हूद · 3/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَأَنِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ يُمَتِّعْكُم مَّتَاعًا حَسَنًا إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَيُؤْتِ كُلَّ ذِي فَضْلٍ فَضْلَهُ ۖ وَإِن تَوَلَّوْا فَإِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ كَبِيرٍ ۝٣
Wa anis taghfiroo Rabbakum summa toobooo ilaihi yumatti`kum mataa`an hasanan ilaaa ajalim musammanw wa yu`ti kulla zee fadlin fadlahoo wa in tawallaw fa inneee akhaafu `alaikum `azaaba Yawmin Kabeer
📖 हिंदी अर्थ
और ये भी कि अपने परवरदिगार से मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में (गुनाहों से) तौबा करो वही तुम्हें एक मुकर्रर मुद्दत तक अच्छे नुत्फ के फायदे उठाने देगा और वही हर साहबे बुर्ज़गी को उसकी बुर्जुगी (की दाद) अता फरमाएगा और अगर तुमने (उसके हुक्म से) मुँह मोड़ा तो मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े (ख़ौफनाक) दिन के अज़ाब का डर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اسْتَغْفِرُوا: अपने पापों की क्षमा माँगो।
  • تُوبُوا: रुजू होना, पलट आना, निष्ठापूर्वक अपने कर्मों पर पछतावा करते हुए अल्लाह की ओर लौटना।
  • يُمَتِّعْكُم: वह तुम्हें लाभ पहुँचाएगा, सुख-समृद्धि देगा।
  • مَتَاعًا حَسَنًا: उत्तम और पवित्र जीवन-सामग्री, अच्छा जीवन।
  • أَجَلٍ مُسَمًّى: निर्धारित समय, अर्थात् मृत्यु का समय।
  • ذِي فَضْلٍ: जिसके पास अच्छाई, ज्ञान, या अच्छे कर्मों की अधिकता हो।
  • تَوَلَّوْا: मुँह मोड़ लो, विमुख हो जाओ।

आयत की व्याख्या:

अल्लाह के नबी (हज़रत हूद अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि तुम अपने रब से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगो और फिर उसी की ओर सच्चे दिल से तौबा करो—यानी अपने कुकर्मों को छोड़कर उसकी आज्ञा का पालन करने लगो। यदि तुम ऐसा करोगे, तो अल्लाह तुम्हें इसी दुनिया में अच्छा और पाकीज़ा जीवन प्रदान करेगा, जो तुम्हारी निर्धारित आयु (मृत्यु के समय) तक जारी रहेगा। इसके अलावा, जो लोग अपने ज्ञान, अच्छे कर्मों और नेकी में आगे बढ़ेंगे, अल्लाह उन्हें उनकी अच्छाई का पूरा-पूरा बदला देगा, बिना किसी कमी के। और यदि तुम इस आह्वान से मुँह मोड़ लोगे, तो मुझे तुम्हारे लिए एक बड़े दिन—यानी क़ियामत के दिन—के अज़ाब का डर है, जो अत्यंत भयानक और कठिन होगा। यह उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो अल्लाह के आदेशों से विमुख होते हैं और उसके रसूलों को झुठलाते हैं।


आयत से मिलने वाली शिक्षाएँ और लाभ:

  1. इस्तिग़फ़ार और तौबा की अहमियत: यह आयत हमें सिखाती है कि गुनाहों से बचने और अल्लाह की रहमत पाने का सबसे बड़ा ज़रिया इस्तिग़फ़ार (क्षमा माँगना) और सच्ची तौबा है। अल्लाह अपने बंदों से कभी निराश नहीं होता, बल्कि उनके पलट आने का इंतज़ार करता है।
  2. तौबा का फल—दुनिया और आख़िरत दोनों में: तौबा करने से न केवल आख़िरत में सफलता मिलती है, बल्कि अल्लाह तौबा करने वाले को दुनिया में भी अच्छा जीवन, मन की शांति और रिज़्क़ में बरकत देता है। यह एक बड़ी ख़ुशख़बरी है।
  3. अच्छाई का बदला अल्लाह के फज़ल से: जो लोग नेकी, इल्म और अच्छे कर्मों में आगे रहते हैं, अल्लाह उन्हें अपने फज़ल से अतिरिक्त इनाम देता है। यह हमें नेकी में प्रतिस्पर्धा करने की प्रेरणा देता है।
  4. अल्लाह की चेतावनी गंभीर है: जो लोग अल्लाह के दीन से मुँह मोड़ते हैं, उनके लिए क़ियामत का दिन बहुत कठिन होगा। यह हमें सचेत करता है कि हम अपने आचरण पर ध्यान दें और अल्लाह की नाफ़रमानी से बचें।
  5. इस्लाम में उम्मीद और डर का संतुलन: यह आयत हमें सिखाती है कि एक मुसलमान को अल्लाह की रहमत से उम्मीद रखनी चाहिए, लेकिन साथ ही उसके अज़ाब से डरते हुए नेक कर्म करते रहना चाहिए। यही संतुलन एक सच्चे मोमिन की पहचान है।
🎧 सुनें

📜 आयत 1-5 — हूद

1الر ۚ كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِن لَّدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ
अलिफ़ लाम रा - ये (क़ुरान) वह किताब है जिसकी आयते एक वाकिफ़कार हकीम की तरफ से (दलाएल से) खूब मुस्तहकिम (मज़बूत) कर दी गयीं
2أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۚ إِنَّنِي لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ
फिर तफ़सीलदार बयान कर दी गयी हैं ये कि ख़ुदा के सिवा किसी की परसतिश न करो मै तो उसकी तरफ से तुम्हें (अज़ाब से) डराने वाला और (बेहिश्त की) ख़ुशख़बरी देने वाला (रसूल) हूँ
3وَأَنِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ يُمَتِّعْكُم مَّتَاعًا حَسَنًا إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَيُؤْتِ كُلَّ ذِي فَضْلٍ فَضْلَهُ ۖ وَإِن تَوَلَّوْا فَإِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ كَبِيرٍ
और ये भी कि अपने परवरदिगार से मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में (गुनाहों से) तौबा करो वही तुम्हें एक मुकर्रर मुद्दत तक अच्छे नुत्फ के फायदे उठाने देगा और वही हर साहबे बुर्ज़गी को उसकी बुर्जुगी (की दाद) अता फरमाएगा और अगर तुमने (उसके हुक्म से) मुँह मोड़ा तो मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े (ख़ौफनाक) दिन के अज़ाब का डर है
4إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(याद रखो) तुम सब को (आख़िरकार) ख़ुदा ही की तरफ लौटना है और वह हर चीज़ पर (अच्छी तरह) क़ादिर है
5أَلَا إِنَّهُمْ يَثْنُونَ صُدُورَهُمْ لِيَسْتَخْفُوا مِنْهُ ۚ أَلَا حِينَ يَسْتَغْشُونَ ثِيَابَهُمْ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
(ऐ रसूल) देखो ये कुफ़्फ़ार (तुम्हारी अदावत में) अपने सीनों को (गोया) दोहरा किए डालते हैं ताकि ख़ुदा से (अपनी बातों को) छिपाए रहें (मगर) देखो जब ये लोग अपने कपड़े ख़ूब लपेटते हैं (तब भी तो) ख़ुदा (उनकी बातों को) जानता है जो छिपाकर करते हैं और खुल्लम खुल्ला करते हैं इसमें शक़ नहीं कि वह सीनों के भेद तक को खूब जानता है
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अनुवाद — हूद 3

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Tuesday, August 18, 2026

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