लाह से डरो, उसके आदेशों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो।
  • الصَّادِقِينَ: सच्चे लोग, जो अपने ईमान, बातों, वादों और कर्मों में सच्चे हों।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमानवालो! जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) को सच्चे दिल से माना और उसके दीन (धर्म) पर चलने का प्रण किया! तुम अल्लाह से डरो और उसके हर आदेश का पालन करो तथा हर उस काम से बचो जिसे उसने मना किया है। यह तक़वा (अल्लाह का डर) तुम्हारे हर काम—चाहे वह छोटा हो या बड़ा, छिपा हो या खुला—में शामिल होना चाहिए। इसके बाद अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि तुम सच्चे लोगों के साथ रहो। यानी उन लोगों की संगत और साथ को अपनाओ जो अपने ईमान में सच्चे हैं, अपनी ज़ुबान से सच बोलते हैं, अपने वादों और अहदों को पूरा करते हैं, और अपने कर्मों में भी सच्चाई रखते हैं—यानी उनके अंदर और बाहर में कोई फर्क नहीं होता। उन्होंने अल्लाह से सच्चा ईमान का अहद किया, उसे नियत, बात और अमल—तीनों में सच्चा किया। यह साथ रहना सिर्फ शारीरिक साथ नहीं है, बल्कि उनके रास्ते पर चलना, उनके तरीकों को अपनाना और उनके साथ दिल से जुड़ना है। क्योंकि नजात (मुक्ति) और कामयाबी सिर्फ सच्चाई में है, और सच्चे लोगों की संगत ही इंसान को सच्चाई पर कायम रखती है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का दावा करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस ईमान के साथ तक़वा (अल्लाह का डर) जरूरी है, जो हमें गुनाहों से रोके और नेकियों पर चलाए।
  2. सच्चाई इस्लाम की सबसे बड़ी पहचान है—चाहे बात हो, वादा हो या कर्म। सच्चाई ही इंसान को अल्लाह के करीब लाती है और उसे दुनिया और आखिरत में इज्जत देती है।
  3. अच्छी संगत की अहमियत—इंसान अपने दोस्तों और साथियों के रास्ते पर चलता है। इसलिए हमें सच्चे, नेक और परहेज़गार लोगों की संगत चुननी चाहिए, क्योंकि वे हमें सच्चाई और नेकी पर कायम रखते हैं।
  4. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की राह में सच्चाई ही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुंचाती है। जो लोग सच्चे हैं, अल्लाह उनसे मुहब्बत करता है और उन्हें कामयाबी देता है।


📜 आयत 117-121 — सूरा अत-तौबा

117لَّقَد تَّابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنصَارِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ مِن بَعْدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقٍ مِّنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّهُ بِهِمْ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
अलबत्ता ख़ुदा ने नबी और उन मुहाजिरीन अन्सार पर बड़ा फज़ल किया जिन्होंने तंगदस्ती के वक्त रसूल का साथ दिया और वह भी उसके बाद कि क़रीब था कि उनमे ंसे कुछ लोगों के दिल जगमगा जाएँ फिर ख़ुदा ने उन पर (भी) फज़ल किया इसमें शक़ नहीं कि वह उन लोगों पर पड़ा तरस खाने वाला मेहरबान है
118وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا حَتَّىٰ إِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ أَنفُسُهُمْ وَظَنُّوا أَن لَّا مَلْجَأَ مِنَ اللَّهِ إِلَّا إِلَيْهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ
और उन यमीमों पर (भी फज़ल किया) जो (जिहाद से पीछे रह गए थे और उन पर सख्ती की गई) यहाँ तक कि ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के उन पर तंग हो गई और उनकी जानें (तक) उन पर तंग हो गई और उन लोगों ने समझ लिया कि ख़ुदा के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं फिर ख़ुदा ने उनको तौबा की तौफीक दी ताकि वह (ख़ुदा की तरफ) रूजू करें बेशक ख़ुदा ही बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
119يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ
120مَا كَانَ لِأَهْلِ الْمَدِينَةِ وَمَنْ حَوْلَهُم مِّنَ الْأَعْرَابِ أَن يَتَخَلَّفُوا عَن رَّسُولِ اللَّهِ وَلَا يَرْغَبُوا بِأَنفُسِهِمْ عَن نَّفْسِهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ لَا يُصِيبُهُمْ ظَمَأٌ وَلَا نَصَبٌ وَلَا مَخْمَصَةٌ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَطَئُونَ مَوْطِئًا يَغِيظُ الْكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنْ عَدُوٍّ نَّيْلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُم بِهِ عَمَلٌ صَالِحٌ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ
मदीने के रहने वालों और उनके गिर्दोनवॉ (आस पास) देहातियों को ये जायज़ न था कि रसूल ख़ुदा का साथ छोड़ दें और न ये (जायज़ था) कि रसूल की जान से बेपरवा होकर अपनी जानों के बचाने की फ्रिक करें ये हुक्म उसी सबब से था कि उन (जिहाद करने वालों) को ख़ुदा की रूह में जो तकलीफ़ प्यास की या मेहनत या भूख की शिद्दत की पहुँचती है या ऐसी राह चलते हैं जो कुफ्फ़ार के ग़ैज़ (ग़ज़ब का बाइस हो या किसी दुश्मन से कुछ ये लोग हासिल करते हैं तो बस उसके ऐवज़ में (उनके नामए अमल में) एक नेक काम लिख दिया जाएगा बेशक ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र (व सवाब) बरबाद नहीं करता है
121وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةً صَغِيرَةً وَلَا كَبِيرَةً وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ اللَّهُ أَحْسَنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और ये लोग (ख़ुदा की राह में) थोड़ा या बहुत माल नहीं खर्च करते और किसी मैदान को नहीं क़तआ करते मगर फौरन (उनके नामाए अमल में) उनके नाम लिख दिया जाता है ताकि ख़ुदा उनकी कारगुज़ारियों का उन्हें अच्छे से अच्छा बदला अता फरमाए
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
119आयत

अनुवाद — अत-तौबा 119

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Monday, September 28, 2026

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