اتَّقُوا اللَّهَ: अल्लाह से डरो, उसके आदेशों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो।
الصَّادِقِينَ: सच्चे लोग, जो अपने ईमान, बातों, वादों और कर्मों में सच्चे हों।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे ईमानवालो! जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) को सच्चे दिल से माना और उसके दीन (धर्म) पर चलने का प्रण किया! तुम अल्लाह से डरो और उसके हर आदेश का पालन करो तथा हर उस काम से बचो जिसे उसने मना किया है। यह तक़वा (अल्लाह का डर) तुम्हारे हर काम—चाहे वह छोटा हो या बड़ा, छिपा हो या खुला—में शामिल होना चाहिए। इसके बाद अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि तुम सच्चे लोगों के साथ रहो। यानी उन लोगों की संगत और साथ को अपनाओ जो अपने ईमान में सच्चे हैं, अपनी ज़ुबान से सच बोलते हैं, अपने वादों और अहदों को पूरा करते हैं, और अपने कर्मों में भी सच्चाई रखते हैं—यानी उनके अंदर और बाहर में कोई फर्क नहीं होता। उन्होंने अल्लाह से सच्चा ईमान का अहद किया, उसे नियत, बात और अमल—तीनों में सच्चा किया। यह साथ रहना सिर्फ शारीरिक साथ नहीं है, बल्कि उनके रास्ते पर चलना, उनके तरीकों को अपनाना और उनके साथ दिल से जुड़ना है। क्योंकि नजात (मुक्ति) और कामयाबी सिर्फ सच्चाई में है, और सच्चे लोगों की संगत ही इंसान को सच्चाई पर कायम रखती है।
फ़ायदे (लाभ):
यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का दावा करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस ईमान के साथ तक़वा (अल्लाह का डर) जरूरी है, जो हमें गुनाहों से रोके और नेकियों पर चलाए।
सच्चाई इस्लाम की सबसे बड़ी पहचान है—चाहे बात हो, वादा हो या कर्म। सच्चाई ही इंसान को अल्लाह के करीब लाती है और उसे दुनिया और आखिरत में इज्जत देती है।
अच्छी संगत की अहमियत—इंसान अपने दोस्तों और साथियों के रास्ते पर चलता है। इसलिए हमें सच्चे, नेक और परहेज़गार लोगों की संगत चुननी चाहिए, क्योंकि वे हमें सच्चाई और नेकी पर कायम रखते हैं।
यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की राह में सच्चाई ही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुंचाती है। जो लोग सच्चे हैं, अल्लाह उनसे मुहब्बत करता है और उन्हें कामयाबी देता है।
अलबत्ता ख़ुदा ने नबी और उन मुहाजिरीन अन्सार पर बड़ा फज़ल किया जिन्होंने तंगदस्ती के वक्त रसूल का साथ दिया और वह भी उसके बाद कि क़रीब था कि उनमे ंसे कुछ लोगों के दिल जगमगा जाएँ फिर ख़ुदा ने उन पर (भी) फज़ल किया इसमें शक़ नहीं कि वह उन लोगों पर पड़ा तरस खाने वाला मेहरबान है
और उन यमीमों पर (भी फज़ल किया) जो (जिहाद से पीछे रह गए थे और उन पर सख्ती की गई) यहाँ तक कि ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के उन पर तंग हो गई और उनकी जानें (तक) उन पर तंग हो गई और उन लोगों ने समझ लिया कि ख़ुदा के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं फिर ख़ुदा ने उनको तौबा की तौफीक दी ताकि वह (ख़ुदा की तरफ) रूजू करें बेशक ख़ुदा ही बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
मदीने के रहने वालों और उनके गिर्दोनवॉ (आस पास) देहातियों को ये जायज़ न था कि रसूल ख़ुदा का साथ छोड़ दें और न ये (जायज़ था) कि रसूल की जान से बेपरवा होकर अपनी जानों के बचाने की फ्रिक करें ये हुक्म उसी सबब से था कि उन (जिहाद करने वालों) को ख़ुदा की रूह में जो तकलीफ़ प्यास की या मेहनत या भूख की शिद्दत की पहुँचती है या ऐसी राह चलते हैं जो कुफ्फ़ार के ग़ैज़ (ग़ज़ब का बाइस हो या किसी दुश्मन से कुछ ये लोग हासिल करते हैं तो बस उसके ऐवज़ में (उनके नामए अमल में) एक नेक काम लिख दिया जाएगा बेशक ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र (व सवाब) बरबाद नहीं करता है
और ये लोग (ख़ुदा की राह में) थोड़ा या बहुत माल नहीं खर्च करते और किसी मैदान को नहीं क़तआ करते मगर फौरन (उनके नामाए अमल में) उनके नाम लिख दिया जाता है ताकि ख़ुदा उनकी कारगुज़ारियों का उन्हें अच्छे से अच्छा बदला अता फरमाए
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