अत-तौबा · 50/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
إِن تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ ۖ وَإِن تُصِبْكَ مُصِيبَةٌ يَقُولُوا قَدْ أَخَذْنَا أَمْرَنَا مِن قَبْلُ وَيَتَوَلَّوا وَّهُمْ فَرِحُونَ ۝٥٠
in tusibka hasanatun tasu`hum; wa in tusibka museebatuny yaqooloo qad akhaznaaa amranaa min qablu wa yatawallaw wa hum farihoon
📖 हिंदी अर्थ
तुमको कोई फायदा पहुंचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि (इस वजह से) हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और (ये कह कर) ख़ुश (तुम्हारे पास से उठकर) वापस लौटतें है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَسَنَةٌ (हसनah): भलाई, खुशी, विजय, ग़नीमत (युद्ध में मिलने वाला धन)।
  • تَسُؤْهُمْ (तसूहुम): उन्हें दुखी करती है, उन्हें बुरी लगती है।
  • مُصِيبَةٌ (मुसीबah): कठिनाई, हार, विपत्ति।
  • قَدْ أَخَذْنَا أَمْرَنَا (क़द अख़ज़ना अम्रना): हमने अपना मामला (अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम) पहले ही कर लिया था।
  • يَتَوَلَّوْا (यतवल्लौ): मुड़ जाते हैं, चले जाते हैं।
  • فَرِحُونَ (फ़रिहून): खुशियाँ मनाते हुए, प्रसन्न।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! ये मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) आपके और आपके साथियों के लिए किसी भी हालत में खैर नहीं चाहते। जब अल्लाह आपको कोई भलाई देता है—जैसे विजय, ग़नीमत, या कोई सफलता—तो उन्हें यह देखकर सख्त दुख होता है, उनका कलेजा जलता है। वे आपकी खुशी को सहन नहीं कर पाते। और अगर आप पर कोई मुसीबत आती है—जैसे युद्ध में हार, कठिनाई, या तकलीफ़—तो वे खुश होकर कहते हैं: "हमने तो पहले ही अपना मामला संभाल लिया था, हमने अपनी सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम कर लिया था, इसलिए हम इस मुसीबत में नहीं पड़े।" वे यह सोचकर कि उन्होंने समझदारी दिखाई, आपसे और आपके साथियों से मुँह मोड़कर चले जाते हैं, और अपने इस काम पर बहुत खुश और प्रसन्न होते हैं।

यह उनकी मानसिकता है—वे न तो इस्लाम की भलाई चाहते हैं और न ही मुसलमानों की। उनकी खुशी मुसलमानों की तकलीफ़ में है, और उनका दुख मुसलमानों की खुशी में। यह उनके दिलों की बीमारी और ईमान की कमज़ोरी की सबसे बड़ी निशानी है।


दावती पहलू (शिक्षाप्रद संदेश):

इस आयत से हमें सीखना चाहिए कि सच्चा मुसलमान वही है जो अपने भाई-बहनों की खुशी में खुश हो और उनके दुख में दुखी हो। जिसके दिल में मुसलमानों के लिए बुराई की भावना हो, वह मुनाफ़िक़ की निशानी रखता है। हमें अपने दिलों को साफ़ रखना चाहिए, ईर्ष्या और बुराई से बचना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह उन्हीं को प्यार करता है जो दूसरों की भलाई चाहते हैं। जब हम किसी मुसलमान भाई की सफलता पर खुश होते हैं, तो यह हमारे ईमान की निशानी है। और जब हम उनकी मुसीबत में उनके साथ खड़े होते हैं, तो यह हमारी मुहब्बत का सबूत है। अल्लाह हमें सच्चे दिल वाले बनाए और मुनाफ़िक़ी की बीमारी से बचाए। आमीन।



📜 आयत 48-52 — सूरा अत-तौबा

48لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّىٰ جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ
(ए रसूल) इसमें तो शक़ नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहॉ तक कि हक़ आ पहुंचा और ख़ुदा ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा
49وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ائْذَن لِّي وَلَا تَفْتِنِّي ۚ أَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُوا ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌ بِالْكَافِرِينَ
उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो (पीछे रह जाने की) इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए (ऐ रसूल) आगाह हो कि ये लोग खुद बला में (औंधे मुँह) गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं
50إِن تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ ۖ وَإِن تُصِبْكَ مُصِيبَةٌ يَقُولُوا قَدْ أَخَذْنَا أَمْرَنَا مِن قَبْلُ وَيَتَوَلَّوا وَّهُمْ فَرِحُونَ
तुमको कोई फायदा पहुंचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि (इस वजह से) हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और (ये कह कर) ख़ुश (तुम्हारे पास से उठकर) वापस लौटतें है
51قُل لَّن يُصِيبَنَا إِلَّا مَا كَتَبَ اللَّهُ لَنَا هُوَ مَوْلَانَا ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि हम पर हरगिज़ कोई मुसीबत पड़ नही सकती मगर जो ख़ुदा ने तुम्हारे लिए (हमारी तक़दीर में) लिख दिया है वही हमारा मालिक है और ईमानदारों को चाहिए भी कि ख़ुदा ही पर भरोसा रखें
52قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَا إِلَّا إِحْدَى الْحُسْنَيَيْنِ ۖ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ أَن يُصِيبَكُمُ اللَّهُ بِعَذَابٍ مِّنْ عِندِهِ أَوْ بِأَيْدِينَا ۖ فَتَرَبَّصُوا إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ
(ऐ रसूल) तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते (फतेह या शहादत) दो भलाइयों में से एक के ख्वाह मख्वाह मुन्तज़िर ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तज़िर हैं कि ख़ुदा तुम पर (ख़ास) अपने ही से कोई अज़ाब नाज़िल करे या हमारे हाथों से फिर (अच्छा) तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ (साथ) इन्तेज़ार करते हैं
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
50आयत

अनुवाद — अत-तौबा 50

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Tuesday, September 29, 2026

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