अत-तौबा · 77/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا فِي قُلُوبِهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَا أَخْلَفُوا اللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ ۝٧٧
Fa a`qabahum nifaaqan fee quloobihim ilaa Yawmi yalqaw nahoo bimaaa akhlaful laaha maa wa`adoohu wa bimaa kaanoo yakhziboon
📖 हिंदी अर्थ
फिर उनसे उनके ख़ामयाजे (बदले) में अपनी मुलाक़ात के दिन (क़यामत) तक उनके दिल में (गोया खुद) निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो ख़ुदा से वायदा किया था उसके ख़िलाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَأَعْقَبَهُمْ: उन्हें इसका बदला दिया, या उनके कर्मों का परिणाम उन्हें मिला।
  • نِفَاقًا: मुनाफ़िक़ी, दिल में ईमान न होना और ज़ुबान से ईमान का दावा करना।
  • إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ: उस दिन तक जब वे अल्लाह से मिलेंगे, अर्थात् क़ियामत के दिन तक।
  • بِمَا أَخْلَفُوا: उस कारण से जो उन्होंने वादा ख़िलाफ़ किया।
  • مَا وَعَدُوهُ: जो वादा उन्होंने किया था (अल्लाह से)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन मुनाफ़िक़ों का हाल बयान कर रहा है जिन्होंने अल्लाह से वादा किया था कि अगर अल्लाह उन्हें अपने फज़ल से माल देगा तो वे ज़रूर सदक़ा देंगे और नेक लोगों में शामिल होंगे। लेकिन जब अल्लाह ने उन्हें अपने फज़ल से माल दिया, तो उन्होंने अपने वादे से मुकर गए और कंजूसी की। इसलिए अल्लाह ने उनके इस बुरे कर्म की सज़ा में उनके दिलों में निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) डाल दिया, जो उनके दिलों में उस दिन तक बना रहेगा जब तक वे क़ियामत के दिन अल्लाह से नहीं मिलेंगे। यह निफ़ाक़ उनके लिए ऐसा स्थायी हाल बन गया कि वे कभी ईमान की हक़ीक़त तक नहीं पहुँच सकते। यह सब कुछ उनके उस वादे को तोड़ने और उनके झूठ बोलने की सज़ा थी, क्योंकि उन्होंने अल्लाह से जो वादा किया था, उसे पूरा नहीं किया और अपनी क़समों में भी झूठ बोला।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह से किया गया वादा एक गंभीर समझौता है; उसे तोड़ना बड़ा गुनाह है और अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनता है।
  2. निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) दिल की बीमारी है, जो इंसान को ईमान की हक़ीक़त से महरूम कर देती है और उसे अल्लाह की रहमत से दूर कर देती है।
  3. अल्लाह की दी हुई नेअमतों पर शुक्र अदा करना और उसके रास्ते में ख़र्च करना ईमान की निशानी है, जबकि कंजूसी और वादा ख़िलाफ़ी इंसान को अल्लाह के क़हर (प्रकोप) का पात्र बना देती है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह से सच्चा रिश्ता बनाए रखें, अपने वादों को पूरा करें और झूठ से बचें, ताकि हमारे दिल साफ़ और ईमान से भरे रहें।


📜 आयत 75-79 — सूरा अत-तौबा

75۞ وَمِنْهُم مَّنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آتَانَا مِن فَضْلِهِ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ الصَّالِحِينَ
और इन (मुनाफेक़ीन) में से बाज़ ऐसे भी हैं जो ख़ुदा से क़ौल क़रार कर चुके थे कि अगर हमें अपने फज़ल (व करम) से (कुछ माल) देगा तो हम ज़रूर ख़ैरात किया करेगें और नेकोकार बन्दे हो जाऎंगे
76فَلَمَّا آتَاهُم مِّن فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ وَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ
तो जब ख़ुदा ने अपने फज़ल (व करम) से उन्हें अता फरमाया-तो लगे उसमें बुख्ल करने और कतराकर मुंह फेरने
77فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا فِي قُلُوبِهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَا أَخْلَفُوا اللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ
फिर उनसे उनके ख़ामयाजे (बदले) में अपनी मुलाक़ात के दिन (क़यामत) तक उनके दिल में (गोया खुद) निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो ख़ुदा से वायदा किया था उसके ख़िलाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे
78أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَاهُمْ وَأَنَّ اللَّهَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
क्या वह लोग इतना भी न जानते थे कि ख़ुदा (उनके) सारे भेद और उनकी सरगोशी (सब कुछ) जानता है और ये कि ग़ैब की बातों से ख़ूब आगाह है
79الَّذِينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ ۙ سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर (रियाकारी का) और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी शफ़क़क़्त (मेहनत) की मज़दूरी पाते (शेख़ी का) इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो ख़ुदा भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
77आयत

अनुवाद — अत-तौबा 77

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Monday, September 28, 2026

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