अत-तौबा · 76/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
فَلَمَّا آتَاهُم مِّن فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ وَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ ۝٧٦
Falammaaa aataahum min fadlihee bakhiloo bihee wa tawallaw wa hum mu`ridoon
📖 हिंदी अर्थ
तो जब ख़ुदा ने अपने फज़ल (व करम) से उन्हें अता फरमाया-तो लगे उसमें बुख्ल करने और कतराकर मुंह फेरने
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • بَخِلُوا: कंजूसी की, रोक रखा।
  • وَتَوَلَّوا: मुँह मोड़ लिया, पीठ फेर ली।
  • مُعْرِضُونَ: उपेक्षा करने वाले, किनारा करने वाले।

तफ़सीर:

जब अल्लाह ने उन्हें अपने फज़ल (उदारता) से धन-दौलत दी, तो उन्होंने उसमें कंजूसी की और अल्लाह का हक़ (ज़कात, सदक़ा) अदा नहीं किया। उन्होंने अल्लाह से किए गए अपने वादे को तोड़ दिया, जो उन्होंने पहले किया था कि अगर अल्लाह उन्हें अपने फज़ल से देगा तो वे ज़रूर खर्च करेंगे और नेक काम करेंगे। लेकिन जब अल्लाह ने उन्हें दिया, तो वे अपने वादे से मुकर गए, अपना माल रोक लिया और कुछ भी खर्च नहीं किया। वे इस्लाम और ईमान से मुँह मोड़कर चले गए, और उनकी आदत ही अल्लाह की आज्ञा से उपेक्षा करने की थी। यह उन लोगों का हाल है जो अल्लाह से वादा करते हैं लेकिन पूरा नहीं करते, और जब उन्हें नेमत मिलती है तो वे अहंकार और कंजूसी का शिकार हो जाते हैं।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह की नेमतें इंसान के लिए आज़माइश हैं, और उनका सही उपयोग करना चाहिए।
  2. अल्लाह से किया गया वादा पूरा करना ईमान का हिस्सा है; वादा तोड़ना मुनाफ़िक़ों की निशानी है।
  3. कंजूसी और माल को रोककर रखना अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री है, जो इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देती है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि जब अल्लाह हमें धन दे, तो हमें उसका हक़ (ज़कात, सदक़ा) अदा करके अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए, ताकि हमारी नेमतें बरकत वाली हों।
  5. अल्लाह की नेमतों के बाद उपेक्षा और मुँह मोड़ना इंसान को अल्लाह की पकड़ का हक़दार बनाता है, इसलिए हमेशा अल्लाह की ओर रुजू रहना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 74-78 — अत-तौबा

74يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ مَا قَالُوا وَلَقَدْ قَالُوا كَلِمَةَ الْكُفْرِ وَكَفَرُوا بَعْدَ إِسْلَامِهِمْ وَهَمُّوا بِمَا لَمْ يَنَالُوا ۚ وَمَا نَقَمُوا إِلَّا أَنْ أَغْنَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ مِن فَضْلِهِ ۚ فَإِن يَتُوبُوا يَكُ خَيْرًا لَّهُمْ ۖ وَإِن يَتَوَلَّوْا يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ عَذَابًا أَلِيمًا فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ ۚ وَمَا لَهُمْ فِي الْأَرْضِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
ये मुनाफेक़ीन ख़ुदा की क़समें खाते है कि (कोई बुरी बात) नहीं कही हालॉकि उन लोगों ने कुफ़्र का कलमा ज़रूर कहा और अपने इस्लाम के बाद काफिर हो गए और जिस बात पर क़ाबू न पा सके उसे ठान बैठे और उन लोगें ने (मुसलमानों से) सिर्फ इस वजह से अदावत की कि अपने फज़ल व करम से ख़ुदा और उसके रसूल ने दौलत मन्द बना दिया है तो उनके लिए उसमें ख़ैर है कि ये लोग अब भी तौबा कर लें और अगर ये न मानेगें तो ख़ुदा उन पर दुनिया और आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब नाज़िल फरमाएगा और तमाम दुनिया में उन का न कोई हामी होगा और न मददगार
75۞ وَمِنْهُم مَّنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آتَانَا مِن فَضْلِهِ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ الصَّالِحِينَ
और इन (मुनाफेक़ीन) में से बाज़ ऐसे भी हैं जो ख़ुदा से क़ौल क़रार कर चुके थे कि अगर हमें अपने फज़ल (व करम) से (कुछ माल) देगा तो हम ज़रूर ख़ैरात किया करेगें और नेकोकार बन्दे हो जाऎंगे
76فَلَمَّا آتَاهُم مِّن فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ وَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ
तो जब ख़ुदा ने अपने फज़ल (व करम) से उन्हें अता फरमाया-तो लगे उसमें बुख्ल करने और कतराकर मुंह फेरने
77فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا فِي قُلُوبِهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَا أَخْلَفُوا اللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ
फिर उनसे उनके ख़ामयाजे (बदले) में अपनी मुलाक़ात के दिन (क़यामत) तक उनके दिल में (गोया खुद) निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो ख़ुदा से वायदा किया था उसके ख़िलाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे
78أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَاهُمْ وَأَنَّ اللَّهَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
क्या वह लोग इतना भी न जानते थे कि ख़ुदा (उनके) सारे भेद और उनकी सरगोशी (सब कुछ) जानता है और ये कि ग़ैब की बातों से ख़ूब आगाह है
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अनुवाद — अत-तौबा 76

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Tuesday, August 18, 2026

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